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Thursday, July 30, 2020

शहाणी माय chhaya pardhi

शहाणी माय

राजू : आईं आईं, कोन आय त बुडगी शहानी माय आई से ,बडी सुंदर से देखनला,,, मिठो बोलसे ,,,कोण आय त कजाने….. कनाय रही से….जोर लक

शेवंता : कोन आय त  बेटा…. आऊसु मी,,,,बस कव उणला ,पाणी दे थंडो…

राजू : शहाणी माय बसो, खुरचीपरा ,,,,मोरी आई आवसे आब….

शेवंता : शहाणी माय मी ओरखेव नही  तूमला,,,पर असो लगसे मी तुमला लहानपण पासून ओरखुसू…

शहानी माय : बेटी थोडोसो दम धर,, आपलो दिमाग पर जोर दे…. तुमरा कोनी धारा नगर मा रवत होता का बेटी.??

शेवंता : हो ,,शहाणी माय आमरा पूरखा धारा नगर लक इतन आया होता,,,,,वैनगंगा को किनारो पर. याहानिच खेती बाड़ी करीन ना यहां काच भय गया.

शहाणी माय : बराबर कयेस बेटी…..तुमि छेतीस कुर् का पोवार इतन बस गयात ,,,,,,,अखीन काई याद अावसे का बेटी???

शेवंता : हो शहाणी माय,,,,,, आमरी छेतिस कुर वालो की एक बोलीभाषा से……. पोवारी

शहाणी माय : आता ओरखेस बेटी मी कोण आव त…..

शेवंता : शहाणी माय,,,, ओरखेव आब,,,,,तुमि आमरी पोवारी माय आव….पर तुमरी हालत कसि भई माय…...की ओरखु नहीं आवो... तुमला इलाज की जरुरत से माय….

    (....माय रोवसे……...)

शहाणी माय : हो बेटी,,,,,,आब मोरा टूरू सिक्या पढ्या ...पर आता मोला भुलन बस्या,, उनला शरम लगसे आब बोलनला…मुनआब मरणला टेकी सेव बेटी…..

शेवंता : नोको रोओ शहाणी माय …..आमी बचावबिन तूमला  ,राजू इतन आव बेटा... जाय वय डाक्टर इतिहासकार,,, डाक्टर साहित्यकार,डॉक्टर,,,,,डॉक्टर उत्कर्ष ला बूलाव जल्दी,,, अना उनको संग काका,काकी सबला बुलाव 

शहानी माय  : तोला मोरो आसिर्वाद से बेटी,,,,,

सौ छाया सुरेंद्र पारधी

Tuesday, May 19, 2020

नवविवाहित जोडी का पोवारी दस्तूर

आंधी को राजमा आमरो पोवार मा बिहया लहानपण होत होता. नवरदेव नवरी की उमर लहान रवत होती मून काही दस्तुर करत होता. हर दस्तूर साती सुसरो बहुला खास खासर लका आननला  जात होतो.
 
वय दस्तूर असा उपरोक्त प्रकार

नवरचुडा :-  नवीन नवरीला कचार बुलायकर नवीन बगडी हातभर भर देनको दस्तूर.आठ पंधरा दिवस को बाद मा नवरी को अजी आननला आवत होतो.ना नवरी मायघर जात होती

गौर :- मायघर येव दस्तूर होत होतो.येला गौर उमजवनो कवत होता.

शिवरात्री मा "जोड़वा को नेंग साती नव विवाहिताला आनेव जात होतो.

अखाडी :-  येन दस्तूर को बेरा नवीन नवरीला सुसरो घर अानेव जात होतो. मातामाय जवर सुवारी (पूरी) नवीन नवरी बाटत होती.

दसवी :-  दिवारी मा दसवीं को नेंंग होत होतो.घर भर का सब बहुका पैसा लका पाय लगत.

चौमास :- उन्हारो मा बहू चौमास की आनलला जात होता. नवीन बहू आपलो संग संदूक , खाजों (चिवड़ा,लाडू, अनरसा,सेव) आनत होती.नवीन बहू का सब पैसा लक पाय लगत. बहू मायघरल आनेव ख़ाजो सबला बाटत होती. हात लका बनाया बिजना,धागा का बनाया झोरा देयकर सासू सुसरो अना अन्य मानवाईक ला बाटत होती.सब नवं जीवन साती आशिर्वाद 
देत होता.

लेखिका: सौ. छाया सुरेंद्र पारधी

Thursday, March 19, 2020

गठबंधन


          इतन उतन  चहलपहल.कोनी सरबत बनावत होती ,कोनी पान बनावत. बिहया को मांडो सजेव होतो. नवरदेव आवनकी बेरा भईती. दूर लकच  बॅडबाजा की आवाज दुर्गा को कान् मा पड़त होती. तसोतसो वा अधिकच कावरी बावरी होत होती .दुर्गा को मनमा भावनाओ़ को तूफान अधिकच उबलत होतो. आपलोच  तांद्री मा गतकाल को चित्र झर झर डोरा को सामने आयेव्.                                                                        ……….देखनला  दुर्गा गोरीपान ,  शिक्षण बारवी पास, शिकन    कि  इच्छा, राघव सारखो चांगलो टुरा को रिश्ता आयेव मुन अाईबापन दुर्गा कों बिहया मोठो धूमधाम लका करीन.
……...नवो नवलाई का दिवस पंख लगायकर उड़ गया. आता दुर्गा मातृ स्पर्श लक भर गई .दुय महीना को गर्भ आेको गर्भ मा पलत होतो. सब सुंदर सपन सारखो दुर्गाला भासत होतो. राघव भी सरल स्वभाव को होंतो. दुर्गा की लहान मोठी सब इच्छा पुरावत होतो.
……..एक दिवस दुर्गा को संसार ला नजर लगी.  होतो को नोहतो भयेव .राघव ला चक्कर आयेवं.डॉक्टर कर लेगेव परा मालूम भयेवं की ओला रक्त कर्करोग से .दुर्गा को पाय खालत्या की जमीनच सरकी…...
तीन महिना माच राघव गयेव….दुर्गा एकटी पडी.  येत्तो मोठो दुनिया मा आता आंसू बहावत गुमसुम सी पड़ी रव दिन दुनिया की काई खबर नोहती.  
…….सासू सुसरो भी चिंतित होता की आखिर पहाड़ सरीखी जिंदगी दुर्गा कसी काटे. आता दुर्गा साठी काही तरी करे पाहिजे दुर्गाला बहू बनायकर आन्या, आता बेटी बनायकर बिदा करके आपलो फर्ज पुरो करे पाहिजे. असो बिचार करके टूरा देखन सुरु करीन, पर योग्य टूरा भेटेव नहीं. कोनी उमर मा जादा त कोनी दुर्गा को पोटमा को अंश सहित अपनावन तयार नोहता. बड़ों मुश्किल लक येव चांगलों टूरा भेेटेव अना दुर्गा का जसी से तसी अपणावन तयार भयेव्.
…"दुर्गा ,चल बेटा आता"आवाज न दुर्गा की तंद्रि भंग करिस. दुर्गा भरेव मन लका मंडप कन निकल पड़ी येन सोच मा की,"आपलो टूरा को दुःख भुलायकर फक्त मोरो जीनगी साठी ये मोरा सासू सुसरा केत्तो त्याग कर रह्या सेत "दुर्गा दुख भुलयकर नवों दिशा कर चली,नवजीवन मा पदार्पण करन,,,

   - सौ. छाया सुरेंद्र पारधी 

प्रेमविवाह

                              प्रेमविवाह
    राती का बारा एक बजे को समय रहे.संगीता को घर का सब लोग सोया होता. दिनभर को काम को थकान लक संगीता ढार- ढुर सोईती. जवड़च ओकी बीस साल की बेटी काव्या सोईती . अनिल भी आपलो खाट पर सोये होतो…..एक मध्यमवर्गीय परिवार जो सुखी दिसत होतो……

      काव्या को बिहया जुडेतो... टुरा बँक मा निबंधक होतो..मार्च महिना को दस तारीख ला बिहया निश्र्चित भयेव...घर भर का सब खुश होता. बिह्या को काममा दिनभर सब व्यस्त होता. मुनच सब गहरो झोप मा होता…..

रात का दुय बज्या रहेत. ...एकदम कुत्रा को भुकन को आवाज आयेव..पर अनिल अन् संगीता घोर निंद्रा मा होता…. वय " टस का मस "नहीं भया……….
झुंनझुरका की बेरा, कोंबड़ा आरायेव तसोच संगीता ला जाग आई. डोरा कुस्करत वा उठी जवड देखिस, काव्या नोहोती ..संगीता ला लगेव इतन उतन रहे….पर बहुत बेरा भई काव्या कहिच  दिसिच नहीं संगीता को ' पाय खालत्या की जमिनच सरकी"......चारही आंग् धुंडिन तब एक चिट्ठी हाथ मा लगी….."आई ,मी घर सोडकर जाय रही सेव,मी तुमला केत्तो बार सांगेव ,मी अंकित संग बिह्या करून, पर तुमि ,अंकित दीगर जात को आय ,गरीब से मुन मान्यात  नहीं... मुन मी अंकित संग बिह्या कर रही सेव".....घड़ी भर माच संसार की घड़ी बिखर गई खुशी की घड़ी दुख मा बदल गई .सब आंग ढूंढेव पर भी काव्या नहीं भेटी . येत्तो साल की कमाई इज्जत पानी मा मिल गई…………….धिरू धिरु समय बितन लगेव….बेटी की याद काई कमी होत नोहोती.

     दुय साल बाद  संगीता काम साती जवड को शहर नागपूर मा आई.. पैदल जाता जाता एकखट्टे वोकी एक भाजीवाली को टोपला ला जोरदार टक्कर लगी, ना टोपला को भाजीपाला बिखर गयेव.जल्दी जल्दी मा 
भाजी वाली आपलो भाजी पाला उठावन लगी ,संगीता ला वा भाजीवाली पहचान की लगी. जसी उठी वा तसी 
संगीता ला आश्चर्य को धक्काच बसेव वा काव्या….. वोकी बेटी…..

"पुत्र कुपुत्र होय सकसे पर माता कुमाता नहीं होय सक"... दूही का आंसू झरन लग्या. काव्या न सांगीस की तीन चार दिवस त मज्यामा गया .अंकित को घर सब काम पर जानेवाला मजदूर होता. पर आमरी जात का ना उनकी जात का सब परंपरा अलग अलग. अंकित दारू पिवत होतो…. रोज मारनो पिटनो एक दिवस मोला घर को बाहेर काहडीस ...गाव वापस त् आय नहीं सकु... मुन भाजीपाला बिककर आपलो गुजारा करूसु..दुही को नयन की धारा रुकत नोहोती……...काव्या बिचार करत होती "अब पछताये क्या होत जब चिडिया चुग गई खेत"

               ✍️सौ छाया सुरेंद्र पारधी✍️

भुली बिसरी याद

                       भूली बिसरी याद

अज बसे बसे याद आई मोरी माय, मंजे मोरो आजी की. उन्हाळो को छुट्टी मा आमी गावं जाजन् सब का घर जवड़ जवड़…. काका ,काकी माहलपा, महालपी, बड़ीमाय, बडोजी, मोरा बहिन, भाई सबजन् रवजन् . बड़ी मज़ा आव्

       तब टीवी नोहतों, होता मस्त मस्त खेल, …..चौरस ,चोर पुलिस, कनचा, बिट्टी दांडू ...एक खेल बड़ों अनोखो होतो. होळी होयेपरा परसा को झाडला शेंग लगत् . शेंग परिपक्व होत्.. वय् शेंग जमा करनों, उनला फोड़नो, आंबा को गुईला फोड़कन बिजी निकालनो,नहीं त मगं मोहू की टोरी फोडनो मा मज़ा आवं…… दुपारी बरफ वालो को आवाज आयेव , तसोच  सबजन फोड़ी बिजी बरफ वालों ला देयकर बरफ लेजन ,मेहनत को पैसा को बरफ खानला बड़ी मज़ा आव्……..
         दुपारी सबजन लेटपेट होतं, तबं मोरी माय कथडी शिवत होती. कथडीला चारही बाजूला सुंदर कपड़ा की रंगबिरंगी फुली लगावं. बडो प्रेम  लक एक एक धागा लका , कथडी को येळा भर्.

        एकबार असोच दुपारी आमी बस्या होता, मी मायला बिचारेव,. "माय तोरो संदुकमा का- का सेत, देखावना मोला" मोरी उत्सुकता देखकर मायनं आपलो चाबी को झोक़ आनीस अना संदूक खोलिस. संदूक देखस्यानी मी त दंगच भय गई.संदूक को पल्ला परा बाबूजी,फुफू‌ की जन्म तारीख लिखी होती... संदूकमा  मी कभी देखे नोहतो असो भी सामान होतो... एक सुंदर चौकोनी थैला सारखो, ओला सुंदर दोरी, आटी वाली…. माय ला मोरी उत्सुकता दिसी अन मग सांगण बसी,,,,,"बेटी, येला झोलना अन येव लहान वालोला खलता कसेती,जब् नवरदेव बीह्या लगावन साठी सार होत होतो, तब झोलना मा चाउर पठावत होता. दवडी, बिवडा मा झोलना ठेवत होता. "   …...मग मोला बिजना दिसेव गोल गोल, वोला बेरू की दांडी, उत्तम धागा की नक्काशी होती. माय न सांगीस पहले आमी खाजो मा बाटत होता. खजिना मा अदीक अत्तर दानी, सिंगार पेटी, कासो की भानी, टमान,पितर को गंगार, कासो की बटकी, भरता किंवा गिलास,  तांबो को गडू, पहले का चांदी का सिक्का ,एक पैसा , दुए पैसा, पांच पैसा, दस पैसा की एक पिवसी, जवड़च पोहरा का लाल मणी अन जापता लक ठेये होतो,... हिड्डा ना पिट कवड़ी….

                  - सौ. छाया सुरेंद्र पारधी

कृष्ण अना गोपी

मी बी राधा बन जाऊ बंसी बजय्या, रास रचय्या गोकुलको कन्हैया लाडको नटखट नंदलाल देखो माखनचोर नाव से यको!!१!! मधुर तोरो बंसीकी तान भू...