Sunday, February 14, 2021

झोरा

पिरम को झोरा

बाई मोरो माहेर माहेर 
सुख समृद्धी को झोरा
भाई भोवजाई रामुसिता
माता पिता अनमोल मोरा

झोरामा लहानपणकी याद
भाईसंग रमकेव चौसरको खेल
नहीं झगडा भयेव् आमरों बाई
भाई संग से जीवनभर को मेल

माहेरको झोरामासे भक्ती भाव
पिता मोरा संत किरतनमा दंग
माय माउली मोरी सादीभोळी
पदरमा ओको सुख का सब रंग

माहेरको झोराला भाऊक किनार
भजा भजी लक भरेव से पंढरपूर
दुय दिवस महेरका भेट विठ्ठलकी
प्रेम भाव लक भर जासे मोरो उर

सागरला भेटन नदी रूप लेयकर
टुटेव मोहपाश सोड आयी माहेर 
तरी मन मोरो पाखरू बनकर
भाप बनकर उड जासे मायघर

✍️✍️सौ छाया सुरेंद्र पारधी

झोऱ्या

मन उडत उडत 
जासे किडनगीपार गाव
अजी को हातमा
बजार को झोरया देखकन
मोरो तोंडमा पानी आव

मोरो इस्कुल को झोरया मा
रव्ह पाटी ना कलम
गुरुजीन लिखनला सांगिस
त मोरी सरसर कलम चल

कोणी पाहुना आया
त मी टुकुर टुकुर 
देखु उनको झोरया कण
अन खाजो भेट्यव खानला
त मंग बडी मजा आव

✍️ सौ. श्रुती टेंभरे बघेले

झोरा

झोरा मोरो खाली
मी मांगसू दान
आपलो परी देओ
राखो ऐको मान

पहले घर आयोव
वू प्रहरी को घर
पोवारी सरिता लक
भाऊ यन झोराला भर

दुसरो घर गयोव
भेटी वर्षाबाई,छाया माई
ज्योत पोवारी की या
पेटाव बडी बाई

तिसरो मोहलामा
सोनु भाऊ, दिपक भाऊ
समाज संघटन ला
कही नोको जान देऊ

उभा देवेंद्र भाऊ
तुम्ही गजल सम्राट
कर्मरथी तुमी
बढाव यन झोरा को थाट

सुफडा भरकन आयी
वंदनाबाई अना बिंदु बाई
पोवारी की स्वर्ण माटी
कहे धर मोरो भाई

ऋषी भाऊ, नरेश भाऊ,विशाल भाऊ
देईन पोवार की मशाल
राजा भोज का वंशज
जा उची ठेव पोवारी ढाल

गुलाब भाऊ डि.पी.राहांगडाले सर
पोवार भगिर्थी
ले पोवारी गंगा
सुजलाम सुफलाम कर धरती

महेंद्रभाऊ ओ सी पटले सर
देईन पोवारी धर्म पताका
जगाव जन जन
नोको डुबन देव पोवारी नौका

हिरदीलाल भाऊ, सी. चौधरी सर
पोवारी का वारकरी
झोरा मा देयकन दान
बण्या मोरा साथकरी

गोवर्धन भाऊ, डी. राहांगडाले भाऊ
देईन पोवारी गीता
होये धर्म को जीत
साक्षी गडकाली माता

रंदिप,पालिक सर,शेखराम सर
आयोव सिंदीपार गाव
देईन पोवारी परिस
बने पोवार की छाव

धन्य मोरो झोरा
फिरेव गाव गाव
सब पोवार भाई बहन न्
बनाईन यला देव

शेषराव वासुदेव येळेकर
दि १४/०२/२१

 झोरा

बहूत लहान होतो मी पयली मा
धरस्यानी जाऊ पुस्तकी झोरा मा
लोकर लका सीव् मोठी बहिन वोला
विद्या को साठा रव्ह झोरा मा

माय मोरी शिदोरी लिजाय वोकोमा
फाटेव, थेगुर लगेव रव्ह वोला
भाजी पालो साती देखेव वोला बजार मा
थैला को आसपास रहेव किशोरपणमा

युवा भयेव देखेव मी डोरामा
जवानी मोरी दिसी झोरामा
संकुचित भयेव आता घर मा
गृहस्थी बसायेव, व्याप्त भयेव झोरामा

अधेड भयेव देखेव आता रातमा
दिसेव आकाश प्रदिर्घ तारामा
जिवन मोरो आकाश नही 
समायेव मी व्याप्त आकार को झोरामा

झोरा देखव बचपन मा 
वोला समझेव जवानी मा
लाडू चिवडा साती झोरा बचेव बुढापामा
जाऊ मी बेटी घर, सुख का आसु रोये बेटी मोरी देख झोरामा...

~ विरेंद्र (भिमु) कटरे

झोरा 

पोता को रस्सी को झोरा मोला याद से
वोको मा वस्तु आनन लिजान को काम पडसे

कपडा को झोरा बजार मा जान साती रव्हसे
वोका मा आलु, बगन, भेदरा माय मोरी आनसे

भर स्यानी सिदोरी माय झोराला लिजासे
बहूत काम की चिज या, बहूत काम मा आवसे

आजा मोरो जब खाजो आन् वोकोमा 
मी बडो आस लेका देखु झोरामा

जिवन मा बहू महत्व झोराको
वोको बिन सामुग्री कसी साठाओ?

रंग रंग का झोरा देखेव 
लेकिन बस्तावालो झोरा मोला अज याद आयेव

                            - सोनू भगत


                  झो-या (झोरा,थैला)
                  ***************
झो-या रे झो-या  काय  तोरो तोरा
लहान ना मोठा रूप सेती  केतरा

कपळा का झोरा अलग अलग रंग
लटकावु, झोका देसेत हवाक संग

तोर बिना  दिवस नही जाय कोरो
बजार  जाऊन  त तूच संगी मोरो

तोर बिना बजारको ओझो आव नही
कान वाणी दीससेती कस्सा तोरा दुही

किराणो रव्ह या रव्ह भाजीपाला 
ठुसशान भरसेती,तकलिफ तोला

दुकान पर जाऊन तरी तोरोच काम 
मणुन का चढ्‌ गयेव तोरोच रे दाम

तोर बिना माहेरको खाजो नही आव 
जीन्दगी मा तोरो से रे भलतोच भाव 

झिल्‌ली का झो-या सप्पा बंद भया 
मणुनच सब कर सेती तोरीच माया.

पर्यावरण ला नाहाय धोको तोरलका 
जनताकी सेवा कर फळ भेटे बाका.
                 ******
डी पी राहांगडाले
     गोंदिया

पोता को रस्सी को झोरा मोला याद से
वोको मा वस्तु आनन लिजान को काम पडसे

कपडा को झोरा बजार मा जान साती रव्हसे
वोका मा आलु, बगन, भेदरा माय मोरी आनसे

भर स्यानी सिदोरी माय झोराला लिजासे
बहूत काम की चिज या, बहूत काम मा आवसे

आजा मोरो जब खाजो आन् वोकोमा 
मी बडो आस लेका देखु झोरामा

जिवन मा बहू महत्व झोराको
वोको बिन सामुग्री कसी साठाओ?

रंग रंग का झोरा देखेव 
लेकिन बस्तावालो झोरा मोला अज याद आयेव

                            - सोनू भगत

झोरा

लहानपन मा अजी, 
धरशान हातमा झोरा।
दुकान लका आन, 
नविन कपडा मोरा ॥

नविन कपडा देखशान, 
खुशी होय मनमा।
टाकशान देखु कपडा, 
पयले आपलो तनमा ॥

मामाजी आन झोरामा, 
चिवळा अना लाळू।
मायला चिपकेव रव, 
खानला आमरो बाळू  ॥

शाळा जाजन धरशान, 
पाटी पुस्तकको झोरा।
सब टुराईन को सामने, 
अभ्यास मा मोरो तोरा ॥

भाजी पालो आन माय, 
झोरामा जायशान हाट ।
बजारको खाजो साठी, 
देखजन आमी बाट ॥

झोरा धरशान पिवळो, 
पोस्टमेन जब आव। 
बाट देखजन चिठ्ठीकी, 
आवाज दे सबका नाव ॥

उपयोगी असो झोरा, 
आवसे सबको कामला ।
फाट जाये तरी आवसे, 
झाडू पोछा को कामला  ॥

इंजि. गोवर्धन बिसेन, गोंदिया (बडेगांव)


          विषय - झोरा
          ***********

टुरा क् लहानपण बाळतपण 
को सामान आवसे झोरा मा, 
खाजो खजकुलो बी आवसे 
बजार लक हर बार झोरा मा. 

स्कूल जानोपर दप्तर बी झोराच, 
कपडा लत्ता भरन को बॅग बी झोराच. 

दुकानल् किराना आनन साती झोराच, 
बजारल् सब्जी आनन साती बी झोराच. 

चक्कीपर आटा पिसन लिजान साती झोराच, 
खेतल् आंबा, टोरूंबा आननसाती झोराच. 

बॅग, सूटकेस बी एक प्रकार का झोराच, 
बोरा, बोरी, गोना बी मोठावाला झोराच. 

टुरी साती खाजो पठायेव जासे झोरा मा,
बहूसाती मायघरल् खाजो बी आवसे झोरामा. 

जेको मा कोणतोबी सामान आवसे वु झोराच, 
प्लास्टिक की पोतळी बी एक झोराच. 

बिह्या को सामान आननसाती झोराच, 
खाजो मा का झोलना, खलता बी झोराच. 

आखिर मा मय्यत को सामान बी आवसे झोरामा, 
मरघट मा खानका पोहा बी जासेती झोरामा. 


                      - चिरंजीव बिसेन
                                  गोंदिया.

पोवारी इतिहास साहित्य अन उत्कर्ष द्वारा आयोजित

  विषय: झोरा

बड़ो काम की चीज़ से बाई,
लाख काम मा आवसे,
कपड़ा लता भर बाई,
झोरा यो मोला कवसे।।

बचपन को संगी ,
होतो मोरो झोरा,
पाटी-पुस्तक धरस्यान,
जात होती शाळा।।

माय लिजाय ,
बाप की शिदोरी,
चटनी भाकर की,
रव वा जोड़ी।।

रहो पोता को,
या रव दोरी को,
उपयोग मा से,
बड़ो यों झोरा।।

    कु .कल्याणी पटले
   दिघोरी,नागपुर

झोरा 
वू कपडा ज्यूट को झोरा 
भूल गयात का गा?
आमरो जिगरी दोस्त
बांधीस जिनगी को धागा ||१||

बजार हाट जान साती
चौकोण्या बुड वालो
बटन चैन वालो 
नायलॉन को कसा वालो ||२||

झोरा का कई रूप सेती 
नहान अना मोठा
खलता झोलना पिवसी पोता
भिक्षू पांगुर को ओटा ||३||

फाटेव फुलपँटको झोऱ्यामा
लिजाया पिसावन
खेतमा लीजाया मोहू
टोरी तोर संगरावन ||४||

माहेरको खाजो को झोऱ्या
बाट देखं टुरी
खायके पिरेम का दाना
काया तिरपत पूरी ||५||

गरोमा हिलगेव लंबो
कसावालो झोरा
ऑफिस वरी टवसं वोला
कंबर को करदोरा ||६||

पाटी कलम पुस्तक भरेव
कपडा सुत को झोरा
इस्कूल म गायाता मटकात
इटकात छोरी छोरा ||७||

पोस्टमन झोरामा भरके
आनत होतो लेटर
झोरा बिणा सबको 
अड जात होतो खेटर ||८||

आता आया नवा नवा
रंगंरंग का थैला
काही फायबर का अना
प्लास्टिक का विषैला ||९||

हानिकारक प्लास्टिक कन
करके काना डोरा
अपनाओ पर्यावरण पूरक
कपडा ज्यूट का झोरा ||१०||
________________________________
डॉ. प्रल्हाद हरिणखेडे "प्रहरी"
उलवे, नवी मुंबई
मो. ९८६९९९३९०७

                झोरा

झोलना खलता की राज पुरानी भई
बदलेव जमानो झोरा की चलन आई

झोरा बन्या रंग नं रंग को कपडा का
टिकाऊ बडा खादी को धागा का
कभी हातकी तं कभी सिपीकी सिलाई

सूत को झोरा मोठो दिसनला सुंदर
कपडाको अस्तर लगावत वोको अंदर
कलाकुसर नक्षी की सें वोकी बुनाई

वायर को झोरा की चलन आयी बादमा
बजार-किराणा आणन लिजाती साथमा
झोरामा भरजन पाटी-पुस्तकं दौत शाई

झोराभर आवंसें माहेरको खाजो-खजुला
माय को ममता को अंश रवंसें वोला
खाजो आण सें बेटी घरं बाप-भाई

कपडा कागज को आता झोरा वापरो
पर्यावरण बचावनो सें फर्ज आमरो
झिल्ली लक कॅन्सर की बिमारी आई

                                    शारदा चौधरी 
                                         भंडारा

(झोरा/झोला/थैला)

पोतड़ी को सायनो अजी को झोरा,
वोको मा रहवत होतीन सपन मोरा.

मी होतो घरको एखलो नाती बाड़ू,
अजी आनत होतो कुटकी का लाड़ू.
मोरा सब सपन तब टूट जात होतीन,
आवत जब घर मोरी फूफू का टुरी-टुरा.

अजी जब भी हाट ल आवत होतीन,
झोरा ततरत होतीन सब नाती-नातिन,
मन ललच जात होतो झोरा ला देख,
सबला दिखत होतो अजी को कोरा.

अजी की आलमारी मा, कपड़ा को झोरा,
वोको मा कहानी-किस्सा हिनको पुड़ा.
सबकी जन्मतिथि, अंकसूची का कागज,
जमीन-जायजाद हिनका दस्तावेज़ पूरा.

पोतड़ी को सायनो अजी को झोरा,
वोको मा रहवत होतीन सपन मोरा.

तुमेश पटले "सारथी"
केशलेवाड़ा (बालाघाट)
दिनांक-14/02/2021

झोरा /झोला /थैला

मी सेऊ इक रंग बिरंगों कपड़ा को झोला,
अज को युग न जहर मोरी जिंदगी मा घोला l

सब मोला भूल गई सेत पालस्टिक की चमक मा,
यो साजरो नहाय मानुष तुम सबको  हक मा l
घुट घुट कर रहयो मी अब लक काही नहीं बोला l

मी सेऊ इक रंग बिरंगों कपड़ा को झोला,
अज को युग न जहर मोरी जिंदगी मा घोला l

समय बदलसे अन घुरा का भी दिन फिरसे,
अज प्रकृति तुम सबला सबक सिखाइरहिसे l 
केतरी  बिमारियों मा डूबी से तोरो या चोला 

मी सेऊ इक रंग बिरंगों कपड़ा को झोला,
अज को युग न जहर मोरी जिंदगी मा घोला l

आता  तुम सबला मोरी याद आय रही से,
मी खुश भी सेऊ बुराई की ईमारत ढही से l
घर मा बनाय लो तुम सब संगी साथी मोला l

मी सेऊ इक रंग बिरंगों कपड़ा को झोला,
अज को युग न जहर मोरी जिंदगी मा घोला l

इक बात कसू मी इक वादा तुम सब कर ल्यो,
तुम्ही सब पिलास्टिक ला बाय बाय कर ल्यो l 
प्रदुषण लक भी बचाऊ कह देसू मानुष तोला l

मी सेऊ इक रंग बिरंगों कपड़ा को झोला,
अज को युग न जहर मोरी जिंदगी मा घोला l
                अलका चौधरी
                  बालाघाट

    मेहनत को झोरा

भय गयी से बजार की बेरा,
देवो मोला आता मोठो झोरा ll

आनू आलु भट्टा अना भेदरा,
ज्यादा वजन होये टँगवू झोरा ll

पीठको आवसे पिसावन झोरा मा,
गावतर का कपड़ा  झोरा मा ll

फुफाबाई को खाजो झोरा मा,
किरानो सामान आवसे झोरा मा ll

पर्यावरण पुरक से आमरो झोरा,
बिसरो नोको बाजार को झोरा ll

सबको को डब्ब्बा लिजासे झोरा,
काम आवसे मेहनत को झोरा ll
************************
डॉ.हरगोविंद चिखलु टेंभरे
मु.पो.दासगाँव ता.जि.गोंदिया
मो.९६७३१७८४२४

विषय:- झोरा
शिर्षक:- आता एक झोऱ्या देय दे माय.....
******************************
आये बुढापा, थक जायेत हात पाय 
आता एक झोऱ्या, देय दे माय....||धृ||

आणू कसू बजारलक, लेयके बाली पोलका
जुता आननो सेत, चमडाको सोलका 
बजारलक आयेवपर, देजो दूधपरकी साय 
आता एक झोऱ्या, देय दे माय....||१||

झोऱ्या मोठा रंगीबेरंगी, या  पांढराफटक
कपडाका भया जुना, लगी प्लास्टीक चटक
फाट्या झोऱ्या खायके, मर जासेत गाय
आता एक झोऱ्या, देय दे माय....||२||

कपडालत्ता, पाटीपुस्तक, सब संभाल लेसे झोऱ्या
खाजोकी आस रव्हसे, भले रव्ह पायली सोऱ्या
प्रेमभाव को नातालक, पिलाय देवो चाय
आता एक झोऱ्या, देय दे माय....||३||

एक झोऱ्या असो देजो, जेकोमा संभालू नाता 
माणूस समजके सबको, चलावत जावू खाता 
समाधानी नेटवर्कको सबला देवू वायफाय
आता एक झोऱ्या देय दे माय....||४||
******************************
✍महेंद्रकुमार ईश्वरलाल पटले(ऋतुराज)
ता. १४/०२/२०२१


विषय-झो-या(दोरा ,थैला)
    काव्य प्रकार-अभंग

  विकास को झो-या

थैलायो कामको,बरसात मा मो-या
बजारमा झो-या, उपयोगी।।

लहान ना मोठा, अनेक आकार
निराड़ा प्रकार,दिससेती।।

बिह्यामा भी काम,तांदुळ भरनो
दस्तुर  करनो,खलताको।।

शाहानी मायकी,लहान पिवशी
शान बटवाकी, देखोजरा।।

बदल्या दिवस,झो-याभी बदल्या
बॅगरुप भया,सुटकेश।।

कपडा़ की जागा, लेदर दिससे
विकास भयीसे, कलाकारी।।

असो उपयोगी,झो-या यो सबला
सामान ठेवनला,बजारमा।।

""जय राजा भोज,जय माँ गड़काली""
वाय सी चौधरी
गोंदिया

Saturday, February 13, 2021

बसंत ऋतू


प्रस्तावना
भारत मा बसंत ऋतु मार्च, एप्रिल अना मे महिना को बिच थंडी अना गरमी को बिच मा आवसे. यन ऋतू ला सब ऋतु को राजा को रुप मा मानेव जासे अना युवाइनको की प्रकृती को रुप मा प्रसिद्ध से. 

हिवरो भरो बसंत ऋतू
बसंत ऋतू को मोसम मा तापमान सामान्य रव्हसे, न थंडी सारखो बहुत थंडो ना गरमी सारखो बहूत गरम नही लग. लेकिन बाद मा धिरु धिरु गरम लगनो चालू होय जासे. यन ऋतू मा राती मोसम अखिन भी अधिक सुहावनो अना आरामदायक होय जासे. बसंत ऋतू बहूत प्रभावशाली होय जासे:  जब यव आवसे त प्रकृती मा सबकुछ जाग्रत कर देसे. जसो झाड, गवत" फुल, फसल, पशु, मनुष्य ला मोसम की लंबी झोप मा लक जगावसे. मानुस नविन अना हलका कपडा वापरसेती, झाडईन परा नविन पत्ती अना शाखा आवसेती. फुल तरोताजा अना रंगिन होय जासेती. मैदान पुरो गवत लका भर जासे अना प्रकृती हिवरी भरी दिससे. 

बसंत ऋतू का लाभ
बसंत ऋतू चांगली भावना अच्छो स्वास्थ अना झाडईनला नविन जिवन देसे. यव यव सबसे अधिक सुंदर अना आकर्षक मौसम से. मधुमक्खि अना फिपोली कोवरी फुल को कलीईन को जवर पास मंडराव सेती. अना स्वादिष जुस (फुल की सुगंध) ला चुसन को आनंद लेसेती, अना शहद बनावसेती. यन मोसम मा लोक फलईनको राजा आंबा ला खान को आनंद लेसेती. कोयल दाट फांदी को झाड पर बसस्यानी गाना गावसे अना सबका दिल जित लेसे. दक्षिन को दिशा मा बहूत प्यारी अना ठंडी हवा चलसे अना आमरो दिल ला छुय जासे. यव लगभग सप्पायी धर्म को त्योहार को मोसम से. जेको दौरान लोक आपलो परिवार को सदस्य, सेजारी, रिस्तेदार संग मिलस्यानी चांगली तैयारी कर सेती. यव कास्तकार को भी मोसम से,  जब वय आपली फसल घर आनसेती अना काही राहत महसुस कर सेती. कविईन ला नविन नविन रचना करन साती नविन कल्पना भेटसेती; अना चांगली प्यारी कविताईनकी रचना करसेती. यन् मोसम मा मस्तिस्क बहूत अधिक कलात्मक ना चांगलो विचार लका भरेव रव्हसे. 

बसंत ऋतू को मोसम का नुकसान
बसंत ऋतू मा काही हानी भी सेती. जसा कि, मोसम ठंडि को मोसम मा को अंत मा सुरु होसे. अना गर्मी को सुरु होन को पयले आवसे. जेको कारन बहूत अधिक संवेदनशिल मोसम होसे. बहूत सी महामारी (छुत का रोग) वाला रोग जसा सामान्य सरदी, चेचक, चिकनपॉक्स, खसरा आदी रोग होसेती. येको साती आपरो स्वास्थ साती अतिरिक्त तैयारी करनो पडसेती. 

निष्कर्ष
बसंत ऋतू को मोसम सब ऋतृ को राजा रवसे. बसंत ऋतू को दवरान प्रकृती आपरो सबसे सुंदर रुप मा प्रकट होसे अना आमरो हृदय ला आनंद लका भर देसे. बसंत ऋतू को पुरो आनंद लेन साती आपरो स्वास्थ की देखभाल पयले पासुन करे पायजे. जेको साती आमला भिन्न छुत वाली बिमारी लका प्रतिरक्षा की व्हॅक्सिन लगाये पायजे.

~ लेखक >> भिमेंद्र कटरे

बसंत ऋतू chhaya pardhi 01


       ऋतुओं को राजा ‘वसंत आय।’ वसंत ऋतु थंडी को बाद मा आवसे। भारत मा फरवरी अना मार्च मा येन ऋतु को आगमन होसे। वसंत बहुत सुहावनो ऋतु से। येन ऋतु मा सम जलवायु रवसे। सर्दी अन् गरमी को मोसम को सुंदर मिलाप मंजे वसंत ऋतु आय। येन ऋतु मा प्रकृती मा अनेक बदलाव होसेतं मुन येन ऋतु ला ऋतु को राजा कसेत।

वसंत ऋतु आई बसंत ऋतु आई।
छमछम करती बसंत ऋतु आई।।                           अमराई मा  सुगंध मोहोर की छायी।
कुहू कुहू करत कारी कोयल आयी।।
बदलेव रंग प्रकृति को गुलाबी ठंडी न्यारी।
मनभावन रंगों लक सजी से  फुलवारी।।

  वसंत ऋतु बड़ी मनमोहक ऋतु से। गुलाब सेवंती, गोंदा सरसो सरीखा फूल फूल सेती। हवा मा सुगंध अन मादकता रवसे। पानझडी को येवच मोसम आय जुना पान झडकर नवी पालवी फुटसे आंबला बार अावसे। कारी कोकिला " कुहू कुहू" की रट लगावसे। नवी पालवी मन मा नवी आशा जगावसे वनस्पती जगत च नहीं त प्राणी, पक्षी मा भी नवी ऊर्मी रवसे। 

  येनच ऋतु मा आमरा आराध्य ,चौसष्ट कला का धनी, चौऱ्यांसी ग्रंथ का रचीयाता, जिनं एक रात मा चंपू रामायण की रचना करीन असो महाराजा भोज देव की जयंती गावं गावं मा साजरी होसे। वसंत ऋतु मा फागुन मंजे होरी को सन आवसे। सात रंग लक धरती आकाश झूम उठसे।

      गीता मा भगवान कृष्ण न कइतीस -ऋतुओं मा मी वसंत ऋतु आव । येन ऋतु मा वय ब्रजधाम मा गोपियों को संग नाचत रह्या रहेत । येन ऋतु म राधा शृंगार करकर  कृष्ण को संग रास करत रही रहे।
    
अज की शहरी संस्कृति मा प्रकृती का ये बदलाव नहीं देखन मिलत। शहर मा बिल्डिंग का जंगल ,काम काज की आपाधापी ,प्रदूषित वातावरण को कारण लोक ईनला वसंत ऋतु की शोभा देखन नहीं मिल। पर कभी समय मिले त प्रकृति को येन अनुपम रूप को आनंद जरूर लेव। वसंत सौंदर्य, उन्नति अना नवयौवन को ऋतू आय ।


✍️✍️सौ छाया सुरेंद्र पारधी

बसंत ऋतू D.P. Rahangdale 01


         एक सालका बारा महीना. ना बारा महीना का सय ऋतु.बसन्त, ग्रीस्म, वर्षा, शरद, हेमंत ना शीशीर. बसंत ऋतु   मार्च - एप्रील   मा आवसे. २२ मार्च ला 
दिवस ना रात   बराबर होसेती. मनजे  ओक  बादमा
दिवस मोठो ना रात लाहान होत ज़ासे.यन महीना मा ठंडी ना गरमी को  संगम  रव्हसे  मनजे ना गरमी ना ठंडी. मणजे गुलाबी ठंडी रव्हसे. वातावरण एकदम साफसुथरो प्रफुलीत् सुहानो होसे. वातावरण मा बदल होसे यको परिणाम आपल शरीर परभी होसे. यनच
 ऋतु मा होऴी. रामनवमी ना हनुमान जयंती सारखा सण आवसेती.
            बसंत ऋतु मा झाऴी जंगल मा  नवीनवीन पालवी  फुटसे. आंबाक  झाळला  बार आवसे ना
 जितन उत्तन वातावरण मा  सुगंध निर्माण होसे. 
कोयार पक्षी भी सुंदर गीत गाआवसे ना खुशीलका झाऴईन परा ईतउत चहकसे.यनच ऋतु मा परसाक झाळला रंगी बिरंगी फूल आवसेती. ओन फुलको होलीमा ठुड्‌डी  क दिवस रंग बनायशानी रंगपंचमी 
को त्योहार मनाव सेती.
                बसंत ऋतु मा कास्तकार क खेतमा 
खरीब की फसल लह-या मारसे. पोपट को फूल,चना,सम्बार की फसल ना ओला ठंडो हवाको झोका. खेतमा चना,लाखोरी को हुरडा भुजनकी,ना गरमगरम हुरडा खानकी मज्याच न्यारी से. मनुनच
 यन बसंत ऋतुला सब ऋतु को राजा कसेती.
                                *****
डी पी राहांगडाले
       गोंदिया

बसंत ऋतू varsha patle 01


चैत्र महिना म्हणजे वसंत ऋतू को आगमन. ऋतु म्हणजे *लावण्य महोत्सव*.
स्रूष्टीको रंग.रूप,गंध,रस,इनको लावण्यको महोत्सव.
     लेखीका दुर्गा भागवत इनं त् हर महिना ला एक एक विशेषण देई सेन. जसो चैत्र ला वसंतह्रूदय, वैशाख ला चैत्र सखा.
   वसंत उत्सव म्हणजे निसर्गको उत्सव .मराठी महिनो को पयलो महिना म्हणजे चैत्र महिना.वसंत को ऋतु .वसंत ऋतु मा निसर्ग को सौंदर्य मा च्यार चांद लग जासेत. जीत देखो उत हिरवी पिवरी लाली पसर जासे. निसर्ग रंग को उत्सव मा रंग जासे. हर झाड आपली जुनी कात झाड के एक नवो रंग रूप लका सुसज्ज होय जासे. येन ऋतु माच निसर्ग सौंदर्य डोरा भरके देखन मिलसे. असो लगसे स्रूष्टीको पाठपरा निसर्ग बडो प्रार लका हात फेरसे. आपुलकी अना मायालका. अना आपलो जीवन मा बी असोच वसंत ऋतु को आगमन होसे. निसर्ग सौंदर्य, रंग,रूप,गंध येको संगमाच आपलोला कोकीळ को मधूर स्वर आयकनला भेटसे. कोकीळ को मधूर गूंजन आयकके कान त्रुप्त होय जासेत. 
    वसंत ऋतु मा बीना बरसात झाड ला पालवी फुटसे.म्हणजे येव बी निसर्ग को एक चमत्कार आय. निसर्ग असो अनेक चमत्कार लका भरीसे. फक्त आपला डोरा वोला देखेत पायजे.
      गावको जंगल मा बाहा का पीवरा फुल अना गुलमोहर का लाल फुल देखके असो लगसे जसो निसर्ग मा हल्दी कुमकुम को कार्यक्रम च से. फल,फुल,की रेलचेल वसंत ऋतु मा रव्हसे म्हणून यन ऋतु ला मधुमास कसेत.
वसंत ऋतु मा मधुमालती का फुल बडा सुंदर दिससेत. वसंत ऋतुला सब ऋतु को राजा ऋतुराज कसेत. 
   येन ऋतु को लावण्य देख काही ओळी सुचसेत.

से कोणतो उत्सव
कायको सोहळा चलसे
नाना रंग मा नाहायके
आसमंत बहरसे

कोण पीवाईस अम्रूत
म्रूत झाडको खोडला
चराचर इतउत
हिवरा हिवरा सेत पाला

शीळ घालसे कोकीळ
रान मा पलास फुलेव
बाहावा अना गुलमोहर
बडो शान ल डोलेव


✍सौ.वर्षा पटले रहांगडाले
बिरसी आमगांंव
जि. गोंदिया

बंसंत ऋतू seshrao yelekar 01


वसंत ऋतू सृजन अना आकर्षण को ऋतू आय। फ़रवरी ते ऐफ्रिल तक चलनेवालो योव ऋतू राजा ऋतू आय।यन ऋतू ला भगवान क्रिष्ण भी कहे जासे। निसर्ग मा मनमोहक सुंदरता,हरा भरा फूल फल यन ऋतू की विशेषता आय।

वसंत ऋतू की सुरवात गुलाबी थंडी पासून होसे यन ऋतू मा प्रणय क्रिडा को आकर्षण प्राणी,पक्षी अना वनस्पति मा दिससे म्हणूण यन ऋतू ला कामदेव को पुत्र कहे जासे।

वसंत ऋतू को पहले पंचमी बहूत विशेषता पूर्ण से। वसंत पंचमी ला मा शारदा को जन्म दिवस मनाया जासे,वाग्देवी यन दिवस प्रगट होयकन पूरो सृष्टि मा सृजन शक्ति को संचार करसे।
वसंत पंचमी ला महाराजा भोज को जन्म दिवस को रुप मा मनायोव जासे।तसोच महाराष्ट्र पंढरपुर मा यन दिवस विठ्ठल रुक्मिणी को बाह्या लगायोव जासे।

वसंत ऋतू मा चैत्र नवरात्र की भी सुरवात होसे,होली शिवरात्रि सारखा महत्त्वपूर्ण त्योहार यन ऋतू राज मा मनाया जासे।
यन प्रकार वसंत ऋतू सुंगार,सृजन अना आकर्षण बरोबर भक्ति भाव लका मनायोव जासे।


शेषराव वासुदेव येलेकर

दि। १२/०२/२१

Tuesday, February 9, 2021

खराड़ी 24


खार(खाड्‌डी)
 तारीख:- 8/2/2021 
                       
खाड्‌डी कहु का कहु खारु ताई 
काहां ज़ासेसत  तु  घाई  घाई 

झाऴपरा बसेरा खालत्या वरत्या 
थकस नही का तु आवताजाता 

सरसर झाऴपर परात ज़ासेस 
पटन्यारी तु खालत्या आवसेस

दुय पायपर तु  उभी रव्हसेस 
ईतन उत्तन टुकटूक देखसेस

लहान लहान सेती तोरा ङोरा
लहानसा कान देखावसेस तोरा

आंबा टोरूंबा चावलक खासेस
कोणी आवसेका कानोसा लेसेस

लहानसो जिवसे पर  चतुर दिससे
तोरोमा भी भगवानको वास से
               
डी पी राहांगडाले
        गोंदिया


खाड्डी

नटखट बडी अलबेली 
छुईमुई की मुरत खराड़ी
पल मा छिप छिप जासे
फिरसे कुपाटी बाड़ी बाड़ी

चंचलता वा सतर्क नजर
कान टवकार कर देखसे
झुब्बेदार रेशमी लंबी पुसटी
नानाजी की मिशी लगसे

ठहर ठहर वा मज्या लक्
नाचत ठुमकत मस्त चलसे
फ़िरफिर देखसे इतनउतन
जसी नवरी सुसरो घरं जासे

खारू बाई तू आव ना इतन
खेल खेलबिन टाळी चटकाय
झाड़पर चंगके जाम तोड़जो
खाबिन तोंड मटकाय मटकाय

होये तोरो बीह्या तब मी आऊन
नवरानवरी साती अंगुर संतरा आणु
रहो सुखी समाधानी मोरो बगीचामा
तोरी मोरी दोस्ती जन्मभर की जानू

- सोनू भगत


खाडी

दाना,चना कुटुकुटुर
पटपट दात ल खासे
अजी को खोकला आयके
पटन्यारी झाडपर चग जासे

सुंदर सुंदर डोरालका
मुटुरमुटुर खाडी देखसे
घरपर वाराई माय की कुरोडी
चवलका मस्त खासे

जोडी लका फीरसे
झुपका वाली पुस्टी उठावदार
लहान टुरुपोटु करसेत
खाडी बाईको बडो लाड प्यार

फुदुक फुदुक छलांग मारसे
घडीभर यहा त घडीभर वहा
मोठो झाड को ढोली मा
खाडी बाई को बसेरा जहां वहां

फुर्ताई से काम मा बडी
समय की बडी पाबंद
कभी झाडपर कभी खालती
करो घडीभर डोरा बंद

सौ. वर्षा पटले रहांगडाले
बिरसी आमगांव
जि. गोंदिया

खाड्डी

सुंदर सलोनी प्यारी खाड्डी
आंगणमा मोरो खेल रही से
टुकुर् टूकुर् देखसे मोरोकन
जसो जनमो को मेल रही से

मखमली रेशमी पुसटी ओकि
जब् जब् मोरपंखसी फुलावसे
सुंदर रूप मनोहर लहानसो
घुंघट नवरी बाई जसो लगसे

झाड का कच्चा पक्का फल
जाम अनार तोडकर आणसे
भिर भिर नजर ओकी बावरी
इठलाय इठलाय फल खासे


चिरप चीरप की मधुर आवाज 
घर बगिया मा गुंजन करसे
बड़ी लाजरी अना भिवकुडी
झट झुडूप मा लुकाय जासे

झाड़ को कोठरमा घर लहानसो
चिंदि, पट्टा, धागा लक सजावसे
तीन सुंदर उभा पट्टा तनपर येको
पुसटी सुंदरता की खान बनावसे

रामसेतु बनावन हातभार लगावसे
अापलो नहानसो बाटा उचलसे
रामप्रेम प्रतीक की तनपर निशानी 
रामनाम संग जेकों, जगमा अमर होसेत
  
सौ छाया सुरेंद्र पारधी



खाड्डी

सर सर झाडपर, सर सर खाल्या।
देखशान खाड्डी, हास खुब बाल्या ॥1॥

सोनेरी सेत केस, टपोरा ओका डोळा।
चिटुकलो पिटुकलो, मन साधो भोळा ॥2॥

मऊ मऊ आंग, जसो मखमली पान।
झुबकेदार पुस्टीलक, झाळसे पुरो रान ॥3॥

मुंगफल्ली का फोल, सोलं कडकडम।
चटकन खाय दाना, करं गुटगुटम ॥4॥

टुक टुक न्याहारशान, देखतच वा रव्हसे।
टवकारसे टिल्ला कान, आवाजलक परासे ॥5॥

रामसेतु बांधणो मा, होतो येको हिस्सा। 
म्हणुन रामायण मा, आयीसे येको किस्सा॥6॥

उचो उचो झाडपर, रव्हसे इनकी बस्ती ।
सेंग देसे बाल्या मणुन, से ओकी दोस्ती ॥7॥

*- इंजि. गोवर्धन बिसेन, बडेगांव (गोंदिया)*

      
   खाड़ी (खारु बाई)


एक होती चिमनी बाई,
एक होती खारु बाई,
अज सकारी उठ्यो पर,
इनकी मोला याद आयी।।

तुरु-तुरु धाव से,
चिऊ-चिऊ गावसे,
इनला देखके सबला,
मज़ा मोठी आवसे।।

कारो-पांढरो रंग से,
झुपकेदार से पुस्टि,
चिमनी बाई संग मिलके,
दुई करसेत मोठी मस्ती।।

खारु बाई झाड़ परा,
फुदुक-फुदुक नाचसे,
चिमनी बाई संग मिलके,
पकड़म- पकड़ाई खेल से।।

संगी सेती एक दूसरी की,
मिलकर मज़ा करसेत,
आवसेत घर आंगन मा
चुल-बुल ये मचावसेत।।


          कु. कल्याणी पटले
            दिघोरी,नागपुर


    :खाड़ी

खाड़ी बाई खाड़ी बाई ,
कहा जासेस घाई घाईं,
जाम को बगीचामा , 
का आंबा की अमराई।।

येन झाड को वोन झाड़,
कूद सेस तु मोठी ,
तुरू तुरु धावसेस, 
कद लका सेस छोटी।।

मोटो मोटो झाड परा, 
तोरी रवसे बस्ती, 
खानला भेट्यो त,
खाड़ी बाईकरसे मस्ती।।
       
 हुशार मोठी सेस बाई, 
नजर तोरी दुर दूर      
दिस्या कोनी पराय जसेस,
आवाज आयकके सुर सुर।।

कोमल नाजुक तोरो शरीर ,
झुपके दार पुस्टि से,
दुय हात,दुय पाय,
आंबा की अमराई बस्ती से।।

कारो-पांढरो पट्टा लका, 
दिससेस मोठी साजरी,
आवजोस मोरो घर बाई ,
देऊ मी खानला तोला बाजरी।।
    
      सौ.लता पटले
       दिघोरी, नागपुर

      खाडी
        

येन झाडपरल् वोन् झाडपर 
फिरत रव्हसे दिवस भर, 
खाल्याल् वो-ह्या, वो-ह्याल् खाल्या
आत जात रव्हसे सर सर. 

आंबा ना जांब खासे शौकल् 
कणीस का दाना बी खासे, 
थोडो से खटका भेटेव पर 
धूम ठोकस्यार पराय जासे. 

हल्का कारा, पांढरा पट्टा 
रव्हसेती खाडी क् शरीरपर, 
झुपकावानी मोटी पुस्टी 
ना नरम नरम बाल बी सुंदर. 

लहान लहान बारीक डोरा 
ना उंदारावानी वोका कान, 
दुय हात मा धरकर फल 
खात रव्हसे मस्त आलीशान. 


                  चिरंजीव बिसेन
                             गोंदिया


खाडी

फूंदक फुदक करे इतन उतन,
घड़ी भर इतन घड़ीभर उतन ll

सुंदर प्यारी रुप निराली खाडी,
सबकी प्यारी दुलारी से खाडी ll

तूरु पोटु ला मज्या बहुत चखाये,
खाडी रानी जब जवर आये ll

बालक मन ला बहुत भाये,
खाडी रानी आपरो खेल देखाये ll

फुदक फुदक आंगन मा आये,
बड़ो चाव लक दाना खाये ll

जल्दी लक झाड पर चग जाये,
खाडी रानी कन कोणी धाये ll

खाडी का मिलकर गुण सब गावो,
मिलकर येको जीवन बचावो ll

प्रा.डॉ.हरगोविंद चिखलु टेंभरे
मु.पो.दासगाँव ता.जि.गोंदिया
मो.९६७३१७८४२४

दि. ०८.०२.२०२१ (सोम्मार)
               खाड्डी

खरगोश की मावस्ं बहिण
देख लेव खाड्डीमा
हर जागं दिसे, जंगल 
गाव खेतबाड़ीमा ॥१॥

झाड़पर लका सरसर 
फुदकंसे लगायके छलांग
रुबाबदार बैठक देखो
मोडके लंबी टांग ॥२॥

आबं चंघी आबं उतरी
कितं गयी कजाने
थकवा नही आवं का?
येला राम जाने ॥३॥

टपो-या डोरामा काजर
टवकार्ं से कान 
टुकूर टुकूर चौकन्नी
इत्ं उत्ं वोको ध्यान ॥४॥

मखमली आंग सुंदर
झुबकेदार पुसटी
चिरिप चिरिप अवाजमा
करं इरभर गोस्टी ॥५॥

पाठ परा रामजीको
उंगलीकी निशाणी
झाड़की कोठरीमा 
घर बनाव्ंसे शाहानी ॥६॥

बसक्यारी दाणा खासेत
छोटा छोटा हात
कड़कड़ फोडं सेत फल
लंबा टणक दात ॥७॥

नाजुक शर्मिली भोलीकी
मिशी उंदरावानी
टूणटूण उड़ी मारं से
झाड़परा बंदरावानी ॥८॥

चपल चंचल खाड्डी ला
धरनो तार की कसरत
नटखट कोमल शरारतीला
कुरवाडू, मोरी हसरत ॥९॥

डॉ. प्रल्हाद र. हरिणखेडे "प्रहरी"
उलवे, नवी मुंबई 
मो. ९८६९९९३९०७

 खराडी

खराडी से मालकीन
जंगलकी ,खेतकि 
खराडी से शान
आमर् बाडीकी//

कोमल मऊ,आंग वको
शेपुट वकि झुपकेदार
रामजीको आशिष वला
पाट कशी पट्टेदार//

लहान शेकरुच से खाड्डी मोरी
रवसे भुरकट लाल
छलांग मारसे झाडलका
धाव वकि कमाल!//

झाडपरा डेरा वको
लपसे धुराक् गड्डामा
कुतरायला थकाय देसे
आखिर जासे झोरामा्//

फासा मांडसेती झाडपरा
लगावसेती भात
कोमल खारूताईको 
शिकारी करसेत घात//

सायकलमा् गाडीमा्बि आयजासे
खाड्डी चंचल नार
दाणासाठी आंगण घरमा्
चबावसे दार//

जगन देव वलाबि
वलाबि से अधिकार
हर जीवला जगन देवो
समय कि से पुकार//

पालिकचंद बिसने
सिंदीपार (लाखनी)

                खाड्डी 

खाड्डी बाई खाडी चोवंसेस बडी सुंदर
झाडपर चंघसेस तू बडी  सरसर

कोमल कांती जसी रेशमी लोकरको दोरा
झुपकेदार पुस्टी हलायकर देखावंसेस तोरा

सोनेरी केस तोरा टपोरी कारा डोरा
भिरभिर नजर फिरावंसे टकमक देखकरा

दुय पायपर बसकर कुरतळसेस दाना
मौज मस्ती करंसेस फुदक-फुदक कना

आंगपर दिसंसेत तीन कारा पांढरा पट्टा
खिराडीबाई खासे ताजा फल मिठा मिठा

गोजिरवाणी भिवक्कड खाड्डी जासे दूरदूर
खेलंसें संग मोरो लाजरी परासे तूरतूर

सांगसे आमला गोष्टी चिरीप चिरीप बोलकर
संसार थाटसें कोठरी मा झाड-झडूला पर

रामसेतू बांधन मा सें तोरो कार्य महान
रामहस्त प्रतीक का सेत पाठ पर निशाण

                                      शारदा चौधरी 
                                          भंडारा
आयोजक: सौ छाया सुरेंद्र पारधी

कृष्ण अना गोपी

मी बी राधा बन जाऊ बंसी बजय्या, रास रचय्या गोकुलको कन्हैया लाडको नटखट नंदलाल देखो माखनचोर नाव से यको!!१!! मधुर तोरो बंसीकी तान भू...