Thursday, April 8, 2021

श्रावण बाळ 57






श्रावण बाळ

अंध माता पिताकि
करिस सेवा भक्ती
श्रावणबाळ नाव वको
वु आदर्शकि मुर्ती।।

काशीतिर्थला नेत होतो
कावळमा उनला
जंगल होतो भयान
तरी बिवत नोहोतो रातला।।

बाळ होतो श्रद्धावान
मातृपितृ भक्त
कर्तव्यलाच धर्म कव्
त्याग सेवाच फक्त।।

तहान लगी मायबापला               
गयोव पाणीसाठी।
दशरथ राजाबि आयोव होतो
शिकारकरणसाठी।।

बुडबुड आवाज गयोव दशरथला
सोडिस बाण लगेव श्रावणला
पछतायोव दशरथ पिठे मस्तकला
श्रावण कसे देवो पाणी मातापिताला।।

आजबि से आदर्श श्रावण 
लेबि गुण वका
ईश्वरबि मंग प्रसन्न होय
बिना पुजापाठलका।।

पालिकचंद बिसने
सिंदिपार (लाखनी)

पोवारी इतिहास साहित्य अना उत्कर्ष द्वारा आयोजित
 काव्य स्पर्धा  क्र. ५७
 तारीख :- ४/४/२०२१                 
रोज :- इतवार
   श्रावण बाळ (चाल-मेरे मन डोले)
                        
शशांतनु पिता, ज्ञानेश्वरी माता। बेटा श्रावण कुमार रे,
माय बाप क चरण मा  //धृ //

रात दिन उनकी सेवा कर, मानकर भगवान
आज्ञाकारी बेटा श्रावण,का करु ओको बखान
तिरथ करावन मायबापला, भयगयेव तयार रे //१//

दुय सेनोळी की कावळ बनाईस,बांधीस गाठण गाठी
ओन्ज्या बसाईस मायबाप ला,तीरथ करावंन साठी 
खांदपर कावळ,चले तिरथला तपन भरमार रे//२//

फिरतफिरत तिरथ करावत, चलेव श्रावण बाळ
मायबापला तहान लगी, जसो आयगयेव काळ
कावळ ठेईस झाळ खाल्या,चले तराक पार रे //३//

झारी बुळाईस पाणी मा, वा आवाज बुळबुळ कर
टपेव होतो राजा दशरथ, तब  ओन चलाईस तीर
हायबाप करशान तळफळ बाळ श्रावण कुमार रे //४//

सांगीस हकीगत दशरथ राजाला सोळ देईस प्राण 
मालुम भएव मायबापला त्यागीन उननभी ज्यान
मातृ पितृ की सेवा करशांन भयेव वु अमर रे  //५//

 माता पिता की सेवा करो भेट जाए गा  मेवा
नहीत बादमा पस्तानो पळे मंग करो देवा देवा
नोको दुराओ मायबाप ला सुखी होय संसार रे //६//
                       
डी पी राहांगडाले 
      गोंदिया


 श्रावन बाळ

ले बांधकन कावळ चलेव श्रावन बाळ
माँ बाप की सेवा करे,ना जपे कोनती माळ

अंधा होता माय बाप श्रावन बाळ बनेव दृष्टी
तिर्थ यात्रा मा सांगसे माय बाप ला सृष्टी

तहान लगी गरा सुखेव बेटा पाणी पाज
बाळ श्रावन निकलेव पाणी ला न करता आवाज

बुळ बुळ करे घागर धारन करत होती पाणी
काळ को तिर निकलेव संपी जीवन कहाणी

पाप भयोव दशरथ हात, पाणी पाजन बनेव बाळ
अंध माय बाप समज गया नोहे आपलो श्रावन बाळ

दशरथ वानी सांगता सत्य,माय बापन् सोडीन प्राण
श्रावन बाळ सारखो पुत्र भेटे असो दशरथ मांगे दान

हिंदू संस्कृती से संस्कारी शिक्षक
जो यन संस्कृतीला अपनाये वू बने रक्षक

शेषराव येळेकर
दि ०४/०४/२१
श्रावन बाळ

याद आवसे अज भी वा रात
गणपती उत्सव को आयोजन
राती लगी होती वहां फिलम
आतुर होतो श्रावण बाळ साती मन

राती लगी श्रावण बाळ की फिलम
मोहल्ला भर का देखन आया सब जन
लगी वा चित्रपट होती बहूत सुंदर 
देखता देखता आंसु टपकावत होता नयन

देखेव मी वु पुर्ण चित्रपट 
श्रवाण बाळ हृदय बसेव
झझकोर कर ठेयिस मोरो मण
मात पिता सेवा का होसे मी जानेव

यव कलयुग आय, यहान कोनी श्रावन नहाय
देखेव मी वृद्धाश्रम, भऱ्या पड्या होता
जिनको साती जिवण को रान करिन
वयच् आता वृद्धाश्रम मा रोवत होता।

 विरेंद्र कटरे

श्रवण बाळ

 संतान होय त अशी होय
श्रवण कुमार जशी होय||

जेकी चमक चंद्र - सूर्य जशी होय
अंध माता - पिता की सेवा देखकर
भगवान परशुराम भी नतमस्तक होय
संतान होय त अशी होय
श्रावण कुमार जशी होय||१

प्रवाशी होय त असो होय
माता - पिता की भक्ती देखकर
नाव को चालक मलाह भी
आपलो ला धन्य समझ
संतान होय त अशी होय
श्रावण कुमार जशी होय||२

मन मा संतान को चित्र होय
त अशो होय
आप लो कंधा पर माय बाप ला
कावळ मा काशी को यात्रा को चित्र होय
संतान होय त अशी होय
श्रवण कुमार जशी होय||३

मुर्तिव हो त अशो होय
श्रावण कुमार जसो होय
प्रजा को राजा ला भी
पच्छ तावा होय
संतान होय त अशी होय
श्रावण कुमार जशी होय||४

 चंद्रकुमार शरणागत

      
श्रावण बाल

तीर घुसेव सातामा 
तळफळं वू श्रावण 
मोठो पाप भूपती को 
जरी नवतो रावण//

जबं डोरा देखं सत्य 
नृप दशरथ दुखी 
विधी लिखित घटना 
कसो कोण होय सुखी//

मातृ-पितृ भक्त पुत्र 
सांगं अंतिम कहानी 
कंठ सोक्या माय बाप 
सेती झाडखाल्या रानी//

देखं तालाब जवर 
झारी भरेव सुजली 
जात होतो त् वापीस 
आयी भेटनं या 'कली '//

यात्रा, तिरथ कासीला 
लिजानकी रही ईच्छा 
पाणी पिलावं उनला 
करो पूरी या सदिच्छा//

याद करके मायला 
प्राण सोडसे श्रावण 
धन्य करतव्य भक्ती 
माय भारती पावन//

वंदना कटरे "राम-कमल "
 

 श्रावन बाळ
 काव्य प्रकार  --अभंग

         सेवा
श्रावन बाळकी,मातृपितृ सेवा
नोहोय देखावा संसार मा॥

आपला देव,माय बाप आती 
सेवा दिन राती, करोसब।

बुळगा व्यक्तीला,नाहि रव्ह शक्ती
देवकीच भक्ती, करसेती।।

श्रावनकी सेवा,संसार मा मान्य
धरतीपर अन्य, एक भयो।।

बनो असो बाळ,लेयत सकळ
बदलेव काळ,व‌द्धाश्रम।।

डोराका हे आसू ,हेच सांगसेती
सुख दुःख सेंती , जीवन मा।।

दशरध राजा, चार पुत्र को बाप
ख़रो भयो श्राप,वधकोच।।

काशीकी यात्रा,. अधुरीच रही
श्रावन की भयी,मृत्यु वहा।।

करो सेवा आता,  जगमा अमर
पुंडलिक  कर ,पितृसेवा।।


वाय सी चौधरी
गोंदिया
श्रावण बाळ

आदर्श वान वु बेटा
नाव होतो श्रावण बाळ
वोको करू मी गुणगान
तिन्ही लोकं मा होतो आदर्शवाण !१!

सेवा कर माता पिता की
देख श्यान ईर्षा करत भगवान
पुरी कर हर इच्छा माता पिता की
सुख लेत  होतो स्वर्ग समान !२!

अंध माता पिता की इच्छा
करण की होती पुरी
बनाई के टोपला की कावळ
निकल पळेव काशी दर्शन साठी !३!

धन्य रे वु  बेटा जाय पाणी आननला
लग से छाती  मा महाराजा को तीर
अंत समय मा बी दिसत माता पिता
होता वोयच वोका परमेश्वर !४!

नही देईस श्राप राजाला 
कइस पाणी पीवाय दे माता पिता ला
राजा कोबी डोरा मा आवत आसु
नमन कर राजा पितृभक्तिला!५!

भयव श्रावण बाळ अजरामर
करके सेवाभक्ती मायबाप की
आजही से योजना श्रावण बाळ
मिलसे अनाथ वृद्ध इनला आधार!६!

समाज बंधु बी मोरा आदर्श
श्रावण बाळ को जप सेती
सेवा माय बाप की मनोभाव
अंत समय वरी कर सेती !७!

 अजयकुमार लीलाधर बिसेन




श्रावण बाळ
  

श्रावण बाळ माता पिता ला, 
बसायकर कावडमा, चलेव तीर्थयात्राला. 

लगी तहान पानी नोहोतो जवर, 
कावड मडायकर झाडखाल्या, चलेव पानी आननला. 

झारी डुबाईस पानीमा, बुड बुड
भयेव आवाज, रात को समय 
राजा दशरथ समझेव प्राणी आय. 

सोडीस शब्दभेदी बाण, लगेव छातीवर, 
जोरल् किंचाळके पडेव श्रावणबाळ. 

राजाला ला धक्का बसेव, समझेव धोको भयेव, 
धावत गयेव जवर, अंतिम अवस्था श्रावणकी. 

सांगीस आपली कहानी, माय बाप की अवस्था 
ना सोडीस श्रावणन् आपलो प्राण. 
राजा दशरथ गयेव पानी धरस्यार, 
माय बाप दुही अंधरा, आवाजल् पहिचानीन् श्रावण नोहोय. 

देईन राजाला श्राप, आमर् वानी तुबी 
पुत्र वियोग मा तडपकर मरजो, सोडीन आपला प्राण. 

श्राप फलीभूत भयेव, दशरथ राजा, 
पुत्रवियोग मा स्वर्गवासी भयेव, कर्म की गति महान से 
कर्मफल अज नही त् कल जरूर मिलसे. 


                      - चिरंजीव बिसेन
                                   गोंदिया 


श्रावण बाळ मृत्यू प्रसंग
       (अष्टाक्षरी काव्यलेखन)

बाण   आयेव  आयेव
ओको  बनशान काळ ।
टाह  फोळ 'माय माय'
रोव  श्रावण  वु  बाळ ।।1।।

आयी  राजाला आयकू
ओकी करुण वा वाणी ।
जाय   जवळ,   भयेव 
ओको हृदय को पाणी ।।2।।

देख श्रावण बाळ ला 
शोकाकुल     दशरथ ।
बोल, तोला मारनला 
पापी  सेत मोरा हाथ ।।3।।

मंग    मरता     मरता
कसे राजाला  वु बाळ ।
माय बाप   बुड्ढा सेती
बस्या   बनमा  जवळ ।।4।।

होतो  लिजात  उनला
काशी  धरके  कावळ ।
तीर्थ यात्रा जात होता
वारी   करन   निर्मळ ।।5।।

पाणी आणन आयेतो
झारी   धर     तरापर ।
ओतरोमा  तोरो बाण
छेद  गयो    छातीपर ।।6।।

बाट     देखत   रहेती 
प्यासा वय प॔छीवाणी ।
सेत   अंधरा,   उनला
तुमी पिवावोना पाणी ।।7।।

सांगो नोको  दुर्घटना
जावो वांहा बन बाळ ।
मोरो  बादमा  उनको
करो  तुमीच सांभाळ ।।8।।

धरो झारी, आता जासु
ओको आखरीको बोल ।
पंछी   पिंजरा  सोडीस 
प्राणज्योत  गयी खोल ।।9।।

बाळ    भयेव   अमर
कर  माय  बाप  सेवा ।
करो ओको सम भक्ती
भेटे  आशिर्वाद   मेवा ।।10।।

 इंजि. गोवर्धन बिसेन, गोंदिया
       मो. 9422832941
         दि. 04 एप्रील 2021

   श्रावण बाळ
                        
शांतनु को पोट 
बाळ श्रावण जन्मेव
माता ज्ञानेश्वरी को 
संस्कार मा पलेव

बाळ होतो आज्ञाकारी, 
सेवा मा सदा तत्पर
रातदिन कर सेवा
देख मायबाप मा ईश्वर

मातापिता दुहि अंध
करावजो काशी की वारी
कसो लिजाऊ काशीला
बिचार पडेव वोला भारी

करीस दुय ओळगाकी कावड
देख मायबाप की आवळ
बसाईस माय अना बापला
चलेव तीरथला श्रावण बाळ

तहान लगी ऊनला वाहान
झारी धरके श्रावण गयेव
बुड बुड झारी को आवाज
छातिमा अनामिक बाण धसेव

माय माय की आर्त देइस् हाक
तब दशरथ आयेव्, फेकिस बाण
मोरो बान न लेईस निष्पाप जान
संभाळजो कयकर, सोडिस पऱ्यान

हकीकत जानकर सब
विलाप मा डूब्या वृद्ध
मस्तक पिट पिट रोवती
भया राजा पर वय क्रुद्ध

देईन राजाला उनन श्राप
नाहाय श्रावण आमरो
अग्नी देनला आमला
तसो नाश होये तुमरो

तोरो चीता ला अग्नी देनला
प्रिय पुत्र नहीं रवणको जवर
दुहिन त्यागिन आपलो पंच प्राण
चल्या दूहि स्वर्ग को मार्ग पर

सौ छाया सुरेंद्र पारधी
             श्रावण बाळ
(चाल- मनी धीर धरी शोक आवरी जननी। भेटेन नऊ महिन्यांनी)

तीर आयेव रे आयेव देखो बनके काळ
लगेव छातीमा मूर्च्छित भयेव श्रावणबाळ।।

ज्ञानेश्वरी शांतनु पुत्र।जन्मदाता का अंधनेत्र
ईच्छा उनकी तीर्थक्षेत्र।सेवाभावी वृत्ती पवित्र
          श्रावण बाळ आज्ञाकारी
          मायबापला बसायस्यारी
           निकालीस पैदल वारी
खांदपर धरिस कावळ।मूर्च्छित भयेव श्रावणबाळ

जनकला लगी तहान।खाल्या कावड ठेयस्यान
गयेव पाणी आणन।शरयू नदी काठकन
         पाणीमा डुबाईस झारी
       बुळबुळ स्वरआयकस्यारी
       शर मारीस दशरथनं भारी
लगेव श्रावनला भई तळफळ।मूर्च्छित भयेव
श्रावणबाळ

समजेव मी कोणी हरीण। मुन मारेव बाण
राजा बसेव कवन।माफ कर मोला श्रवण
         तहान्या सेती बापमाय
         जल्दी तू पाणी लिजाय
          तहान दे उनकी बुझाय
कयके देसे प्राण सोळ।मूर्च्छित भयेव श्रावणबाळ

सब हकीकत आयकस्यान।राजाला श्राप देयकन पुत्रवियोगमा सोडजो प्राण।सोडीन मायबापनं जान

              मातापिताच आत भगवान
               करो उनकी सेवासम्मान
               चरणमा उनको स्वर्गस्थान
धन्यधन्य तू लडिवाळ।मूर्च्छित भयेव श्रावणबाळ


                               शारदा चौधरी 
                                     भंडारा

Wednesday, March 24, 2021

जातो पर की ओवी

             जातो परकी ओवी
                       
 असो एक माळी गा निर्गुण निराकार
बाग लगाईस सुंदर,जो बाळा जो जो रे.//१//

रोप लगाव सुंदर,खाल्या शेंडा वर बुळ 
कलश पर sदेवुळ,जो बाळा जो जो रे.//२//

साळेतीन हातको खेत,वरत्या धर नांगर 
बैल जुपीस च्यार, जो बाळा जो जो रे.//३//

एकवीस स्वर्ग पर बीहीर,सर्वांग पाझर
माळीन सत्रावी सुंदर,जो बाळा जो जो रे.//४//

चौदावी को मुळ,वाफा सेत बाहातर 
एकविस आळा सुंदर,जो बाळा जो जो रे //५//

त्रीगुण  त्रीकुटी, चवथी जाण गा तुर्या
सबदुन वरत्या माया,जो बाळा जो जो रे //६//

ओन्ज्या उलटी गंगा,पाणी आळोपरा 
सेती त्रि देव मोरा,जो बाळा जो जो रे  //७//

सात गा चकर सप्त सागर को फेरा
माला फिर मनी तेरा, जो बाळा जो जो रे //८//

एक नारी बतीस पुऱुष,एकमाच संसार
पाच तत्व को शरीर,जो बाळा जो जो रे //९//

सबमा से भगवान,माया को पसारो
कर्म चांगला करो, जो बाळा जो जो रे  //१०//
            
डी पी राहांगडाले 
      गोंदिया


जातो पर की ओवी

     सासुरवास

जातो फिर से गरगर,पिठ पळसे भरभरा
बाई दससे तांदुर, रोटी खाय भाऊराया।।

काजक सांगु  तुमला बाई ,माय घरकी बढाई
माय घरंक माळीपरा,चंद्र सुर्य की लळाई।।

सासु करसे सासुरवास, घरधनी  नही आयक
सकार पासुन काम,करुसु पुरो   संयपाक।।

पहाट पासुन दरन दरो,झाडु मारो शेन फेको
भाडाकुंडा साफ करो, सासुका पलासा आयको।।

पहाटला कोंबडा़ बाग देसे,सासुबाई ला बाग लिजासे,
आनो राया सोळायकन,ओकी शाक बनावबिन।।
(असो राग व्यक्त करसेती)
""जय राजा भोज,जय माँ गड़काली""
वाय सी चौधरी
गोंदिया



ओवी
गाउसु बाई मी ओवी गा गाउसु
मुठ मुठ चाउर मी वाहूसु गा वाहूसु

अन को दाना येव कन कन पिसुसु 
जातो मोरो येव गा मी यव देखुसु

पिसेव पिठ फिजाउसु गा बाई फिजाउसु
हात लका रोटी मी बनाउसु गा बाई बनाउसु

सकार को नास्ता मा खासे गा बाई वु खासे
नाथ मोरो खासे रोटी गा ना खेत जासे

दिन रात मेहनत लका अन पिकावसे गा पिकावसे
तब जायस्यानी जातो मा पिठ दरसे गा बाई दरसे

~ विरेंद्र कटरे
जातापरकि ओवी

जातो परकि ओवी
मनला देसे सुकून
जातोबि देसे संगीत
जातोलकाच पिठ ना चून।।

ज्ञानेश्वरकि ओवी
तसिच ओवी आत्याकि
कस्ट कमि ओवी करसे
याद आवसे जाताकि।।

भुरुकाल् दरत होती 
कनिक वहानी सांडत होती
माय ओवी गात होती
घरमा् आनंद भरत ती।।

जातो गयोव ओवी गयि
चक्की आयि कविता भयि
फिरून आयोव जातो ओवी
इतिहास कि यादच आयि।।

जातोबि एक यंत्रच होतो
ओवी काव्यप्रकार
विकास भयोव दोनो तंत्रको
जुनो यंत्रकि जयजयकार।।

प्रेमलकाच फिरवू जातो
लिकू ओवी एकतरी
प्रेम  करु इतिहासपरा
मानवकि से महिमा न्यारी।।

पालिकचंद बिसने


 जातो पर की ओवी

पयली मोरी ओवी ग,  मोरो माता पिताला
विठ्ठलरुकमाई जोडा जसो, सोभसे पंढरीला

दूसरी मोरी ओवी ग मोरो भाई भोवजाईला
लक्ष्मीनारायण जोड़ा जसो, शोभसे वैकुंठला

तिसरी मोरी ओवी ग मोरो कुकू को धनीला
सावित्री को सत जसो, सत्यवान को जीवला

चवथी मोरी ओवी ग, मोरो सासू सुसरोला
पुण्यवान को घर आयी नमन उनको चरनला

पाचवी मोरी ओवी ग , पंढरिको पांडुरंगला
अखाडी ला वारी करू, भेटन जाऊ श्रीरंगला

सहावी मोरी ओवी ग, तुलसी वृन्दावनला
पुण्य कमाओ कन्यादान को, बिह्या लगायश्यान

                        - सोनू भगत
   
जातो परकी ओवी

पहिली मोरी ओवी सें गढकालिकाला सुमरन
आमरी कुलदैवत तू देजो लवकर दर्शन

दुसरी मोरी ओवी सें चक्रवर्ती राजभोजला
पूजसे हर पोवारजन तोला नित्य रोजला

तिसरी मोरी ओवी सें  धार नगरीला
पोवारी उगमस्थान वू  पुण्यस्वर्ग धरतीला

चौथी मोरी ओवी से आपलो जन्म दाताला
शतशत नमन करुसू आपलो मातापिताला

पाचवी मोरी ओवी सें आपलो गुरुजनला
वसा धरके उनको विद्यार्जन करून जगला

सहावी मोरी ओवी सें माय तू हर कणकण मा
माता गडकालीका की मूर्ती बसीसें मोरो मनमा

सातवी मोरी ओवी सें बाई मी दळण दळूसू
माता गढ़कालिका की ओटी नारळलक भरुसू

आठवी मोरी ओवी सें येनं जगत जननीला
आयकर सहाय्य कर मोला दळण दळणला

                                       शारदा चौधरी
                                           भंडारा
 जातो पर की ओवी 

भूमीसार प्रहरला 
जातो पर दरूसू 
केसर किरण वालो 
सूरज मी देखूसू//
मुठ मुठ दाना धीरुलक 
जातो मा टाकूसू 
गोठामाकी गाय हेडतो 
मुरली मी देखूसू //
खाली पोट जातो को 
दंडा मी फीरावूसू 
मदतीला धावणारो 
विठ्ठल मी देखूसू//
जलदी च् पीठला 
आबं मी फीजावूसू 
पसिना ला पोछतो 
बालकृष्ण मी देखूसू//
संसार पार करनला 
मेहनत रोज करूसू 
आनंदीत बेटा बेटी 
घरदार मी देखूसू//

वंदना कटरे 'राम-कमल '

ओवी
पहिली मोरी से                            
माँ गडकालि देवीला
विक्रम राजाभोज भयोव
चलबि उनक् मार्गला।।१।।

दुसरी मोरी ओवी से              
सरोसती माताला
गजानन परसन् होये
जतन भोजक् शाळाला।।२।।

तिसरी मोरी ओवी से।       
प्रणाम वीर पुरसयला
विरांगना पतिव्रता                     
उनक् त्याग सेवाला।।३।।

चौथो मोरो नमन से
राजाभोजको शौर्यला
मुघल गंगैय हैराण भया
भारतमाँक् शक्तीला।।४।।

पाचवो मोरो नमन से 
पोवार संघ शक्तीला
परिवार समजो समाजला ना्
जोळो बिकऱ्या पोवारला।।५।।

सहावो मोरो नमन से
संस्कृती रक्षक पोवारला
नेंगदस्तूर जतन करो
संघ शक्तीसे वक् मुळमा्।।६।

सातवोमोरो नमन से
सोनूभाऊक् तळमळला
मोठा साहित्यिक भेट्या यहानि
नमन ज्ञान कि गंगाला।।७।।

पालिकचंद बिसने सिंदीपार (लाखनी)


  जातो पर की ओवी

दरण बाई मी दरण दरुसू
पोट भर अन्न साठी रक्त अटावसू

जाता बाई जाता मोरो गोटा को जाता
पोट कोनशीब संग दुजा भाव को नाता

एक एक दाना बाई जाता करसे बारीक
खानको पोट एक पण बोट नहात सरीक

फिरसे बाई फिरसे मोरो जाता फिरसे
एक एक दाना पिकावन धनी मोरो राबसे

तुटी बाई तुटी मोरी कमर तुटी
पंढरी को राणा,कब पावन करजो कुठी

दाना बाई दाना नवो धान को दाना
सुटेव प्राण आता धाव गा पंढरी को राणा


शेषराव येळेकर
दि. २१/०३/२१


जातो परकी ओवी

पयली मोरी ओवी गा।
गढकालीका को चरणमा।।
विद्यादान देईन मोला।
रहु ऋणी सदा उपकारमा।।

दुसरी मोरी ओवी गा।
राजा भोज ला वंदन।।
पोवार समाज ला करीन।
उनच नंदनवन।।

तीसरी मोरी ओवी गा।
आई को गर्भमा।।
नव दिवस,नव महिना।
सोहम मंत्र जपनोमा।।

चौथी मोरी ओवी गा।
होती मी अज्ञान।।
मोला दुनीया देखाईन।
मोरो आई बाबुजीनं।।

पाचवी ओरी ओवी गा।
होती मी सज्ञान ।।
वर देखके मांगणी करीन।
मोरो पतीदेवनं।।

सातवी मोरी ओवी गा।
विश्व को देवताला।।
पतिशिवाय देव नही।
सांगुसु मी सबला।।

सौ.वर्षा पटले रहांगडाले
गोंदिया


 जातो पर की ओवी

पयली  मोरी  ओवी ग, वाग्देवी  माता ला  ।
कृपा ओकी राजाभोज ला, नमन उनको चरण ला ।।1।।

दुसरी मोरी ओवी ग, गडकाली माता ला ।
देईस शक्ती पोवारवंश ला, नमन उनको चरण ला ।।2।।

तिसरी मोरी ओवी ग, गायत्री माता ला ।
देसे सद्बुध्दी सबला, नमन उनको चरण ला ।।3।।

चौथी मोरी ओवी ग, राजा भोजदेव ला  ।
श्रद्धास्थान पोवार ला, नमन उनको चरण ला ।।4।।

पाचवी मोरी ओवी ग, मोरो गुरुदेव ला ।
सन्मार्ग देखावन ला, नमन उनको चरण ला ।।5।।

सहावी मोरी ओवी ग, मोरो अजी माय ला ।
शिस्त ना प्रेम देनला, नमन उनको चरण ला ।।6।।

सातवी मोरी ओवी ग, मोरो गुरुजन ला ।
शिक्षा देसेत सबला, नमन उनको चरण ला ।।7।।

आठवी मोरी ओवी ग, मोरो संगी साथी ला ।
जिंदगी मा विश्वास देनला, नमन उनको गुण ला ।।8।।

नववी मोरी ओवी ग, पोवार लेखक, कवी ला ।
पोवारी साहित्य लिखनला, नमन उनको लेखनी ला ।।9।।

 इंजि. गोवर्धन बिसेन, गोंदिया (बडेगांव)
       मो. 9422832941
         दि. 21 मार्च 2021

                                                                          पहिली मोरी ओवी बाई मातापिता को चरणला
सेवा करो तुमि उनकी बाई धावरे बा विठ्ठला।

दूसरी मोरी ओवी बाई, पूजनीय गुरूजनला
दूर करिन अज्ञान ला ,धावरे बा विठ्ठाला।।

तिसरी मोरी ओवी बाई, पंढरी को पांडुरंगला
जनी संग दरण दरीस ,धावरे बा विठ्ठला।।

चवथी मोरी ओवी बाई, राम लक्षुमनला
आज्ञाकारी भाई बनो धावरे बा विठ्ठला।।

पाचवी मोरी ओवी बाई अंजनी को सुतला
लंकादहन करिस वोन धावरे बा विठ्ठला।।

सहावि मोरी ओवी बाई तुलसी वृन्दावनला
दिओ लगाओ रोज बाई धावरे बा विठ्ठला।।

सातवी मोरी ओवी बाई गढ़कालिका माताला
कुलदेवी आय आमरी धावरे बा विठ्ठला।।

आठवी मोरी ओवी बाई राजा विक्रमादित्यला
न्यायप्रिय राजा बाई धावरे बा विठ्ठला।।

नववी मोरी ओवी बाई आमरो राजा भोजला
ग्रंथ लिखिन चौऱ्यांसी  धावरे बा विठ्ठला।।

दहावी मोरी ओवी बाई निसर्ग माताला
झाड़ लगाओ आता बाई धावरे बा विठ्ठला।।
      सौ.छाया सुरेंद्र पारधी

Monday, March 15, 2021

पातर रोटी काव्यस्पर्धा ५४

 पातर रोटी

मरी माय,झेंडु बाम
असो नवरा को प्यार
सबको तोंडमा एकच नाव
जसा हात सेती चार

नशीब मोरा
चूल मा लगी आग
पातर रोटी बनावसू
नहीत नवरा ओके आग

कंबर को कचूंबर
सबको बडेव खून
खलबता मा कुटनेवाली
मी भरेव घरकी बहु/सुन

कारा मणी संग डोरला
मी बिनपगारी बहु
झड्या बाल का बनसेत पैसा
निचोळणे वाला रुप बहू

सरपर पदर 
मान मर्यादा
शिकावत नहीं तरी
पहलो गुरू, माँ शारदा

विडंबना विडंबना
जीवन जगसू जपत हरी नाम
दबेव वाणी संग चलू
बस यही से काम

शेषराव येळेकर
दि. १४/०३/२१


 पातर रोटी
  

पोवारी को खास पक्वान 
इतिहास जमा होय रहीसे, 
नाव वोको पातर रोटी 
तोंडला पानी आय रहीसे. 

गहूको नेहेन कणीक ला 
बहुत मेहनत लका गुथकर, 
चिकी आयेव क् बाद मा 
लोया हात लका फैलायकर. 

कागज वानी पतली बन रोटी 
वोला माती क् फूटेव भदाळपर, 
पकायकर बनायेव जाय रोटी 
मंद मंद आचपर सेककर. 

दूध-साखर मा घीव की धार
भरपूर मात्रा मा डाककर, 
खाये जात होती शौकल् 
स्वाद बखान बखान कर. 

आता पातर रोटी भय गयी 
पोवार समाज माल् लुप्त, 
फास्ट फूड क् जमानो मा 
मोठ् होटल मा बनसेत फक्त. 

                      - चिरंजीव बिसेन
                                   गोंदिया

पातर रोटी (मांड रोटी)(चाल-चांदणं चांदणं)
                          
रोटी त sssरोटी पातर रोटी
बसी रांधनला रांधनला मायबेटी।। धृ।।

पातर रोटी को मोठो से मान
पोवारी जातीकी आय वा शान
रोटी खानकी साद लगी मोठी।। १।।

गहुकी कणिक पिसाओना
पाणीलक ओला फिजाओना
तेलको मोहोन,नरम बनावनसाठी।। २।।

घळा भोळशांन कड्‌डु बनाओ 
चुलो  पर ठेवो ईस्तो लगाओ
चुलो फुकतानी गरमी भई मोठी।। ३।।

फिजी कणिक का लोया बनाओ
दुही   हातपरा ओला  फैलाओ
कडुडु परा ठेवो शिजनसाठी।। ४।।

रोटी बनावनो ज्या बाई जानसे
ओकी  रोटी  हातपरा  तानसे
नेणत बाई क हातपरा फाटी।। ५।।

आंबाको रस नहीत साखरको पाणी
ओक संग लगसेती अमृत वाणी
जरासो नोन गा टाको चव साठी ।। ६।। 

आता पातर रोटी नामशेष होय
नवतीला रोटी कब बनावता आय
शिकाओ टुरीला रोटी बनावन साठी।। ७।।
                  
डी पी राहांगडाले 
     गोंदिया

मांडोरोटी
(अष्टाक्षरी काव्यलेखन)

मांडो  रोटी   पयलेकी
होती  पोवारी की शान !
पाहुणचार साती ओको
होतो  समाज  मा मान !!1!!

मामाजी  आवत जब
भेटन  आमरो   गाव !
माय  आमरी   परस् 
मांडोरोटी को वु ठाव !!2!!

माय चुर कणिक ला
आपट आपट स्यानी !
कर  एकजीव  घोल
पतलो   रबर  वानी !!3!!

मंडाव हांडी  पालथी
आच वालो  चुलोपर !
घोलका लहान लोया
फिराव  वा   हातपर !!4!!

कागद  वानी  पतली
मंग  हांडी  पर  टाक्!
जल्दी काहळ् काहेकी
जरे  मुन   रव्ह  धाक्!!5!!

आंबारस,   दुध  घीव 
अना साखर को पानी !
मांडो रोटी संग  खात
लग  वा   अमृतवानी !!6!!

 इंजि. गोवर्धन बिसेन, गोंदिया (वडेगांव)
       मो. 9422832941
         दि. 14 मार्च 2021

 पातर रोटी 

कोणी कसेत पातर 
कोणी कसेत या मांडा 
गहु कणिक महिन 
भिजावन साती भांडा//

तेल मोहन करसे 
मुलायम न् नरम 
फिजी कणिक लोयाकी 
रोटी कागदी गरम//

चुलोपरा ठेव कड्डू 
अंगारकी धग वोला 
दुही हातपरा फैलं 
रोटी बनावनी कला//

आई-माई तपसेत 
माया पिरमकी धार 
रोटी पातर सिजसे 
कला होसे या साकार//

आंबा रस, दुध घीव 
स्वाद आणसे रोटीला 
आयो पुरानो पक्वान
नवो पणको भेटीला//


वंदना कटरे "राम-कमल "
गोंदिया

पातर रोटी
 सबमा तालेवर पाहुणचार

पोवारी को संस्कृती मा 
आवभगत की सचोटी
सबमा तालेवर पाहुणचार
रस अना पातर रोटी ||१||

मांडा रोटी पच्या रोटी
असा भी एका नाव
जेला भेटं येको पाहुणचार
वोको मोठा भाव ||२||

आमरो पेढी को पयले होती
पातर रोटी की शान
आता वोतरी मेहनत को
नही बनं पकवान ||३||

गावमाको चुल्हो पर लक
आयी शहरमा रोड पर
रुमाली अना चादर रोटी
मिलंसे हर मोड पर ||४||

कनिकला छान करके नेहेन
दबाय दबाय चुरत
चिकी आयेव पर रबरवानी
दिसं लोयाकी सुरत ||५||

लोया फिरावत पसरावतो
दाबत हातलका
मांडा रोटी दिसं पतली
पच्या वानी बाका ||६||

चुल्हो परा उलटो भदाड
बनं सेकन को तावा
इस्तो को आचपरा देती
दुय तीन परतावा ||७||

स्वादमा चार चांद लगत जब
पडं घिव की बोटी
सबमा तालेवर पाहुणचार
रस अना पातर रोटी ||८||

डॉ. प्रल्हाद हरिणखेडे "प्रहरी"
उलवे, नवी मुंबई
मो. ९८६९९९३९०७

पातर रोटी 

कलाकारी

रोटी मा रोटी पातर रोटी
बिह्यामा  देती मोटी मोटी।।

गहूकी कणीक वस्त्रागार
कासोक भाणीमा  गोलाकार।।

मड़काको रव्ह तवा गोल
हायमा फिर रोटीको घोल।।

दुर हातकी या कलाकारी
सेकत मड़कापरा खरी।।

दुध ,गुरोनी , घिवकी धार
दोना मा खाज आम्ही

अशी होती आम्हरी संस्कृती
बदलेव जमानो नहीं बनावती।।

फास्ट फुड को यो  आयोव
माडारोटी लुप्त दोसा भयोवा।।

वाय सी चौधरी
गोंदिया


पातर रोटी

मी आव पातर रोटी
कागज सी पतली
रूप मोरो गोल गोल
जसी कुकू की टिकली

गहूं को कनिक ला
बार बार छानेव जासे
कणिक भिजायश्यान
फेटेलका चिकी आवसे

पूजा पाठ चुल्हो की
बुळगी माय करसे
कड्डो मा भुरकी काळी
धुक धुक कर जरसे

बनाया जासेत मंग लोया
हातको हातपर फिरावसेत
कागदसी पतली गोलगोल
कड्डो पर पसरावसेत

गुरो पानी आंबा को रस 
सब खासेत सपासप
आब बनावन की बदली तऱ्हा
तुम्ही भी खायश्यान देखो रपारप

सौ छाया सुरेंद्र पारधी


पातररोटी 

एक जमानो होतो वू भी यादगार
समय संग याद बित जासेती
डिजिटल नव्हतो, जमानो संसार
पल पल वय दिन याद आवसेती

मोरो समय मा नही देखेव पातररोटी
लेकिन आजी मोरी सांग असी रव्हत होती
हांडी पर बनावन की पद्धत होती
कागज सारखी पतरी होती, जाडी रव्हत नोहती

यन् जमानो की पातर रोटी देखेव मी
बिह्या, मंगलकार्य मा हवा मा देखेव मी
उडाय उडाय स्यानी बनावसेती 
शायद याद रहे पातररोटी, सोचेव मी

पातररोटी हांडी पर बनसे
शायद मोरो सोच मा फरक से
आजी को हात की पातररोटी 
अना मंगलकार्य की रोटी अलग से

उमर को अनुभव थोडो कम से
परिक्षक जी, रोटी को वर्णन कम से
लिख लेयेव थोडो बहूत वोको पर
पातररोटी भी भुली बिसरी याद से...

                    - सोनू भगत

Thursday, March 4, 2021

नारेन, नारियल ०१



श्रीकाव्य

टनक नारेन
पुजसेजन
भगवानला प्रथम सदा
आम्ही चढावसेजन

पुष्पमाला,उदबत्ती
भक्तीभाव
प्रसन्नता उमलसे लेसे
मनको ठाव

श्रावनमा रास
आपुलकीकी
सण साजरा करन
गरज नारेनकी

टनकता वरत्या
श्रीफळला
मुलायमता अंदर भरीसे
अंतरमनमा संगला

सुरुवात शुभकार्य
गणेशसंगमा
सदा मान भेटसे
नारेन डोलमा

वर्षा पटले रहांगडाले
बिरसी आमगांव
जि. गोंदिया

नारेन

गणपती मस्तिस्क
       महादेव
  न् करिस अलग
     झाड बनेव 

   होतो मस्तिस्क
        वोको
समुद्र किनारपर पडेव 
    बिज सारखो

        बिज भयोव 
             अना
     नारेन झाड बनेव
        श्रिफल सना

        देव फल
          भयो
     वू आता पुजा
      स्थानी आयो

       मंगल कार्य 
         सबमा
   वोको रव्हसे स्थान
     पवित्र स्थानमा

          - सोनू भगत 


             नारेन (नारीयल )
                 !! श्रीकाव्य!!
                           
नारेन,नहीत 
नारीयल 
सब लगाओ ओको 
ठंडोगार तेल 

पुजाक आरतीको
तानाबाना
सुनी सुनी दिससे
नारेनक बिना

त्रीनेत्र शंकरका
अनवाणी 
डोस्कापरा बूच,अन्दर
रव्हसे पाणी

माणुसक डोस्‌कापरा
केस
पाणीकी खाल्याव-या लगसे
जशी रेस

नारीयलक अन्दरको 
खोबरा
माणूसक खोपळीमा रव्हसेत
कसेत ढोबरा

नारीयलको महत्व
भारी
सबजन करो पुजाकी
आता तयारी 
        
डी पी राहांगडाले
     गोंदिया

काव्य प्रकार:- श्रीकाव्य 

नारेन

       बाहेरलक रव्हसे
            मजबूत 
    अंदरलक नरम गोड
        खानला साबूत 

         नारेनको डोल
           हवनसाठी 
     अख्खो नारेन रव्हसे
        देव पुजनसाठी 

            तिन डोरा
             नारेनका 
       जसा लगाया सेती 
        शिव भगवानका

        शालसंग श्रीफल 
              देसेती
  सौभाग्यको सुचक म्हणुन 
        सत्कार करसेती

       पिवनला नारेनको
                पानी
      अना खोबरा कच्चो 
         रव्हसे बहुगुनी

 इंजि. गोवर्धन बिसेन, गोंदिया (बडेगांव)


श्रीकाव्य
कल्पवृक्ष

गगनचुंबी झाड़
     नारेनको
उचोपर झोका फारसे
   श्रीफल बलीदेनको

मानवकी मुंडी
   ज्ञानेंद्रिये
दिससेती तसाच वय
   मुखना चक्षु हे

नारेन कल्पवृक्ष
    उपयोगी
अन्न वस्त्र निवारा
  योवसे बहुगुणी

खोबरा खोबरातेल
    डोस्काला
बुचकी बनावो दोरी
  बांधनं जोड़ाला

आजोबा लगावसेती
      नाती
दस सालमा फल
   खासेती

डोलकी चटणी
   दोसासंग
करंजीको सातु बनावो
    खावो सबकंसंग

जय राजा भोज,जय माँ गड़काली
वाय सी चौधरी
गोंदिया

विषय:- नारेन (नारियल)
           !! श्रीकाव्य!!

नारेन बहुपयोगी
'रियल'
वको पानी स्वास्थ्यप्रद
बाकी 'ना'रियल ||१||

अख्खो नारेनको
रूप
नार अना नारीको
डोई स्वरूप ||२||

पुजामा स्थान
पवित्र
समुद्र तलपर झाड
रमनिय चित्र ||३||

कवटीवानी कवच
कठीन
जटा, तीन डोरा
जसो त्रिलोचन ||४||

शुभकार्यमा श्रीफल
पक्वान
कलश, सत्कार, नजरबंदी
होम हवन ||५||

जरावन, झाडू
तेल
गद्दी, दोरी बनावो
तनाको ढोल ||६||

आंगनमा नारेन 
जेको
समुद्र तटकी रीत
रिस्ता पक्को ||७||

गगनचुंबी झाड
कल्पवृक्ष
सर्वव्यापी तीन लोकमा
सदैव प्रत्यक्ष ||८||

डॉ. प्रल्हाद हरिणखेडे "प्रहरी"
उलवे, नवी मुंबई
मो. ९८६९९९३९०७

श्रीकाव्य
  नारेन

प्रभुकी रचना
अनमोल
अंदर पाणी भरेव  
नारेन डोल

नारियल टणक
बुचदार
खानला खोबरा सें
मोठो चवदार

भगवान शिवजीका
त्रिनेत्र
नारेनमा तीन गोल
सेत सचित्र

 महादेवला अतिप्रिय
श्रीफळ
सौभाग्यको शुभ प्रतीक
आय नारळ

शुभ काममा
फोडंसेती
देवला अग्र भाग
पयले चढावंसेती

खोबरा चटणी
मस्त
इडली दोसा संग 
करसेज फस्त

नारीयल पाणी
गुणवर्धक
त्वचा केस साती
सौंदर्य साधक

         शारदा चौधरी
            भंडारा

Tuesday, March 2, 2021

अष्टाक्षरी काव्यप्रकार विषय "माय" ००१

अष्टाक्षरी काव्य स्पर्धा क्र. १ ता. २६/२/२०२१ विषय :- माय

किमान १६: कमाल २४


  1. डी पी राहांगडाले

उत्तेजनार्थ/ सहभाग

माय मोरी साधीभोळी 

 गुण गाऊ चार ओळी

भाव भक्ती की  मुरत

ओकी  छानसी  सुरत


गुरु  पहेलो  वा आय

मोरी  सुंदर सी  माय

ओक ओटामा आराम

सेवा करो सोळो काम


वाच बगीचा की माली

ओक बिना कोण वाली

ओका  उपकार  केता 

नही गिनती मा लेता


माय नदीकी से धार

नही भुलु उपकार 

वाच प्रेमको  सागर

माय दयाको आगर


नव महिना की नाळ

नही तुटनकी माळ

सेवा करो सब ओकी

कुंजी आय जिवनकी

         **

डी पी राहांगडाले

     गोंदिया








  1. सोनू भगत 

प्रथम 

गर्भ जब समायेव 

दर्द मायला भयेवं

झजकोरी वोकी आत्मा

जन्मला कान्हा आयेव


भगवान कहू, माय

तोरो बिन असहाय

नाथ आमी, उपकारी

कसो देऊ अभीप्राय


माय बिन विश्व नही

जग कसो जाने माया

तोरो जान पडे वोला

जब निंघे तोरो साया


जन्मदात्री से देवकी

जग देखाईस मोला

यशोदाला माय मोरी

अष्टाक्षरी वाहू तोला


          - सोनू भगत
















  1. सौ छाया सुरेंद्र पारधी

तृतीय 

माय सरिता सरिता

वरनु महिमा केत्ती

पाझरसे प्रेम पान्हा

माया आभार जेतरी


माय मोरी साधी भोळी

ओला प्रेम की झालर

ओकी जरतरी साड़ी

कंच हिवरो कलर


मोरी माय से आधार

माया ममता की खान

प्रेम को आय सागर

घरं की रुबाबी शान


माय मोरी रुकमाई

शब्दशब्द ओकी माया

धोऊ चरण कमल

मोक्ष प्राप्त येन काया


✍️✍️सौ छाया सुरेंद्र पारधी

 





















  1. इंजि. गोवर्धन बिसेन

तृतीय 

बोट धर बालपण् ,

मोला तुन चलाईस ।

जब पळु खाल्या तब,

प्रेमलका उठाईस ॥1॥

  

सांगशान कथा तुन, 

रस्ता मोला देखाईस ।

सज्जनता का चांगला, 

पाठ मोला सिखाईस ॥2॥


कभी गरो लगाव त,

मोला कभी वा डटाव ।

हातलका मायाको वा, 

मोरी थकान मिटाव ॥3॥


होऊ निराश मी तब, 

माय मोरी आशा रव्ह ।

मोरो उज्वल भाग्य की, 

मोठी अभिलाषा रव्ह ॥4॥


मोरो सफलतामा से, 

लक्ष्मीमाय को आशिष ।

याद आवसे तब मी, 

झुकाऊसु मोरो शिस॥5॥

 

छोटो तोंडलका कसो, 

करु तोरो गुणगान ।

माय तोरो ममता मा, 

फिको लग भगवान ॥6॥

  

✍ इंजि. गोवर्धन बिसेन, गोंदिया (बडेगांव)

दिनांक : 26 फेब्रुवारी 2021.






  1. शारदा चौधरी

द्वितीय 


जन्मदात्री माय मोरी

प्रेम की पुज्य मुरत

मन मंदिर मा मोरो

सजी सें वोकी सुरत   


माय से पयलो गुरु

माया संस्कार की खान

कोणी नहाय जगमा

माय को वानी महान


पिवाईस तुनं दूध

मोला अमृत समान

हर गुन्हा होसे माफ

बच्चा सें जीव का  प्राण


धुंडू सु मी पुण्यफल

जेनं वोनं तीरथ मा

खरो भगवान तं सें

माऊली को सीरत मा


मन रोवंसें यादमा

तोरो माय बारबार

फेड नही सकू तोरा

जन्मभर उपकार


मन करसे बिनती

हर अंत श्वास तक

पुन्हा लेऊन जनम 

तोरो चं मी कुश लक


        --- शारदा चौधरी,  भंडारा

 

 

 

 

 

 

6. डॉ. प्रल्हाद हरीणखेडे "प्रहरी"

🌷 मायलाच दंडवत 🌷

प्रथम/ द्वितीय/ तृतीय/ उत्तेजनार्थ/ सहभाग

वकी का वर्णू महिमा

जेनं जन्मिस ईश्वर

मायरूप समावन

कम पडंसे बादर ||१||

 

देसे जनम जीवन

करं पालन पोसन

सेवा मायकी करके

मिले मोक्ष को साधन ||२||

 

वरदान ईश्वरको

स्वर्ग धरतोरी परा

सदा दुआ देनेवाली

माय ममता को झरा ||३||

 

माय छप्पर को आडो

देसे आश्रय सबला

झुंझुरका पासनाकी

जुपी रवंसे रातला ||४||

 

माय समान दैवत

नही दुजो अवगत

हर जनममा मोरो

मायलाच दंडवत ||५||

मोरी माय अशिक्षित

मोरो विश्वविद्यालय

वको त्याग लका भयी

जिंदगानी सुखमय ||६||

डॉ. प्रल्हाद हरीणखेडे "प्रहरी"

उलवे, नवी मुंबई

मो. ९८६९९९३९०७

  1. कौशिक चाैधरी 

उत्तेजनार्थ/ सहभाग

गर्भ आपलो ठेयस्यान

जन्म देयेस माय।

तोरोशिवाय पहलो भगवान

दुनिया मा मोरो कोणी नहाय।


डोरा उघडता बरोबर

आस भयी तोरी

मी तोरो टुरा न

तु माय भयीस मोरी।


अतंरमनमा माय

बसीसे सुरत तोरी

याद यायव पर मी

 नयन मुंदूंसू मोरी।


आपलो संस्कार लक

तुन बांधेंस सिदोरी मोरी

काही भी संकट आया त

फक्त याद से तोरी पूरी।


मन लक प्रेमळ, धीर लक गंभीर 

शिकवणूक होती तोरी

तु नाहास माय आता

फक्त याद से मोरोेजवळ तोरी।


आता फक्त याद से मोरोजवळ तोरी माय , याद से मोरोजवळ तोरी.......

----- कौशिक चाैधरी


  1. सौ.वर्षा पटले रहांगडाले

द्वितीय 

बडी साजरी गोजीरी

जसी सुवर्ण की खान

मोरी माय से कष्टाळू

श्रम कर रातदिन


झाडलोट सकाळकी

सडा सारवन कर

ढार पाणी तुरसीला

चवूकचांदन पुर


राबराब सेती हात

घडीभर ना इसामा

सदा घाई से कामकी

रव्ह पाणी गा डोरामा


माया  कर घरपरा

सदा घरसाठी झुर

अपमान भेट सदा

मान पान होतो दुर


मोरी माय सुसंस्कृत

ज्ञान देईस आमला

सुखी संसार को मंत्र

 सदा शिकाईस मोला


✍सौ.वर्षा पटले रहांगडाले

बिरसी आमगांव

जि. गोंदिया

Sunday, February 28, 2021

बेगरचार

विषय: बेगरचार 


जब दादू चलाव घर 

सब संगमा रव्ह परिवार

आत्या, काका सब होता

तुटेव सब, भयेव बेगरचार


काका ला भेटेव जुनो घर

बाबुजी पडेव हिस्सा को मालक

आत्या ला आयो साडी, खाजो

माउली न् भाई साती सोडिस हक


दुय बांधी गावखीरी की

दादू को हिस्सा मा आयी

जब मय्यत भयी वोकी 

तब हिस्सा साती बाट देखी गयी


बेगरचार न् घर फोडिस

तोडिस रिस्ता नाता

भाई भाई दुश्मन भया 

खाईन उनन् गोता


हिस्सा को धन को लालच

न् तोडिस घर की एकता

बेगरचार अटल सत्य से

लेकिन नोको तोडो खुन का नाता


~ विरेंद्र कटरे, चंदिगढ


विषय - बेगरचार


संस्कृती को बेगरचार

एक बेगरचा र अशो भी

सिखाय गये व आपली

हिंदी संस्कृती की परंपरा

धन - दोलत काही नहीं रहो

रहो से भाई - भाई को प्यार

मोटो को सन्मान,अन् लहान ला प्यार

बाप - माय को आदेश

सर्व परी शिख्या गये व

अशो एक बेगरचार!

धन - दो लत कही नहीं रहो

 रहो से ती संस्कार!

हर घर मा पूजा हो से श्री राम की

दि खावा रह गयी से श्री राम को

हर घर मा भाई भाई बन गया वैरी

एक एक इंच जमीन साठी बन गया

 सगा भाई भाई आपस मा बन गया वैरी!

 का हान गया आम्हरा आदर्श

का हान गयी आमहरी संस्कृती

सब लालच न मि टा य देयिस

आम्ह री संस्कुर्ती,अन् आदर्श

कोर्ट बन गये व आम्ह रो विधाता

धरा का धराऱ्या रह गया आमहरा

संस्कार, आदर्श

 अशो भी एक बेगर चार!


✍️ चंद्रकुमार शरणागत बिर्शी

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        (हिरो होंडा)

२८-०२-२१



आम्ही दुय राजा रानी अना आयरा दुय पीटुक

अलग रव्हनो को से बडो साजरो सुख


दिवसभर काम अना टोमना का बोल

झेल झेल के थकी अना पुरो भयेव झोल


नंनंद बाई आमरी ना काम की ना काज की

बोट भर ककडी का हातभर बीजा सांगनकी


जेवन बसेव परा सासु डोरा फाळके देखसे

लेकरू की पीर पीर सदा कानपरा आवसे


मोठा मोठा गंज अना मोठा मोठा चुला

सयपाक रांध रांधके हातमा आया सेती चुला


जीठानी बाई आमरी बडी से तोरावाली

कामधंदा ठेयके इश्कुल मा लगायके जासे लाली


सुसरो सदा नवरा ला उचकावसे भडकावसे

कही जानला जानत घडी घडी फोन करसे


भासरो ला नही रव्ह फुरसत घडी की

फोनपरा मश्गूल रव्हसे फीकर ना पैसा कवळी की


रोज रोज को जाचला त्रस्त होयके टाकेव कानपर बात

नवरा ला कयेव आता खाबीन अलग भात


बडो मीनतवारी करके नवरा जरासो मानेव

लगेव हात मीन बी बेगरचार आपलो करेव


चार दिवस हासी खुशी कसा गया पता नही चलेव

अलग होयके मीन शांती को सुस्कारा सोळेव


आपुनच राजा अना आपुनच होता प्रजा

ना काम की कट कट अलग मस्त आव मजा


चार दिवस अलग होयके बडो अच्छो लगेव

मनमा सोचेव बहुत दिवस  घरको सेमानो तापेव 


काई दिवस बाद हाळ्या कोरोनाला झोमाळा झोमेव

घरमाको किरानोला शनी गीरासन बसेव


लेकरूबी दिवस भर हल्ला मचावत होता

काई करू तरी हाळ्या चुपचाप बसत नोहोता


आता याद आयी सुसरो दिवसभर लेकरू संभालत होतो

चिल्लर चुल्लर खर्च भासरो संभालत होतो


जीठानी बी घरका बारीकसुरीक काम करके जाय

पाहुना पयी आता त नंनद मदत करत जाय


चार दिवस को बेगरचार मंग चांदनी दिसन बसी

राजा रानी को संसार परा अंधरी मासी बसी


दिमाग माल बेगरचार को भूत निकल गयेव

सकाळीच उठके मीन 'अवो'चलो आपलो घर जाबीन कयेव


✍वर्षा पटले रहांगडाले

बिरसी आमगांव

जि. गोंदिया


                          बेगरचार 

                           ******

जीत ऊत बेगरचार करन भयीं दाटी

जशी काही बापबेटाकी मायाच तुटी

एकच घरकी आता  होय फाटाफुटी

माय कसे बोहु काहे अशीकशी रुठी


एकठण टुरा ना बीह्या करेव सुखमा

बोहु आयी घर, नाव ओको रूखमा

करीस शिकायत नहीरवजन एकमा 

मी  नही रहू  कसे सासु क धाकमा


बोहु की आयकीस ना भयेव बेजार

बापला कसे आता करदेव बेगरचार

बाप क डोराला फुटी आसुकी धार

अंतकरण फाटेव ना भएव तारतार


मायबाप आमरा आती दयाका सागर

उपकार च नही फेळनका जिवनभर

सम मा संपती को मनमा बिचार धर

मायबाप काहां जायेती, बिचार कर


जन्म देईन ना पालनपोषण भी करीन  

हातक फोळावानी तोरो जतन करीन 

लहानोको मोठो करीन,जग देखाईन

दुय का चार हात भी तोरा  करदेईन


जब तुमी होवो एकदुय टुराका बाप

नही पळनकी का उनपर तुमरी छाप

घर फोळशान मायबाप नोको  तोळो

बेगरचार बुरीबला,नातो नोको जोळो

                     ******

डी पी राहांगडाले 

      गोंदिया


पोवारी इतिहास साहित्य एवं उत्कर्ष व्दारा आयोजित राष्ट्रीय पोवारी काव्य स्पर्धा 

काव्य स्पर्धा क्र-५२


विषय- बेगरचार(बटवारा)

प्रकार -नक्कल(दंडार)

   

मोरी आयकोना


बेगरचार करबिन ना राया

येकसाठी झुरसे काया।।धृ।।


आजवरी आम्हीं सबको क-या

शिक्षण बिह्यामा पैसा भ-या

खंबुरा घरकं काममा सा-या

सब  कमायी गयी वाया।।१।।


आपली बबली बिह्याकी भयी

बचावो आपली कमाई कायी

आयको मोरी मी सांगुसू सयी

हे कोनिक काम नहीं आया।।२।।


मोठा तुम्ही तुम्हाला का?देयती

चांगली जमीन  हिसामा लेयेती

माय बाप तुम्हरं करं ठेहेती

उनला नाही कोनिकी माया।।३।।


काम करनला हेवा करसेती

आयतो पर रायतो हे खासेती

काही कवनत गुस्सा करसेती

आम्ही फुकट को नहीं काया।।४।।


    मोरी आयकना

लहानको मोटो उनन करीन

गरीबिलं जिंदगी सवारीन

घर दार कष्टलं उभो करीन

यन उमरमा देवो साया।।५।।


माय बापकी सेवानही करती

वृद्धाश्रम मा उनला ठेवसेती

कुनावकी समाज गाये किर्ती

पल पल तळपे उनकी काया।।६।।


अशी करनी शहानो कोन कहे

उपाशी मायबाप बदनामी होये

प्रापर्टी ओकी उ का? उपाशी रहे

चांगला संस्कार चली गया।।७।।


""जय राजा भोज, जय माँ गड़काली"""

वाय सी चौधरी

गोंदिया


विषय - बेगरचार

 **************


लहानआंग क् खटपट क् कारण

दुय भाई इनमा भयेव बेगरचार, 

लहानपण पासून संग रह्या पर 

आता नही रहेव उनमा प्यार. 


घरक् हिस्सापासून बाडी, आंगन, 

धानधन्सी सब अर्धो अर्धो धर लेईन, 

जेवर जाटापासून बर्तन भांडा 

कपडा-लत्ता अर्धा अर्धा बाट लेईन. 


असल कमसल करता करता 

खेती की जमीन बी बट गयी, 

रोड ला लगी जमीन अना 

ओलित की बी बराबर भय गयी. 


एक-एक बहिनको दुही भाई करेत साडी, आननो लिजानो तय भयेव,

मायबाप ला ठेवनसाती भाई इनमा

कोणतोबी एकमत नही भयेव. 


एक मायला एक बापला ठेवो 

पंचायत मा फैसला भयेव, 

जेन् चार टुरू पोटू पालीस गरीबीमा 

वु बाप सबला जड भयेव. 


माय करन् लगसे घरको काम मून 

दुही मायला ठेवनला तैयार भया, 

बापक् डोरा मा आसू, सोचसे - 

मोर् हातल् कोणता पाप भया. 



                      - चिरंजीव बिसेन

                                  गोंदिया


विषय -बेगरचार


संयुक्त परिवार एक इस्कुल

जमे तबवरी रहेच पायजे

आजा आजीको अनुभव

नातुला भेटे देये पायजे।।


सबका बिया होतवरी 

रवो एकमाच

करो काम मोठमोठा

फायदो होये सबलाच।।


विभक्त परिवार भयि गरज

रवो कहानबि

सन तिवारला एक रवो

करो खानपानबि।।


विभक्त रवनो से बात हिम्मतकि

नितीलक कमावो धन

पर् मायबापकि सेवासाठी

नोको कवो अडचण।।


करो बेगरचार होवो अलग

पर् मायबापको ठेवो मान

पोवारी संस्कृती अमर ठेवो

बनो श्रवणजसो पुण्यवान।।


पालिकचंद बिसने सिंदीपार (लाखनी)


विषय: बटवारा


बटवारा नहाय अच्छी चीज भाऊ,

सबको मनला ठेस पहुचसे,

घर का व्यक्ति पड़सेत एकटा,

दुःखी मन यो सबला कवसे।।


होसेत दुर एक दूसरो लक,

हकीकत सपना बन जासे,

सबकी भावना चुर-चुर कर,

बटवारा को सागर मा बह जासेत।।


एकता ला ठुकराय कर ,

बटवारा जो कर से,

मानव जीवन का सेत वय हतियारा,

दुःखी मन यो सबला कवसे।।


बटवारा को टाइम पर ,

बदल जासेती पुरा रिश्ता,

नहीं रव कोई आपरो,

टूट जासेती गहरा रिश्ता।।


      कु. कल्याणी पटले

       दिघोरी, नागपुर



विषय: बेगरचार


लिखुसु शब्द मी, वास्तविकता का

भरेव घर होतो, आजा मुखिया होतो

जब बेगरचार भयोव आमरो घर को

साल भर को होतो मी, जब होश नव्हतो


जब होश आयेव तब दुनिया जानेव

आजा मोरो, बाप को हिस्सा मा आयेव

होतो लहान त् कहानी सांग दादा

दादा को सब्द मा परिवार मी जानेव


कहानी वा भरेव घर मा की 

बाबुजी, अजी, अना मोठा बाबुजी

असा होता पितातुल्य तिन भाई

प्रमुख को रुपमा दादा उनको अजी


दुध को धंदा होतो घर मा

जोड होती तिन भाईंकी

सायकल लका जाती तिरोडा

धरत जनसेवा ट्रेन सकारकी


गाव को दुध नागपुर लिजाती 

हजारो लिटर दुध को व्यापार होतो

वन बेरा आमरो दुध को साम्राज्य होतो

भाई को जोड सामने तिवारी भी झुकत होतो


पच्चिस साल वरी दुध को आमरो साम्राज्य होतो

भाई को जोड लका बाप भी सिना तानत होतो

दुय एकर की खेती बावन एकर भयी 

धनाड्य होतो परिवार, लेकिन अहम नवतो


आयो वू साल उन्निस सौ पंच्यान्नव 

जब तिन भाई को भयोव बेगरचार

मजबुत साम्राज्य आता बट गयेव

बापु मोरो पंधरा एकर को रहेव कास्तकार


बावन एकर खेती जमाईस आजा न् 

पंधरा पंधरा एकर मा आयी सबको हिस्सामा

धिरु धिरु सब भाई कोमाय गया 

बस हिस्सामा आयी भुमी रही सामा


कास्तकारीच भयोव बापु को व्यावसाय

नांगर चलायस्यानी पालिस आमला वोन

विरासत मा आमला काही नही भेटेव

जब करुसु याद वय स्वर्णिम दिन


बेगरचार न् करिस सबकी शक्ती हिन

संदेश मोरो नोको करो बेगरचार

भाई भाई को जोड मा से वा शक्ती

लिख लेयेव दुय शब्द मन मा आयो बिचार


✍🏻- सोनू भगत


विषय:- बेगरचार


भाई भाई मा भय गयेव अज बेगरचार ।

माय उनकी दुखी भयी करशान बिचार ।।


अजी उनको मरेवत् मायला होती आस ।

दुयी टुरा रहेत संग मा ओको पास पास ।।


बहु बहु को झगडा लक तुटी उनकी जोडी ।

भाई भाई तंग भया आयेक उनकी खोडी  ।।


एकही बहु तयार नही सासुला ठेवन जवर ।

सोच सोच शान माय ला आवनबसी भोवर ।।


राम लक्ष्मण सारखा भाई कामत साठी झगडत ।

भयी मारापिटी उनकोमा त चलन लग्या लंगडत ।।


मायको हिस्सामा आयी कामत लहानको ढोडी ।

मोठोला सायबन मिली बहु निकली घर फोडी  ।।


लहान टुरु पोटु खेलनसाठी मायसंग खुप तरसत ।

जाती खेलन माय जवळ तब बहु उनपर बरसत ।।


असो देख बेगरचार माय भयी खुब लाचार ।

आता कसो होये जगनो माय कर बिचार ।।


भाई भाई मा भय गयेव अज बेगरचार ।

माय उनकी दुखी भयी करशान बिचार ।।


✍ इंजि. गोवर्धन बिसेन, गोंदिया (बडेगांव)

दिनांक : 28 फेब्रुवारी 2021.


विषय - बेगरचार


होता सब भरेव घरमा

 तब होतो सुखी संसार ,

मालूम नहीं नजर कोनकि लगी 

भयेव घरमा बेगरचार ।।


होता सब भरेव घरमा 

आपसमा होतो प्यार ,

दिस मस्त घर रुबाबदर 

जसो माता रानी को दरबार।।


होता नोकर चाकर 

भरेव घरमा भरपूर ,

होतो मस्त लाड़ प्यार 

भरेव घरमा भरपूर ।।


होती खुट परा दूय च्यार जोड़ी 

अना गाई भशी कोटा भर ,

डोरा लक नहीं दिस आता 

गाय को दूध की धार ।।


से घरमा येतरी जाय जाद

सपाई देयेती का आमरो कर ,

अशी कवत होती मगाशी 

आमरो लाहानश्या की माय ।।


नाेको देवो मोला चिमुटभर 

पर नोको करो बेगरचार ,

आपस मा बनायके  ठेवों 

तुम्ही भाई भाई को प्यार ।।


✍️ बंटी चौधरी अर्जुनी


बटवारा


बचपनमा खेल्या कुद्या एकमा भाईभाई

बिह्या होयेपर बटवारा की नौबत आई

टूटतो घर देखकर माय मनमा रोई

बापको सपनको घरोंदा तुटनकी बेरा आई


रोज को घीसघीस लक चुल्हा बी बट्या

माया पिरत भरोसा का धागा बी तुट्या

लहानांगं होन बसी बाचाबाची लडाई

देवरानी जिठानी की काही पटच नही


बरतन कपडा लत्ता बट्या बिस्तर 

बटेव बिसरो जमीन आंगण घर

कथडी ना धुस्या की थप्पी लग गई

घरकी देहरी बी बाटनला कम पड गई


बहीनी भाटवाला बुलाया बटवारामा

एकएक बहिणी आई भाई हिस्सामा

माय बाप को बटवारा की बारी आई 

बहूबेटा की बोलती बंदच भय गई


बटवारा लक होसें अति नुकसान

एकोपा लक बढंसे कुटुंब की शान

टिकावो खून को रिश्ता की गहराई

बटवारा मा कोणी की नहाय भलाई


                             शारदा चौधरी

                                  भंडारा


      बेगरचार


बटवारा कहू येला, कहू बेगरचार

घर फुटेव, रिस्ता नाता को दुराचार


समझो येला, यव बहूत बेकार

भरेव घरच् आपरो सबको परिवार


एक कोख मा लका जन्म्या भाई

एक रह्या हमेशा जब आई कठिनाई


दुख भयोव लाहनो ला त् धायेव भाई

जब रोया दूही भाई त् धाई उनकी आई


एक सुत्र मा बांधस्यानी ठेईस बाप न परिवार

माय न् वोला आपरो ममता लका देयीस आधार


भया जवान बेटा, कर देयिस उनका चार हात

दूही बहू आयी घर मा, करिन घर फोडन को घात


बायकोईनको झगडा लका भयो बेगरचार

भाई भाई अलग भया, आयो उनमा दुराचार


खुन का रिस्ता तुट्या, अलग भया परिवार

परिस्थीती असी आयी, काम ना आया संस्कार


   ✍️✍️ सौ छाया सुरेंद्र पारधी


बेगरचार 


भरेव फुलेव परिवार मा आयी कालीरात 

बेगरचार होनो या अचछी नहाय बात//धृ


माय अजीला रवसेत बेटा बेटी समान 

उज्वल भविष्य फुलावन कससेत कमान 

एकताको सागरमा काहे सुनामी प्रघात//1


बरतन भांडा टकराया जाऊ जिठानी मरीज 

अगाजमा भाईभाई  को प्यार भयेव खारीज 

तुफानी तांडव करं कुटुम परा  आघात//2


आपलोच होय जासेत एक दिन पराया 

दुख घोलनोवालो यव कौन से हत्यारा 

गयरो रिशता तोडनला नको देओ सात//3


आमरी हिन्दू संस्कृती एकात्मता मिसाल 

प्रगती को संख बजावसे दिगंतमा खुशाल 

मानव्य ला अपनायकर संगमा खाओ भात//4


वंदना कटरे "राम-कमल "

गोंदिया

28/02/2021



   बेगरचार


सब करो आता बिचार,

काहे भयव बेगरचार ll


एकमा होता सब संगी,

आता बेगरा भया संगी ll


खेलत होता बोलत होता,

संकट मा सब संग होता ll


लोग कहवत भाई आती,

कहा मर गयी इनकी मती ll


जो करे जास्ती की अती,

बेगरचार की आवसे मती ll


परिवार अना समाज की बात,

बेगरचार मोठो बिचार की बात ll


जोड़न की करो आता बात,

साहित्य-समाज की से बात ll


करो तुमी आत्मा लक बात,

सही से का बेगरचार की बात ll


आता करो एकच सबजन बिचार,

कसो भयव आमरो बेगरचार ll

************************

प्रा.डॉ.हरगोविंद चिखलु टेंभरे

मु.पो.दासगाँव ता.जि.गोंदिया

मो.९६७३१७८४२४


बेगरचार


मान गयो, रुतबा गयो, गयी घर की बहार,

गांव को महाजन घर, जब भयो बेगरचार.


तीन बेटा भीम घाई, होतीन महाजन का बख्खा,

तिन्ही होतीन धुनका, अना काम का बड़ा पक्का.

खूब बढ़ी खेती-बाड़ी, अना पनपीन धन-ढोर,

देखन लायक बनयो, महल जसो  मोठो अवार.


भाई-भाई मा साठ-गाँठ, बाप ला चोवत होती,

घर का ढोला मा अन्नपूर्णा, हरपल सोवत होती.

देखत-देखत बेटा भईन आता बिहया जोपता,

दस गाँव की रिश्तेदारी मा फैल्यो एव समाचार.


मोठो बेटा को रिश्ता भयो, तगड़ो महाजन घर,

बहू को पाय संग मा आई, शुभ छण भर-भर.

महकन लग्यो जीवन सबको, वोन आँगन-घरमा,

समृद्दि अना संपन्नता मा, चमक्यो सब संसार.


चल्यो समय हांसत-हांसत, जीवन की चली गाड़ी,

काँटा भी फूल जसा, इंधारो भी लग उजाड़ो,

नाहना दुहि बेटा को, करिस महाजन न बिहया,

नाती-नतरु को घर भयो, ब बनिन सब संस्कार.


भाई-भाई को हेम येव, कब तक चलतो राम,

उजाड़ो कबतक रहवतो, का नहीं होती शाम.

कारी डोसकी हिनको मंतर, करन लग्यो काम,

सुगढ़ता का बोल हिनमा, उठन लगी चित्कार.


गृहस्थी को सूर मा, कसो होन लग्यो हल्ला,

रान्धनखोली की खटपट, देख रहयो मोहल्ला.

आपरो-तुपरो की भय गयी, घर मा आता रीत,

सुख को येन संसार मा, पनपीन आता विकार.


जरा-जरा सी बात पर, लगन लगी पंचायत,

आपरा हिनला जलील करनो, बन गयी रवायत.

सबकी हांडी ला आता, करनो से अलग-अलग,

बिट्टयसार महाजन साब न, असो करिस विचार.


वोन महल की वोतरहि, सामान बट गइन,

मान-सम्मान, हेम, दिल मा ल हट गइन.

हेवा-हिस्का की रेखा न, खिचीस एक लकीर,

वोन घर को परदा हिन की, बन गइन दीवार.


सबको न्याय करन वालों, खाल्या देख से आता,

मुछि को ताव गयो, नहीं कर वू चार मा बाता,

सोच-सोचकर घूरन लग्यो, तीन बेटा को बाप,

चेहरा पर पानी नहीं रहयो, दिख से वू लाचार.


नोट टूटनो दुनिया मा, खुदरा का आत निशान,

अगाज्या महाजन का बेटा बनिन

नाहन किसान.

एकता की ताकत ला, पहचानो गा  भाउ पोवार,

सुख-दुःख मा साथ रहो, नोको करो बेगरचार.


मान गयो, रुतबा गयो, गयी घर की बहार,

गांव को महाजन घर, जब भयो बेगरचार.


तुमेश पटले "सारथी"

केशलेवाड़ा (बालाघाट)


          नोको करो बेगरचार


उजड गया कजाने केतरा

कुटूम येनं संसारमा

आपलो खून नही रहेव आपलो

येनं बेगरचारमा ||१||


चुल्हो बट गयेव भीत बट गयी

बट गया माय बाप

भाई बहीन भोवजाई बट गयी

रिस्ता आपोआप ||२||


भाई भाई दुश्मन भय गया

दरार आय गयी नातोमा

पिसन साती अनाज रोये

कांडी उखर जातोमा ||३||


मायबाप तमाशा बन गया

पंच भय गया हैरान

मर्यादा कुलकी बट गयी

गयी कुटूम की शान ||४||


लंबो बालको चमत्कार लक

टुट्या खूनका रिस्ता

खेती किसानी बेगरचारमा

भय गयी सप्पा खस्ता ||५||


एक दिवार लक बनी दुय दुय

खोली एकच खंड की

कथडी बिस्तर बिसरो बाडी

टुट गयी जुनी मंडकी ||६||


दुखी होय जाये दिल मायको

अना बाप लाचार

फलेव फुलेव अना भरेव घरमा 

नोको करो बेगरचार ||७||

________________________________

डॉ. प्रल्हाद हरिणखेडे "प्रहरी"

उलवे, नवी मुंबई

मो. ९८६९९९३९०७


विषय - बेगरचार


सुख को मंदिर आय घर

अना परिवार से वोकी डोर

सबजन रहेत प्रेमलक

त स्वर्गदुन सुंदर होसे घर


सबला मालूम से परिवार

की शक्ती एकता मा रव्हसे

पर जब होसेत बिचार मा मतभेद

तब जनम लेसे बेगरचार


जागा को बेगरचार भयव

तरी प्रेम को नोको करो बेगरचार

अलग भयात तरी

एकसंग मा साजरो करो सण त्योहार

सुखदुःख मा भी रहो एकसंग

यवच से सुखी परिवार को सार



✍️ सौ. श्रुती टेंभरे बघेले


बेगरचार


मोरो अहम मा

वहम होतो

आपलोच ताल मा

मी चलत होतो


एकदिवस मनमा

भयोव बेगरचार

अहम को वहम तुटकर

शिकेव शिष्टाचार


तब मोरो दिलमा

उठी आनंद लहर

सुख अना समाधान को

आयोव बहर


आपला दूर होता

वय जवर आया

मोरा अहम का साथा

देखता दूर भया


जीवन की परिभाषा

तब समज आयी

मन की गरिबी

देखता गायब भयी


मन को बेगरचार लका

दिलको बटवारा बचेव

अज एक अज्ञान

पूर्ण ज्ञान शिकेव


दुर्गुण संग बेगरचार

शिकावसे शिष्टाचार

जीवन सफल होये

जब ज्ञान संवर्धक आचार


शेषराव वासुदेव येळेकर

दि 28/02/21

Tuesday, February 16, 2021

खुर्ची/खुरची 25



खुर्ची 

चार पाय दुय हात खुर्ची मोरी प्यारी
बाप दादा की आठवन या बहूत हे न्यारी

खुर्ची लाकूड की विद्युत रोधक 
शरीर उर्जा बचावने वाली साधक
खुर्ची पर बसता कंबर रवसे सिधी ताट
सुखदायक, आरामदायक ठेवसे पाठ

यन खुर्ची पर बसता बहूत मिलसे आराम
काम करनो मा तरतरी निंद होसे हराम

लाकूड की खुर्ची तोरा बहू उपकार
सबला आराम देनेवाली तू निराकार

 शेषराव वासुदेव येलेकर
दि१५/०२/२१


लाकूड की खुर्ची

लाकुड को बनेव येको ठाचा
रव्हत होती बडी मजबुत 
नव्हती ओतरी नरम 
लेकिन बसन साती होती साबूत

घर घर की होती शान 
रव्हत होती लानांग मोठांग
पावनाईन साती होती सोफा
परमानंट होती यकी याद की गाठ

देखेव फोटू मा यला मीन् 
याद आयेव चवधरी नाना को घर
जाऊ लानपन मा पेपर बाचन
राजा घायी पाय ठेवु बसु ओको पर

खिल्ला पाटी की बनी रव्ह खुरची
बसु ओको पर त् हल् जितन उतन
कभी कभी वहान खिल्ला निकल उपर
उठू खुरची पर लक त् पँट फाट टरकन

 विरेंद्र (भिमु) कटरे


लकडा की कुर्ची


का सांगू भाऊ पहले 
मोरो बहुत होतो थाट, 
बैठक क् कमरा मा मी 
दादाजी की देखत होती बाट. 

दादाजी रोज मोरपरच
आयकर होता बसत, 
सबपर नजर ठेवत ना 
काम होता समझावत. 

अजी ना काकाजी 
बेंचपर होता बसत, 
टुरू पोटू बसनसाती 
चटई आनकर बिछावत. 

पर आता दिवान ना सोफा
आय गई से बैठक मा, 
मोरी हकालपट्टी भय गई 
बेकार समझकर आंगन मा. 

बडो बुरो लगसे आपली 
अशी हालत देखकर, 
रोवन की इच्छा होसे 
पुराना दिन याद करकर. 

पर आता आपलो दुखडा 
सांगेवल् का फायदा, 
चढतो सुरज बी ढल जासे 
येवच जगको से कायदा. 

   
                      - चिरंजीव बिसेन
                                  गोंदिया.
 

खुरची/ खुर्ची

मोरो आईकि से देवा कंबर लचकी
फदीसा होसे सेनलक सरावनकी।
देवा दे ना मोला जादू की खुरची
जादू लक लगाय देऊ मी फरची।।

बाबूजी मोरा खेतमा दिनभर राबसेत
घामचरचरा थक्या खेतलक आवसेत।
जादूको खुरचीपरा बाबूजीला बसावतो
दिनभर को थकवा खिनभरमा जातो।।

जादू को खुरचीला अगर पंख रवता
मस्त मामाजिको गाव उड़कर जाता।
मामा मामी देखता मोला डोरा फाड़कर
माय अजीला लिजातो मी मेला देखन।।

इस्कुलमा सब खुरची देखकर होता दंग
बसनसाती उबड़ा उताना होता सब मंग।
गुरुजी भी भाव देता जसो राजकुमार
नहीं देता मोला कभी छडी को मार।।

असी मोरी खुरची रवती बडी गुणवान
चार पाय ओका बडा रवता दमदार।
दुय हाथलक करती सबको सुखीसंसार
खुशी बाटतो सबला होतो सबको कल्याण।।

सौ. छाया सुरेंद्र पारधी
सिहोरा

 खुर्ची
दादाजी की खुर्ची होती बडी मस्त
चार पाय अन् दुय हात|
 याच येकी वोळखअन् ऐकी ताकत|
सब घर मा एकच खुर्ची
बसत होता सब ब हिन -  भाई आरी - पारी|
बदल ग ये व जमाना, बदल गयी खुर्ची|
सब घर मा चार - चार प्लास्टिक की खुर्ची|
भूल गया आम्ही वय आपला संस्कार,
 आरी - पारी बसन का संस्कार|
बाट्टनो भूल गया दुःख - सुख आम्ही,
खुर्ची पर बसत होता त
अशो लगत होतो दादा जी को शहारा से|
जब ढे उ हात खुर्ची पर त 
अशो लग दादाजी को हात मा हात से|
आता एक खुर्ची रय गी सत्ता को बजारमा
खीचा - खाची रय गई सत्ता को बजारमा|
पर मोरो दादाजी की खुर्ची होती अनोखी समर्पण,त्याग ,दुसरो की खुशी शिकवत होती|

 चंद्रकुमार शरणागत बीरशी
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हिरो होंडा

खुरची/ कुरची

मोरो मास्तर नाना की या खुरची
शान होती पाटन कवेलु को घर की
नव्हती मोरो घरमा या खुरची
लेकिन शान होती मोरो नाना घरकी

हात तुटेव त् रिपेयर होय जात होती
पाय तुटेव पर इट पर भी उभी रव्हत होती
घर घर मा राज करत होती
बसन जाऊ त् शाहीपन दर्शावत होती

बालपन मा सिढी सारखो चंघत होतो
होती वा बडी बजनदार भारी 
बसेव ओको पर त् लग घोडा स्वारी
बहूत काम की होती  खुरची आमरी

आता सोफ़ा सेट को जमानो आयेव
लकड़ा को जाग स्टील को भयेव
देखारो मोठो टिकाऊपणा गयेव
असली माल गयेव कमसल आयेवं

देखु वोला मी आता, नही दिस कही
आता सोफा, प्लास्टिक की दुनिया रही
गाव भी आता भया मुक्त खुरची पायी
याद वा तब की आता फोटोमाच् रही

- सोनू भगत

            खुर्ची 
           
चार  पायकी खुर्ची दिससे छान
आएव बीह्याई त ओकोच मान

जसा सुखी संसारका चार काम 
धर्म,अर्थ,काम,मोक्ष, परमधाम 

खुर्ची परा बसो त एकदम ताठ
मंग  नही  दुखनकी तुमरी पाठ 

खुर्ची पर बसो,आरामच आराम
दुय सेत हात उनको मोठो काम 

हात  ठेवो  सिद्धा नही लग नस
खुर्ची कसे घळीभर मोर संग बस

खुर्ची पर बसो ना मान टिकाओ
शांति लका बसो ,आराम पाओ

वजन देख बसो नही लळखळे
जास्त वजन होए पटन्यारी मुळे 

एक पाय मुळेव त भयीं लंगळी
बसनेवालोकी खिचनबसी तंगळी

एकमेककी तंगळी नोको खिचो
मिलकर चलो जादा नोको सोचो 

सलोखालक रहोनोको खीचो टांग
समयला ओळखो ओकीचसे मांग
               
डी पी राहांगडाले 
   गोंदिया
[2/16, 6:31 AM] सौ छाया पारधी: चित्रकाव्य
दिनांक- 15.2.2021

 नेता की खुर्ची
 
सब क्षेत्र मा अज,
से वा बहुत खास।
ओला मिळावन साठी,
सबला लगी से आस ॥
 
ओकोसाठी अज लोक,
झगड सेती खुप ।
कोनला रहे माहीत,
कसो रहे ओको रुप ॥
 
ओकोसाठी मानुष अज,
देसे खुप आश्वासन।
वा मिळताच मानुष कसो,
जासे सब बिसरशान  ॥
 
वा जेको जवळ जासे,
ओकीच रवसे मजा।
ओको जीवपर मानुष,
अज होय जासे राजा ॥
 
वा रवत वरी सबला,
लग जासे मिर्ची ।
वा म्हणजे कोन त,
आय नेता की खुर्ची ।।
 
*- इंजि. गोवर्धन बिसेन, गोंदिया (बडेगांव)*

कुरसी
दि. १५.०२.२०२१ (सोम्मार)
            
         सिंहासन बत्तीसी

खूरची कहो या कुरसी
आय घरबार की शान
देवता पासना मानुस वरी
येकी किरती महान ||१||

मोठांग नहानांग ओसरी परा
लग्या लकडा का आसन
शोभं राज दरबार जसो
चलं घर को प्रशासन ||२||

आरामखुर्ची अथवा सादी
हर घर को रुबाब
मंग वा बदली सोफामा
खुरची बन गयी ख्वाब ||३||

बदलेव जमानोमा आया
चेयर मा बदलाव
प्लास्टिक फायबर लोहा टीन
नाना आकार अना भाव ||४||

थक हार कर घर आवो
बसो करो आराम
व्हीलचेअर पारना खुरची
चैन देन को काम ||५||

खुरची पर बसनो रव्हं
आसन प्राणायाम
धरती को इस्पर्श बिना
मिलं पूरो आराम ||६||

गुरू श्रोता राजा वरिष्ठ
पुढारी आफिसर
इनकी कुरसी माननीय
देवताइन की सर ||७||

एक दुय अना तीन चार
कुरसी गिनती बताय
एक टेका दुय हात अना 
तीन पाटी चार पाय ||८||

चार पाय की खुरची
बैठक पेंदा पर
मृत्यू बाद सकोली समान
चार को खांदापर ||९||

निर्जीव खुरची रुबाबदार
दिसं से सजीव सरीख
घमंडी लालची ना बनो
देसे सबला सिख ||१०||

खुरची बनाये अभिमानी
लालची हवामा उडाय
या दूरदर्शी कर्मशील
वंदनीय भोजराय ||११||

आखरी मा सूनलो मोरी
बात एक एत्तीसी
कुरसी वंदनीय भोज की
सिंहासन बत्तीसी ||१२||

डॉ. प्रल्हाद हरिणखेडे "प्रहरी"
उलवे, नवी मुंबई 
मो. ९८६९९९३९०७

 खुर्ची

दुय हात चार पाय बिचमा बैठक साजरी
मोठागं  दिससे खुर्ची शोभस्यारी

दादाजी रवत या पाहुणा पई
खुर्चीपर बसंसेत आयकर सप्पाई
येनं खुर्चीला सें मान चं भारी
लहान मोठोमा येकी लालच भरी

एक दिन शाळांमा गदरिंग लेईन
गोल बिचमा सारी खुर्ची ठेईन
संगीत बंद होयेपर बसजं बारीबारी
दिल खुश भयेव बक्षीस जितस्यारी

वर्गमा सें लाकूड की टेबलखुर्ची
वोकोपर बसं सेत आमरा गुरुजी
खुर्चीपर बसके देसेंत जानकारी
खुर्ची टेबल को नातो मोठो भारी

एक दिन सोचन बसेव मी घडीभर
कसो बस सकून जमीनपासून उचोपर
खुर्ची कवन बसी सें मोरी तयारी।  
बसेव वोको गोदमा ईच्छा भयी पुरी

मोठो होयकर मी आदर्श गुरुजी बनून
खुर्चीपर बसके देशको भविष्य घडावून
नवनिर्मिती का गुण रहेत मोरोमा जरी
ठेऊन पुरानी चीज मी संभालस्यारी

                                          शारदा चौधरी
                                              भंडारा

कृष्ण अना गोपी

मी बी राधा बन जाऊ बंसी बजय्या, रास रचय्या गोकुलको कन्हैया लाडको नटखट नंदलाल देखो माखनचोर नाव से यको!!१!! मधुर तोरो बंसीकी तान भू...