Sunday, April 12, 2020

मामा को गाव


मामा क् गांव छुट्टी मा
जात होता लहानपण् ,
अभ्यास वभ्यास काही नहीं
नुसतो खाण् ना खेलण्.

उन्हारो मा स्कूलला
रव्हत होती छुट्टी,
पढ़ाई की फिकर नहीं
मारन् भेंट पुरी बुट्टी.

लुका झापी,तीर कमान,
कवेलू को गाड़ो रव्ह खेलनला,
पाड का आंबा,माच का आंबा
रस,रोटी,सेवई भेट खानला.

पापड़ बनावत चार पायलीका,
आंगनमा ठेवत वारनसाती
आमी रव्हज् पाहारापर
कावरा भगावन साती.

सब सोवत आंगणमा
गर्मील् बचन साती,
राजा रानी की कहानी सांगत,
मन बहलावन साती.

आता तसो काही
माहौल नहीं रहेव,
नवो जमानों मा मामाको
गांव दूर भय गयेव.

आता छुट्टी मा भी
टुरू पोटू इनला नाहाय फुरसत,
कई प्रकार का कोर्स, टी.वी.,
मोबाईल गुन् मामा भयेव रुखसत.

               रचना- चिरंजीव बिसेन
                            गोंदिया
                          दि.१२/४/२०

मामा को गाव


जंगललका घेरेव होतो, 
एक नहानसो गाव
हिवर्  झाडीमा शोभत होतो, 
मोर् मामाजी को गाव

मोवु को मोवरान होतो
लग प्रसन्नताको भाव
नहानपनपासूनच बेस लग्
मोर् मामाजी को गाव

खाबडखुबड को रस्ता होतो
गाडदान वको नाव
अस् रस्तापरच शोभत होतो
मोर् मामाजी को गाव

गाव क् जवरच परसोडी
बहुत दूर लग् बडेगाव
मालुटोला धरकन तीन होता
मोर् मामाजी का गाव

परीक्षा भयी शाळाला सुट्टी
भुलत होता अभ्यास को नाव
याद मोला आवत रव
मोर् मामाजी को गाव

मामाजी आननला आवत
मोर् मनमा खुशी को भाव
रेहकालक जात रवबीन
मोर् मामाजी को गाव

बहुत घन त् पैदलच गया
तरी दुखत नोहता पाव
माया ममताको सागर लग्
मोर् मामाजी को गाव

भास्याजी आया कवत होता
मोला भेटत रव बहुत भाव
मनुन मोला साजरो लग्
मोर् मामाजी को गाव

रेहकालक उतरनक् बादमा
मामीजी धोव् मोरा पाव
मानपान को भंडार होतो
मोर् मामाजी को गाव

खेल खेलजन दिवसभर
रव् हाशी खुशीको भाव
मनुन मोला साजरो लग्
मोर् मामाजी को गाव

बेरा होत होती जेवनकी
आयतोच भेटत रव् ठाव
मान सन्मान को भंडार होतो
मोर् मामाजीको गाव

आब् गाव से, पर मामा नाहात
तरी से आपलो पन को भाव
मामाजी बिना सुनो लगसे
मोर् मामाजी को गाव
***
✍ *डॉ. शेखराम परसरामजी येळेकर नागपूर* १२/४/२०२०

मामा को गाव

उन्हारो को सुट्टी मा,आजा मोरो खाचर लका आणण आव,सुट्टी लागी का जात होता आम्ही मामा को गाव, तपन मा फिरज मस्ती कर्ज त आजा आमरो मग धाव //१//

माम भाई अना मावसो भाई सब जन जमा होज 
आगण मा, कंची ,लुका - छुपी सब रंग का खेल खेलज आम्ही//२//

मामा को घर होती मोठी-मोठी भशी गायी, चारावन ला लिजनाकी आमला रवत होती घाई//३//

मामा को घर को बाजू वालो घर होतो आंबा को झाडं आंबा चोरन ला जाज पर होती मोठी बिहिर आड//४//

आब को टूरू पोटून का पाहिले सारका दिवस नही रया लहान पासून मोठा सब मोबाईल मा व्यस्त भया//५//  

✍️ मुकुंद दिगंबर रहांगडाले..(हरी ओम सोसायटी दत्त वाडी नागपूर २३) १२/०४/२०२०

मामा को गाव


मामाको गाव,भास्याला भाव
हक्कच रवसे ,लगी सुट्टी धाव!!//

मामाको गाव,आंबा ना् जांबुर
नवोनवो कपडापरा,नाकभर शेंबुळ।।

मामाको गाव, वावरभर खेलनो
गावखारीमा् लपनो,ना तनसिपरा कुदनो।।

मामाको गाव,घरभर राज
भिती नयि कोनकिच,गावभर नाच।।

मामाको गाव, आजबिसे आस।
यंत्रयुग आयोव आब्,प्रेमको भयोव नास।।

पवारी खुन से,प्रेम रहे तसोच।
युग आयेत जायेत,मामाको गाव प्यारोच।।

पालिकचंद बिसने

मामा को गाव

काव्य  स्पर्धा क्रमांक-०५
विषय:- मामा को गांव
दिनांक १२/०४/२०२०

हेत  आवसे  ओन  दिन  की मीठ-मीठ  बात 
जावत   होता  माय  अना  भाऊ  संग  साथ
गर्मी  की  सुट्टी मा जात होता मामा को गांव 
नानी अना  नाना  जवर होवत  होतो  ठांव ।

सकारी होव् अज्जी तैयार करत होतो खाचर 
बईल ला नहाय धोय  के, बांधत  होता झालर 
कासरा ढिल्लो होय , बईल जोड़ पल्ला दौड़त 
नाना नानी,मामा  देख आवत  होतिन भागत ।

मामी  मोरी  पाय धुआवा ,करत  होती  सतकार 
जाअनो ले मोरो,खुशियां लक भर जाय घर- बार
संध्या होव्  दीपक बाती ,होवा प्रभू को जयकार 
भजिआ अक्सया  घिवारी  को होवा  पाहुनचार ।।

अपली तपली गिल्ली डंडा, टूरू फुटू संग खेलजन
मांडो खाल्या खट्या बिछाय मिल सब झन सोवजन 
नानी मोरी चंदा अना परी को कहानी सुनावत होती 
कह्य रही सव  सच  मी ,बड़ो  मजा आवत  होती ।।

 ✍️ रचना - पंकज जुगनू
परसवाड़ा बालाघाट (म.प्र.)
स्वरचित, मौलिक

मामा को गाव

स्पर्धा -५ वि
विषय- मामा को गाव

गावखारी को रस्ता पर को उ मोठो शेंदऱ्या आंबा
याद आवसे मोला वय बगिचा कि पिकी जांबा ।।

उनारो मा घिवारी संग आंबा को मिठो मिठो रस
बडी डाकत होती परसा को पान पर फक्त दस ।।

रोटी पापड को उंडीला तेलसंग खूप खाजन
दुय चार पापड बेलस्यान इत उत हिंडजन ।।

मावसी ला आनन साती रेहका पर जान साती तयार
बुदुक बुदुक पड वा घोटी आंबा खेल जन चार ।।

जगरी पर को दुध कि साय सांगत होती कहानी
मोरो माम माय को हिरदा होतो पिरती वानी।।

मोठो मिठो लग मामी को हात को उ पाहुणचार
बटकी भर पेज घुगरी रायतो संग करजन आरपार ।।

दिवारी को मंडई ला मामाजी आनती खूप खाजो
कवत होता ....इस्कुल चालू होये परा गाव जाजो ।।

मान सन्मान लक झल्लारसे मोरो मामा को गाव
इनसानियत लक देसेत वय नौकर ला बि भाव ।।

नहि भुली सेव मामा को गाव कि येक येक याद
हिरदा मा भरी सेव उनला आता करुसू याद ।।

श्रीमती वंदना कटरे "राम-कमल"
गोंदिया
१२/०४/२०२०

मामा को गाव


गिम की छुट्टी की, वोन चाव की याद आय गयी,
अज मोला मोरो मामा गाँव की याद आय गयी!!

मोठो मोरी माय को कुनबा,
चार गाँव मा होतो रुतबा,
मामा मोरा बड़ा शेर घानी,
अना शेर घानी अजी बुड़गा!
सायनी माय को लाड़ को भाव की याद आया गयी!
अज मोला मोरो मामा गाँव की याद आय गयी!!

संगी जसा वोतरही मामभाई,
बनकर रहिन मोरी परछाई,
आपरो निवालों मोला दे स्यार,
खान स्यारी करत होतीन घाई!!
बचपना का संगी गिन को लगाव
की याद आय गई!
अज मोला मोरो मामा गाँव की याद आय गयी!!

दिनभर रहवत वोता अमराई मा,
मजाक, मस्ती खेल लड़ाई मा,
थक स्यार दुपहरी सोवत होता,
आम्बा को झाड़ की परछाई मा!!
अमराई को झाड़ गिन की छांव की याद आय गई!!
अज मोला मोरो मामा गाँव की याद आय गयी!!

जात होता खेत महुँ बेचन ला,
अना लाखोरी अरसी मिसन ला,
गहुँ अना चना कटाई को समय,
जात होता हामी होरा भुजन ला!
मामा को खेत की वोन अलाव की याद आया गई!!
अज मोला मोरो मामा गाँव की याद आय गयी!!

जाने कसो कसो छुट्टी बीत गइन,
बचपन का खट्टा मीठा दिन गइन,
हाथ मा रहि सब धुंधली सी याद,
अना रिश्तों नातों का धागा महीन!
जीवन सागर मा बचपन की नाव की याद आय गई!
अज मोला मोरो मामा गाँव की याद आय गयी!!

गिम की छुट्टी की, वोन चाव की याद आय गयी,
अज मोला मोरो मामा गाँव की याद आय गयी!!

तुमेश पटले "सारथी"
बालाघाट (म. प्र.)
दि.- १२/०४/२०२०

कृष्ण अना गोपी

मी बी राधा बन जाऊ बंसी बजय्या, रास रचय्या गोकुलको कन्हैया लाडको नटखट नंदलाल देखो माखनचोर नाव से यको!!१!! मधुर तोरो बंसीकी तान भू...