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Friday, August 28, 2020

                                            महाराजा उदियादित्य पँवार                                                                                                                                                                                        

                     महाराजा भोजदेव के आकस्मिक निधन के बाद मालवा में कुछ समय के लिए संकट के बादल खड़े हो गए थे।  राजा जयसिंह पँवार ने राज्यपाठ तो संभाल लिया पर चालुक्य और कलचुरियों के आक्रमण निरंतर जारी थे। उदयपुर प्रशस्ति लेख के अनुसार प्रमार वंश में नए सूर्य का उदय, महाराजा उदियादित्य पँवार के रूप में हुआ जिसने वापस मालवा के गौरव को लौटाकर धारा नगरी को प्रकाश से भर दिया। नागपुर शिलालेख के अनुसार महाराज भोज के बाद उनके रिश्तेदार महाराज उदियादित्य ने चालुक्य शासक कर्ण के प्रभाव को विफल कर पँवार वंश के गौरव को पुनरस्थापित किया । 

                 जैन मान्यताओं के अनुसार महाराजा उदियादित्य, सम्राट राजा भोज के भाई थे। उन्होंने १०५९ से १०८८ तक मालवा पर शासन किया। उनके पुत्र नरवर्मन देव, लक्ष्मण देव और जगदेव बाद में मालवा और अन्य क्षेत्रों के शासक बने। अपने पूर्वज राजाओं, महाराजा मुंज, महाराजा शीयक, महाराजा भोज की तरह ही वे भी कला और साहित्य के प्रेमी थे और अपने राज्य में शिक्षा पर विशेष बल दिया। उदयपुर (विदिशा) में प्रसिद्ध नीलकंठेश्वर मंदिर का निर्माण(सन १०८०-८१) महाराज उदियादित्य ने करवाया था। यह प्राचीन मंदिर अपने आप में शिल्प कला का अनूठा नमूना है। विदिशा जिले के तहसील गंज बासोदा के निकट उदयपुर मे बने इस मन्दिर में भगवान सूर्य के नामों के अनुरूप मुख्य स्तम्भ घन्टा नुमा बारह राशियों मे विभक्त बारह राशियों साथ ही सत्ताइस नक्षत्रो को पंखुडियो मे दर्शाया गया है ।

                                           द्वारा : पोवार इतिहास, साहित्य एवं उत्कर्ष



Saturday, April 25, 2020

मराठा पंवार


पँवार(परमार) वंश की एक शाखा राजस्थान से जाकर पश्चिमी महाराष्ट्र में बस गयी थी और ये बाद में शिवाजी की सेना में शामिल हो गए थे. ये लोग आज मराठा पँवार के नाम से जाने जाते हैं. कुछ लेखों में यह भी पता चलता हैं की कुछ पँवार बाद में मालवा से भी इन क्षेत्रों में विस्थापित हुए थे. 

मराठों के साथ इन पंवारों ने अनेक युद्ध लड़े और इन्हें धार और देवास रियासते उन्हें दी गयी थी. ये लोग 96 कुलीन क्षत्रिय समूह मराठा में शामिल हो गए थे. बाद में इनके और अन्य पँवार समूहों से कोई सांस्कृतिक सम्बन्ध नहीं रहे. 

विदर्भ में पँवारो ने मराठों के साथ कई युद्धों में सहयोग किया था जिसमे निश्चित ही कई पश्चिमी महाराष्ट्र पँवार सरदार/सैनिक शामिल रहे होंगे और इस पर शोध चल रहा है कि विदर्भ के पँवार कुल में कौनसे कुर/समूह मराठा सेना में शामिल पूर्वी मराठा पँवार/पवार हो सकते हैं. सैकड़ो वर्ष पूर्व का इतिहास बिखरा हुआ हैं और कई लोग इस पर शोध कर रहे हैं.

अलग अलग क्षेत्रों में निवासरत अग्निवंशीय पंवारों में आज वैवाहिक सम्बन्ध नहीं होते  परन्तु वे अनेक सामाजिक मंचो/ कार्यकर्मों में मिलते और वैचारिक आदान प्रदान करके हैं.

- ऋषि बिसेन, नागपुर

कृष्ण अना गोपी

मी बी राधा बन जाऊ बंसी बजय्या, रास रचय्या गोकुलको कन्हैया लाडको नटखट नंदलाल देखो माखनचोर नाव से यको!!१!! मधुर तोरो बंसीकी तान भू...