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Saturday, September 5, 2020

सामाजिक शख्सियत : श्री डी. पी. राहंगडाले

                            सामाजिक शख्सियत : श्री डी. पी. राहंगडाले

क्षत्रिय पोवार पंवार समाज के गौरव श्री धनलाल पोतन राहंगडाले जी  का जन्म गोदिया जिले में तिरोड़ा तहसील के ग्राम बरबसपुरा में १६ दिसंबर १९५२ को हुआ था। आपने कला विषय से स्नातक किया और साथ ही शिक्षा में डिप्लोमा प्राप्त किया है। सन १९८० में आपका चयन कनिष्ठ लिपिक के पद पर हुआ। बाद में आपकी वरिष्ठ लिपिक, मंडलाधिकारी और नायब तहसीलदार के रूप में पदोन्नति हुयी। आप वर्ष १९७७ से १९८० तक ग्राम पंचायत बरबसपुरा के निर्विरोध सदस्य रहे। ३१ दिसंबर २०१० आप सेवानिवृत्त हुए और वर्ष २०१२ से २०१७ तक  ग्राम बरबसपुरा के निर्विरोध उपसरपंच चूने गये।    वर्तमान में आप गजानन कॉलोनी, गोंदिया में निवासरत हैं। आपके परिवार में दो पुत्र और एक पुत्री हैं।

आपको संगीत और साहित्य में हमेशा से रूचि रही हैं। आपने ढंढार झाड़ीपट्टी में भाग लिया है। आपने कई हिंदी नाटक(ड्रामा) लिखे हैं। आपने निरंतर १५ वर्षों तक नाटकों में स्वयं अभिनय किया है। आज भी ग्राम बरबसपुरा में नाट्य मण्डली का सञ्चालन कर रहे हैं और नयी पीढ़ी का मार्दर्शन कर रहे हैं। आपने पोवारी, हिंदी और मराठी में कई कवितायें, और भजन लिखें हैं और आज भी आपकी कलम की गति साहित्य के सृजन में अविरल प्रवाह मान हैं। आपको अपनी मातृभाषा पोवारी से विशेष लगाव हैं और पोवारी में लेखन आपको सबसे प्रिय हैं। लेखन के साथ भजन, कीर्तन और प्रवचन में विशेष रूचि हैं। हारमोनियम बजाना आपको बहुत अच्छा लगता हैं। हारमोनियम को बजाते हुए आपके पोवारी भजन गायन को सुनने का एक अलग ही आनंद हैं।  हम सभी ये प्रार्थना करते हैं की आप इसी तरह निरंतर साहित्य का सृजन करते रहे और अपने गायन के माध्यम से समाज को मार्गदर्शित करते रहें।

                                                 तथ्य संकलन : ऋषि बिसेन
                                                              नागपुर  
                        पोवारी इतिहास, साहित्य, संस्कृति एवं उत्कर्ष परिषद

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Sunday, August 30, 2020

सामाजिक शख्शियत: श्री जयपालसिंह पटले

 सामाजिक शख्शियत: श्री जयपालसिंह पटले

    श्री जयपालसिंह धाडूजी पटले का जन्म ग्राम सालेटेका, तहसील-वारासिवनी ,जिला- बालाघाट में १७ जुलाई १९२५ को हुआ था। उन्होंने सन १९५६ से १९९३  ,,तक MSEB में कार्य किया। वे सेवानिवृत्ति के उपरांत में नागपुर में साहित्य सृजन और ईश्वर भक्ति के साथ अपना अपना सुखमय जीवन व्यतीत कर रहे हैं। 

    उन्होंने अपने सम्पूर्ण जीवन समाज की सेवा और साहित्य सृजन के लिए अर्पित कर दिया है। उन्होंने पोवारी, मराठी और हिंदी भाषाओं में लेखन का कार्य किया है। साहित्य के साथ उनकी विशेष रूचि भजन और कीर्तन में रही है। उन्होंने वंदनीय राष्ट्रसंत श्रीतुकडोजी महाराज द्वारा रचित ग्रामगीता का पोवारी में अनुवाद किया। 

    इसके अतिरिक्त पोवारी गीत गंगा, एवं राजाभोज गीतांजलि नामक काव्य संकलन श्री पटले जी के द्वारा लिखा गया है. उन्होंने गीत रामायण और श्रीमद्भागवतगीता सार का पोवारी बोली में अनुवादित किया. उनके द्वारा लिखित और अनुवादित  पोवारी साहित्य, क्षत्रिय पोवार पँवार समाज के लिए ऐतिहासिक धरोहरें है।हम सभी उनके दीर्घायु होने की कामना करते हैं.

तथ्य संकलन : श्री ऋषि बिसेन, नागपुर

पोवार इतिहास, साहित्य एवं उत्कर्ष समूह




Saturday, August 15, 2020

पँवार श्रीराम मंदिर बैहर

 
 पँवार श्रीराम मंदिर बैहर 

मध्यप्रदेश में बालाघाट जिले के बैहर नगर  में सिहारपाठ की पहाड़ी पर सन 1909 में क्षत्रिय पंवारों के द्वारा भगवान श्रीराम के मंदिर का शिलान्यास किया गया था.मंदिर का निर्माण कार्य 1912 में पुर्ण हुआ. इस पहाड़ी पर हमारे पूर्वजों के द्वारा 20 एकड़ जमीन खरीदकर एक पँवार वंशीय तीर्थ स्थल का निर्माण किया गया है. 

प्रतिवर्ष रामनवमी के अवसर पर यंहा मेले का आयोजन होता है जहां  दूर दूर से स्वजातीय बंधू यंहा आकर भगवान श्रीराम की पूजा अर्चना करते है. पंवार राम मंदिर ट्रस्ट, बैहर इस स्थल में सभी मंदिरो का रखरखाव एवं व्यवस्था  का कार्य करता है.

यह तीर्थ स्थल इन अग्निवंशीय पंवारो की जन्मस्थली आबू पर्वत की याद दिलाता है. देश के विभिन्न क्षेत्रो से पंवार यंहा आकर बाबा सिहरपाठ के दर्शन कर १५० सीडियो पर चलकर श्रीराम मंदिर के दर्शन हेतु चढाई करते है. पहाड़ी पर माँ दुर्गा और हनुमान जी के सुन्दर मंदिर हैं. ऊपर जाने के लिए सड़क मार्ग भी जो बहुत ही सुन्दर है. 

जय श्रीराम !!! 

जय क्षत्रिय पँवार(पोवार) राजवंश 

✍🏼ऋषि बिसेन

नागपुर 


Monday, May 25, 2020

मध्यभारत के पँवार क्षत्रियों की कुलदेवी

      
उज्जैनी नगरी पँवार शासक महाराज विक्रमसेन विक्रमादित्य की नगरी थी और उनकी माँ हरसिद्धि देवी तथा माँ कालिका देवी उनकी आराध्य थी। कहा जाता हैं की कुलदेवी माँ हरसिद्धि भवानी के सम्मुख महाराज विक्रमादित्य ने अपना शीश अर्पण किया था। 

महाराजा भोजदेव ने अपनी राजधानी उज्जैन से धार स्थान्तरित की थी और वहां माँ गढ़कालिका का मंदिर बनवाया था। पौराणिक कथाओ के अनुसार महाराज जगदेव पँवार ने १०९५ ईशवी में सात बार अपना शीर्ष माता गढ़कालिका के चरणों में अर्पण का प्रयास किया और हर बार माता ने राजा को बचा लिया।  भाटो के अनुसार आठवीं बार में माता ने उनका शीश स्वीकार कर अपने चरणों में स्थान प्रदान किया और यह घटना दिन रविवार को ११५१ विक्रम संवत, माह चैत्र को हुई थी। 

मध्यभारत के पँवार, मालवा से आकर इन क्षेत्रों में बसे थे और आज भी ये अपने पूर्वजों की कुलदेवी माँ गढ़कालिका को अपनी कुलदेवी मानते है।  इन क्षेत्रों में हर सामाजिक कार्य माँ गढ़कालिका की आरती के साथ ही आरम्भ होते हैं। 

जय माँ गढ़कालिका, जय माँ हरसिद्धि भवानी 
जय अग्निवंशीय पँवार(परमार) क्षत्रिय

✍ ऋषि बिसेन , नागपुर

Sunday, May 24, 2020

पँवार(परमार) राजवंश: विदर्भ/मध्यभारत महाराज लक्ष्मण देव पँवार


महाराज उदयादित्य परमार के पुत्र और महाराजा भोजदेव  के भतीजे, राजा लक्ष्मण देव पँवार सन १०८६ में धार के राजा बने. उनके और उनके भाइयो राजा जगदेव पँवार और राजा नरवर्मन् देव के बीच धार के उत्तराधिकार के लेकर विवाद उत्पन्न हो गया था. इसी विवाद में समझौते के प्रतिफल के रूप में राजा नरवर्मनदेव को धार की जबकि राजा लक्ष्मण देव को नगरधन/नंदिवर्धन (विदर्भ) की रियासत सौंपी गयी.

शन १०९४ में राजा लक्ष्मण देव पँवार को नगरधन का राजा बनाया गया. उस समय नगरधन, विदर्भ की राजधानी थी जो वर्तमान नागपुर के पास थी. राजा लक्ष्मण देव ने विदर्भ और आसपास के कई क्षेत्रो को जीत लिया था.

राजा लक्ष्मण देव पँवार ने राजा भोज के वैभव और पराकष्ठा को मध्यभारत में पूरी तरह से प्रचारित  कर आर्यन संस्कृति का इन क्षेत्रो में प्रचार किया. पँवार क्षत्रिय राजवंश की विदर्भ में पूरी तरह से उन्होंने नींव रख दी थी. यंही वजह थी की उनके भाई महाराजा जगदेव पँवार भी विदर्भ के चंद्रपुर जिले के गढचांदूर नामक किले से दक्षिणी भारत और मध्यभारत पर राज्य किया.

लक्ष्मण देव ने शन ११२६ तक विदर्भ पर शाशन किया और उनके बाद राजा जगदेव पँवार ने उत्तर भारत के साथ ही इन क्षेत्रो पर शाशन किया.

आज भी महाराजा भोज, राजा लक्ष्मण देव पँवार के वंशज बहुत बड़ी संख्या में महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश के इन क्षेत्रो में निवास कर परमार/पँवार वंश की विजय पताका को लहरा रहे है .

- ऋषी बिसेन नागपुर

Wednesday, May 20, 2020

क्षत्रिय पँवार और खेती किसानी

         पँवार क्षत्रिय हैं और उनका मूल कर्तव्य क्षत्रिय धर्म का पालन करना है. क्षत्रिय धर्म के कर्तव्य शासन के साथ सभी की सुरक्षा और प्रकृति का सरंक्षण भी हैं. पँवार राजवंश के बिखराव के बाद इन क्षत्रियों ने आश्रयदाता राजाओं के साथ रक्षाभागीदारी की और कृषि कार्य आरंभ कर दिए. 

नगरधन/नागपुर के पँवार योद्धाओं को वैनगंगा घाटियों के क्षेत्र दिए गए थे जहां उन्होंने उन्नत कृषि कार्य कर इस क्षेत्र को धान का कटोरा बना दिया और आज भी विश्वप्रसिद्ध किस्म का धान्य उत्पादन कर रहे हैं जिसमे चिन्नोर, जिराशंकर, लुचई आदि प्रसिद्ध हैं. इसके साथ ही उन्होंने रबी की उन्नत खेती की है.

आज का पँवार/पोवार, खेती मेँ पारम्परिक और आधुनिक दोनों ही तरीकों को अपना रहा है. जनसँख्या बढ़ने के साथ खेती की जोत का आकर छोटा होने और मजदूरों के न मिलने से अब पारम्परिक खेती थोड़ी मुश्किल जरूर हुयी है पर अपने पँवार/पोवार भाइयों ने भी आधुनिक कृषि की ओर रुख कर दिया हैं. गहानी के लिए आधुनिक मशीनों का उपयोग कर मजदूरों की समस्या का समाधान खोज लिया हैं. और पँवार भाई कृषि की हर चुनैतियों से निपट रहें हैं.
 
जय पंवार जय किसान
- ऋषी बिसेन नागपुर

Wednesday, April 1, 2020

अग्निवंशीय पंवारो के वर्तमान जाति/गोत्र/सरनेम/कुल, शासकीय नियम और आज के वैवाहिक सम्बन्ध के सामाजिक और वैधानिक नियम

अग्निवंशीय पंवारो के वर्तमान जाति/गोत्र/सरनेम/कुल, शासकीय नियम और आज के वैवाहिक सम्बन्ध के सामाजिक और वैधानिक नियम

मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ शासन के अनुसार जाति  पोवार एवं पंवार( Powar & Panwar) है तथा महाराष्ट्र में पोवार( Powar) है और  शासकीय दस्तावेजों में यही नाम चलता है. 

मालवा में पंवार/पोवार जाति के लोग परमार उपनाम या सरनेम अपने नाम के आगे लगाते हैं. वर्धा घाटी( बैतूल, छिंदवाड़ा, वर्धा, नागपुर)के कुछ लोगो से चर्चा के बाद पता लगा की उनके जाति प्रमाण पत्र में जाति  भोयर और कुछ लोग जाति पोवार या पंवार लिखते है और नाम के आगे पवार उपनाम या सरनेम लगाते हैं. और भी समूह के सदस्य अपने जाती दस्तावेजों से बता सकते है. 

कई पोवार/पंवार/भोयर/भोयर जाति के लोग पवार या परमार सरनेम उपयोग कर रहे है और आज के शासकीय दस्तावेजों में यही दर्ज है. वर्तमान कानूनों नाम और सरनेम बदल तो सकते है पर जाति कभी नहीं बदलती और जन्म से मृत्यु तक वही रहेगी. अगर कोई लड़की अपनी जाति से बाहर विवाह करे तब उसकी संतान की जाति तो उसके पति की होगी पर लड़की की जाति कानूनी रूप से उसके पिता की ही होगी. 
वर्तमान में जाति राजपूत में पँवार या परमार उनकी गोत्र है और इन्हे अपने उपनाम या सरनेम के रूप में प्रयोग करते हैं. उसी प्रकार जाति मराठा में पवार एक कुल है वे सरनेम के रूप में पवार शब्द का प्रयोग करते हैं. वर्तमान की राजपूत और मराठा जाति में अपने पँवार या पवार गोत्र के बहार दूसरे गोत्र में शादी करते है यानि उनके यहाँ पँवार या पवार गोत्र या कुल की लड़की शादी के बाद पँवार(परमार) या पवार नहीं रह जाती बल्कि अपने पति के गोत्र की हो जाती है. जैसे अगर किसी पंवार गोत्र की शादी अगर तोमर गोत्र में हो जाये तो वो विवाह के बाद तोमर हो जाएगी और उनके बच्चे तोमर होंगे.

जबकि आज के परदृश्य पंवार/पोवार/भोयर/भोयार जाति में उनके अपने कुर/सरनेम या गोत्र हैं और उनसे बाहर विवाह होता है पर जाति  जीवन पर्यन्त पंवार/पोवार/भोयर/भोयार ही रहेगी.

ऋषि बिसेन 
नागपुर

Wednesday, March 25, 2020

बैहर - परसवाडा क्षेत्र के पंवार

सतपुड़ा की घनी वादिओं में बसा बैहर क्षेत्र प्राकृतिक संसाधनों और सौंदर्य से परिपूर्ण हैं. ब्रिटिश सरकार ने सतपुड़ा की पहाड़ियों को चीरती हुयी सड़कों का विकास किया ताकि वें इस क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों का उपभोग कर सके. पूर्व में ये क्षेत्र गोंड राजाओं के अधीन थे और बाद में मराठाओं ने इन पर नियंत्रण किया. मराठाओं ने राजपूत पंवारो को कटंगी, बालाघाट, वारासिवनी और लांजी क्षेत्रों में बसाया था. मराठाओं के बाद इन क्षेत्रों पर ब्रिटिश नियंत्रण हो गया और उन्होंने बैहर क्षेत्र पर नियंत्रण के लिए राजपूत पंवारो को बैहर क्षेत्र में बसने के लिए प्रेरित किया.

बालाघाट जिले के उपायुक्त कर्नल ब्लूमफील्ड ने 1870 के आसपास पंवार राजपूतों को बैहर क्षेत्र में बसने के लिए प्रेरित किया और सर्वप्रथम श्री लक्ष्मण पंवार परसवाड़ा क्षेत्र में बसे. इसक बाद  बैहर क्षेत्र में पंवारो को कई गाँवो की पटेली/ मुक्कदमी/ जमींदारी दी गयी जो कृषि प्रधान ग्राम थे. 

बैहर मुलत: मुस्लिम बस्ती थी जहां पर मुस्लिम पटेल थे. परन्तु आज यह पंवारो की तीर्थस्थली है और आसपास के बहुत से पंवारो ने बैहर को अपना मूल निवास बना लिया हैं.

25 जनवरी  1910 को सिहारपाठ बैहर,जिला-बालाघाट में श्री गोपाल पटेल ने पंवार  समाज की बैठक बुलाई थी जहां इस पहाड़ी पर समाज के द्वारा राममंदिर बनाने का निश्चय किया गया और इस पँवार संघ के नेतृत्व में 1913 में  सिहारपाठ पहाड़ी, बैहर पर राममंदिर का निर्माण कार्य पूर्ण हुआ.

बैहर नगर के आसपास करेली, खोलवा, गुराखारी, नेवरगांव,जत्ता, शेरपार, कोहका, केवलारी, गोवारी, गोहरा, भंडेरी आदि गाँवो में पंवार निवास करते है. बैहर से पूर्व की और बढ़ने पर मोहगांव, मलाजखंड से लेकर दमोह, सालटेकरी तक कई पंवार बस्तिया है जंहा बहुत बड़ी संख्या में पंवार निवास करते है जिनमे दूधी,बिरसा, बाहकल, पल्हेरा, सारसडोल,सुंदरवाही,टिन्गीपुर,बिसतवाही,बोदा,चक्रवही,भटलाई,जैटपुरी,करमसरा, पौनी,रेहँगी,शाखा,सरसडोल,चारटोला आदि हैं. बैहर से गढ़ी की तरफ पंवारो का बसाव कम हैं.

परसवाड़ा क्षेत्र सबसे ज्यादा कृषि प्रधान क्षेत्र है इसिलए परसवाड़ा से लेकर लामता, चरेगांव तक वैनगंगा नदी के पूर्वी क्षेत्रों में पंवारो का विस्तार होता गया. वैनगंगा नदी के पश्चिमी क्षेत्रों में पंवारो का बसाव मराठा काल में ही हो चुका था जो कटंगी और बरघाट के पंवारो का विस्तार था. लामता से परसवाड़ा के बीच सतपुड़ा की पहाड़िया है और पुन: परसवाड़ा का पठार है जो समतल है इसीलिए परसवाड़ा के आसपास बहुत से पंवार बहुल गॉव बसे जिसमे लिंगा, पोंडी, बघोली, चीनी,भीड़ी,भोरवाही आदि प्रमुख है. परसवाड़ा विकास खंड में डोरा के आसपास भी कुछ पँवारो के गांव हैं जिसमे अमवाई, केशा, डोहरा,फंडकी आदि प्रमुख हैं.

अरंडिया,बड़गाव,भादुकोटा,भमोड़ी,भीकेवाड़ा,चनई,चंदना,दलवाड़ा,धुरवा,दिनाटोला,जगनटोला,जैतपुरी,झिरिया,कलेगाव,कतलबोडी,लत्ता,लीलामेटा,मजगाव,मानपुर,मोहगाव,पिंडकापार,सलघट,सरेखा,सिंघई,सुकड़ी,खापा,खर्रा,खुरमुण्डी,कोसमी,कुमनगांव आदि परसवाड़ा क्षेत्र के गावों में भी बहुत बड़ी संख्या में पंवार जाति के लोग निवास कर रहे हैं.

बालाघाट की सतपुड़ा की घाटियों को पार करते ही सर्वप्रथम उकवा क्षेत्र आता है जिसके आसपास कई बड़ी पंवारो की बस्तिया है जिसमे समनापुर,रूपझर, पोंडी, सोनपुरी, दलदला आदि प्रमुख है. 

बैहर तहसील में पंवारो के बसाव के बाद यहां सर्वप्रथम उन्हें आदिवासिओं के साथ सामजस्य करना पड़ा और धीरे धीरे बैहर तहसील की छत्तीसगढ़ी-गोंडी संस्कृति के साथ घुल मिल गए. पंवारो की बोली में छतीसगढ़ी बोली के कई शब्दो का मिश्रण होता गया जिससे बैहर क्षेत्र की पोवारी बोली का स्वरुप अन्य क्षेत्रों से थोड़ा भिन्न होता गया. 

समय के साथ सतपुड़ा पर्वत ने बैहर और बालाघाट क्षेत्र के पंवारो के मध्य कुछ दूरिया भी बढ़ा दी है परन्तु सामाजिक एकीकरण के दौर और क्षत्रिय पँवार तीर्थ स्थल बैहर ने सबको फिर से एकीकरण की ओर अग्रसर किया हैं.

                       प्रस्तुती- ऋषि बिसेन 
                                 नागपुर

कृष्ण अना गोपी

मी बी राधा बन जाऊ बंसी बजय्या, रास रचय्या गोकुलको कन्हैया लाडको नटखट नंदलाल देखो माखनचोर नाव से यको!!१!! मधुर तोरो बंसीकी तान भू...