Sunday, May 16, 2021

बैलबंडी गाडो 63






बैलबंडी 
.                  दि:१६/०५/२०२१
                   वार:इतवार

  बैल म्हणजे आपला कास्तकार का एक मिञ /संगी आत. 
एक शेतकरी खेतीपर आधारीत रवसे .वोकोसाठी मग बैलबंडी की जरूरत रवसे .
त मी गाळोला का का सामान रवसे वा सांगूसू.
१)आस्कुड
२)खिल्ली
३)दाबखुटा
४)गुडधा
५)गाडो की टोंडी
६)१२ खांब
७)६ पुठ्ठा
८)२ धुरा
९)लोखंडी बेठ
१०)उलट
११)धुरखिल्ली
१२)मंझारा (मोठोवाला)
१३)पावटणी ६
१४)हरणी (लंबीवाली)
१५)जुवाडी
१६)बारती
१७)शिवर २
१८)जोता
१९)उभारी १४/१६ लगसेत
२०)माच कमची वाली संंकलन
२१)डूलूप(आस्कुड पर को झाकन)  
22) भोवरी /चाक २
    
असो बनावसेत गाळो. आतात बाबा जमान बदल गयव .हर कामला टेक्टर लका का करसेती .चुरणी भी धान मशिनलकाच करसेत .सब कास्तकार आळशी भयगया सब आयतो -आयतो देखसेत .पहेले घंटो को काम आता मिनत लका करसेत. पहीलेको जमानोमा मयत की काळीला गाळो जुपत ,आता सिधो टेक्टरलका लिजासेत .धिरू-धीरू गाळो  की चलन मुरासे. समोर को युग/जमानोमा डोळाकला बैलगाडी दिसनको नही.

       सौ:ओमलता के पटले
 
       बैलबंडी


पेट्रोल नयी,डीज़ल नयी
ना हवा,ना लग मातिको तेल
एक माणूस दुय् बईल 
असो आमरो गाड़ो को खेल।

कोनी कवत बैलगाड़ो 
कोनी कवत बैलबंडी
काम आव कभी भी
रात रव का रव थंडी।

रस्ता नहीं पायजे टापटिप
नही पायजे डांबररोड
गाडो काढणसाठी चलसे
लहानसी बी मोड़।

खिल्ली ,आस्कुड,पावटनी
दाबखुटा अना गुडधा  
भाग आती ये सब बंडीका
खर्च नोहोतो ज्यादा।

जुवाडी,शिवर,भोवरी
उभारी,पावटणी अना जोता
कास्तकारला काम पड गाड़ोको
कहींच आवता जाता।

खात कचरा धान डुवरणसाती
करत बंडीको वापर
मस्त पारोनि करज आम्ही
बंडीपरा बसकर।

स्वप्नाली दुर्गेश ठाकरे

बैलबंडी 

पुरानो जमानो की शान,
आय बंडी कास्तकार की |
दुनिया मा नहाय गाळी ,
बैल बंडी सारकी ||

बंडीला बैल की जोडी,
दिवा मा जसी बाती |
बंड्या अन् बबली,
दुयजन गाणा गाती ||

बंडीलक पयले जाती ,
यन गाव वन गाव |
नही लग खर्च ,
मजा बहुत आव ||

कास्तकार का संगी ,
बैल ला संग बंडी |
डु वरस्यान धान ,
बिकनला जाती मंडी ||

बंडी की किमया मोठी ,
भोवरीला खिल्ली ठोकी |
वंगण  लगावसेती ,
झीज नही होय वोकी ||

डोरामा आवसे पानी ,
बंडी की कसी कहाणी |
आस्कुड,उभारी, दाबखुटा ,
नही रया पावटणी ||

उषाताई रहांगडाले (बिसेन)

       बैलबंडी(बंडी/गाळो)
                
कास्तकार की आनबान शान
जेक आंगनमा उभी बैल बंडी 
ओलाच सबजन कसेती गाळो 
लाकळी रव्ह या रव्ह लोखंडी।। १।।

गाळोला दुय चाक गोलगोल
बुदला,खांब,पुठ्ठा लक बन्या
बुदलाला रव्हसेत 2आवना
पुठ्ठा खिल्ली लका से तन्या।। २।।

सामने धुरखीली,मंघ उलट
लम्बा लम्बा सेती दुय धुरा
सय पावटनी,ना एक हरणी
बीचमा रव्हसे एक मंझारा।। ३।।

लोखंडी आस्कुळ लाकळी डोंग
दुय पीहनी,ना   दुय सितारा
दुय खिल्ली,ना एक दाबखुटा 
मंझारा मा सेती  चार कनंगरा।। ४।।

दुय शिवर,जोता ना जुपना
सोळा उभारी,एक जुवाळी
खात फेको,या  चुरनो करो
 गाळौमा आनो काळीकुळी।। ५।।

आता गाळो सब बीसर गया
बैल पालन को त्रास आवसे
ट्रॅक्टर लका सब काम होसे 
गाळो बीचारो कोंनटोमा रोवसे.।। ६।।
                 
डी पी राहांगडाले 
   गोंदिया

 बैलबंडी, गाळो
खात की बंडी
आयो   तीज  सन 
बंडी    खेत  जान |
धुरा   फोड़    कर
तयार  करीस दान ||१||

बंडी  तयार करीस
खात कचरा भरीस |
बांधीमा     उपसन
संग  पावड़ा धरीस ||२||

भोवरी    माखकन
पाणी   पिवायकन |
मंग       बंडीलाच
बईल  जुपीस  वन ||३||

आमी     लहानपन
संग    खेत    जान |
वको        बंडीपर
बस्या    सब   जन ||४||

बंडी     खेत   गयी
खात   फेकन  लाई |
मस्त    खेत   जाय
सबला मज्या आयी ||५||

घर   वापस  आया
बंडीकी  लगी माया |
आमी थकवा लका
रात  भर      सोया ||६||

(वन, वको कास्तकार 
  साती वापरेव गयीसे)

इंजि. गोवर्धन बिसेन, गोंदिया
          मो. ९४२२८३२९४१
            
 पती पत्नी 

पती पत्नी गाळो का दूय चाक
फिरसे जीवन सुखदुःख समान
आस्कुड घर का बुजरूक मान
संयम को दाबखुटा देसे समाधान

खिल्ली बचत की भविष्य आधार
बारा खांब देखो भरेवं परिवार
नातो रिश्ता जसो पुठ्ठा भरदार
प्रेम लक माखो जीवन बहारदार

दया करुणा का बैल बनेत सारथी
दुय फूल जीवन मा आनेती भरती
जोता आशाका जीवन सार्थक करेती
प्रेम बांधकर ठेये जसी बांधसेत बारती

मोहमाया को हरनी मा नोकों फसो
जुवाळीको भारला बोझ समजो नोकों  
सोळा गुण उभारी, आधार जिवणको
लहानसो घर, माच बिंधेव से प्रेमको

असो सुंदर गाळो बन जाये जीवनको
आस्कुळ पत्नी वोको पती डूलूप आय
एक करे कज्या, दुजो चूप रह जाय
जीवन को मानव तू सार समझ जाय

सौ छाया सुरेंद्र पारधी
सिहोरा

बैलबंडी

किसान को मालवाहक बैलबंडी
धान आनसे खेतलक् खंडो खंडी

ओझा वाहसेत किसान संग दुय बैईल
घरको रस्ता नहाय कठीण कासरा ठेव सईल

बारा पाटी सय पुठ्ठा ,दुय धुरा पर
चौदा उभारी खेतकी लक्ष्मी पहूचावसेत घर

दुय भोवरी आस्कुड पर उपर परसा का डुलूप
किसान को लक्ष्मी ला कभी नही लग कुलूप

दुय शिवार खोसकन सामने जोता संग जुवाडी
लोहा को पट्टा चढायकन भोवरी चढसे पहाडी

बंडी को बिचमा शानलक आडवी हरणी
बैल भोवरी को बिचमा भरसे पाणी

बैईल ला यसन अना भोवरी आसकूडपर खिल्ली
बैईल बंडी ला चलावनकी किसान जवर किल्ली 

अन्नदाता की शान आय बैलबंडी
टॅक्टर मशिन को जमानो मा तुटी यकी गोडी

शेषराव वासुदेव येळेकर
मु. सिंदीपार जिल्हा भंडारा

 गाडो (बैलबंडी)
  

किसानी क् काममा सदा आवसे काम
बैलबंडी किसान क् जीवन को आधार, 
खेत मा फेकनसाती उरकुडा को खात 
या जानको रव्ह सामान साती बजार. 

ख-यान मा डुलावनसाती धानका बोझा
या खेतल् आणन की रव्ह धान की तणीस, 
बैलबंडी रव्हसे हमेशा जानला तैयार 
कभी नही कर् आलस ना नही काहाळ किस. 

गाडो से किसान को सच्चो साथी 
संगमा वोकी का-या भु-या की बैलजोडी, 
उनक् भरोसल् करसे मोठ् मोठा काम 
संसार मा बनी रव्हसे वोक् अमीट गोडी. 

धान की रास, जलाऊ लकडी आणनला 
धान क् मोळाकी करनला चुरनी, 
बजार मा बिकनला खेती का धान
गाडो बीना नोहोतो किसान को साथी कोनी. 

पर आता गाडो की जरूरत भय गई कम 
ट्रेक्टर, मॅटाडोर सरीखा आय गया साधन, 
गाव मा गाडो क् अस्तित्व भय गई से खतम 
या बुडगा आदमी वानी भय गई से पड्यावधन. 


                     - चिरंजीव बिसेन
                                 गोंदिया

बैलबंडी
काव्यप्रकार अभंग
साधन


बैलगाडी योव, खेतीको साधन
किसानको धन, गायी भसी।।

घरकाच गोरा,जोडी़ भाई भाई
बंडीकी खिचाई ,करसेती।।

चुरनीला बंडी,धान खंडी खंडी
बिकनला मंडी, लिजासेती।।

धुराहे आधार,भार  ओकपर
पाउटनी को भार ,सहसेती।।

आघात सहनो, डुलुपको काम
दाबखुटा ठाम, मंजारामा।।

कनांगरा चार,देसेती आधार
डुलुप जागापर, ठेवसेती।।

बदलेल काळ, बदलेव गाळो
वेल्डींगलं जोळो,सबभाग।।

कनागरा गया,गया  दाबखुटा
गया सब पुठ्ठा,पिंजनीभी।।

संसार को गाळो,असोच चलसे
सुख दुःख लेसे जगनोमा।।

चाकवानी पाय, जीवन चलसे
मानव जगसे , सुखमय ।।

जय राजा भोज, जय माँ गड़काली
वाय सी चौधरी
गोंदिया

बैलबंडी 

बैल जुपीस बंडीला
सजाईस गाळो सुंदर
धनी चलेव खेतमा
लगसे अस्सल कास्तकार

जुवाडीला कसीस बारती
अना टाकीस शिवर
तुतारी कासरा हातमा
जोतां बैल को मानपर

जिंदगीको रथवानी गाळोला
दुय भोवरी को आधार
डुलुप दाबकुटालक जोडके
आसकूड संभालसे भार

सय ऋतू वानी पुठ्ठा
बीचमा सय पाटीको भर
बारामास सम उभारी
हरणी बंडी को मंज्यार

पुरो बंडी को डोलारा
 सें दुय लंबो धुरापर
भोवरीला खिल्लीको अटकाव
बिच मंझारा कंनगरा चार

बहू कामकी या बंडी
जरूरती सें जीवनभर
खेती कास्तकार बीचको दुआ
ठेवबं अस्तित्व जपकर

                शारदा चौधरी 
                    भंडारा

बैलबंडी
संसार को गाळो (प्रकार- अभंग)

मायाको संसार| करनोसे पार|
गाळोच आधार| आदमिला||१||

सत्यकाच चाक| अपनावो सदा|
नित्य करो वादा| ओंगनका||२||

काम अना लोभ| ये बैल तुफानी|
करेत किसानी| मर्जीलका||३||

हातमा आपलो| संभालो कासरा|
सबला आसरा| देत जावो||४||

सदगुणी धुरा| वापरमा ठेवो|
जुवाडीला देवो| मीठा बोल||५||

गाडोला लगावो| कर्मकी हरनी| 
संग पावटनी| बंधूताकी||६||

सयंमकी खिल्ली| टाको आस्कुडमा|
जोर उभारीमा| समताको||७||

संसारको गाळो| परानला बसे|
नितीमत्ता कसे| चऱ्हाटमा||८||

महेंद्रकुमार ईश्वरलाल पटले(ऋतुराज)

बैलबंडी 

बैलबंडी ला जोतन 
जुवाडीको अट्टाहास 
संयमीत तालपरा 
बैल खांदाकीच् आस ||१||
              जीवशीव की भोवरी 
              सप्पा समालसे भार 
              कारो लगावू वंगण 
              नही झिजको असार ||२||
रहे कसोच् रसता 
तरी नहाय फिकीर 
ध्येय पूरो करनकी 
बस्स!!गाठसे लकीर ||३||
            कारो मायको पुंजामा 
            सेण लिजानको मान 
            लक्ष्मी आवसे घरमा 
            बंडी सौजन्यकी शान ||४||
यातायाती च् साधन 
सदाचारी येकी रीत 
येनं मनको कुपीमा 
"बंडी "सांगसे गुपीत ||५||

वंदना कटरे  "राम-कमल "

Friday, May 14, 2021

श्री चिरंजीव बिसेन




ऋण साहित्यिक गण को
श्री. चिरंजीव पुनाजी बिसेन

साधो रवनो उच्च विचार
असा चिरंजीव काकाजी
पूनाजी को पुण्यप्रताप
शांताबाई आती माताजी

लक्ष्मी आयी जीवन मा
जीवन भयेव सुखदाई
किरणकुमार अना स्वाती
बाग जीवन की महकाई

कविता लेखन को छंद
भाषा को नहाय बंधन
पोवारी बोली पर प्रेम
कविता लक करीन चंदन

सेवानिवृत्त केंद्र प्रमुख
प्रशासन गौरव पुरस्कार
जुना हिंदी गाना उनला
देसेत मनला शांती अपार

असीच तूमरी लेखणी
चलत रहो सालन साल
स्वस्थ रहो निरोगी रहो
गढकालिका करे प्रतपाल

सौ छाया सुरेंद्र पारधी
सिहोरा



ऋण साहित्यिक गण को 
    ( श्री चिरंजीव बिसेन)

पोवार उत्कर्ष साहित्य ग्रुप
साहित्यिक इनकी सें खाण
उन मालक चिरंजीवजी को 
व्यक्तिमत्व सें अति महान 

शांताबाई पुनाजी बिसेन पुत्र
प्रशासन गौरव पुरस्कार लं सन्मानित
बडू को मन सदा रमावं सेती
पुराना हिंदी फिल्मी गीत

लक्ष्मीकांत को सें जगमा
सबमा सुखी सुशील परीवार
किरण स्वाती दुय सुंदर फुल
उमल्या सेती संसार बेलपर

संस्कारक्षम शिक्षकी पेशा
नित्य काम उनको विद्यादान 
टूरीइनकी सौटक्का पटनोंदणी करके
जिल्हास्तरपर भेटेव सम्मान 

मराठी हिंदी पोवारी भाषामा
काव्यलेखन को तुमला छंद
समाजकार्य,कविता आयोजन 
साहित्य निर्मितीको अस्सल गंध

सदा रवं आमरो सर पर
असोच तुमरो वरदहस्त
टेमनी को कविवर म्हणून
चमके नाव एकदिन मस्त

                 शारदा चौधरी
                    भंडारा

तारीख :- १३/५/२०२१               
रोज:-बस्तरवार
ऋण साहित्यिक को…………. श्री चिरंजीव बीसेन 
              (चाल:-सावन का महिना)
                            
ऋण साहित्यिक का, केतरा आमरं परा।
साहित्यिक चिरंजीवजी बिसेन सेती खराखुरा।। धृ।।

तहसील, जिल्हा  गोंदिया टेमणी  गाव ।
अजी पुनाजी बिसेन,माय शांताबाई नाव।।
धरलक्ष्मी लक्ष्मीबाई, संसार को  पसारा।। १।।

किरणकुमार टुरा एक मोठो गुणवान।
हुशार,सुशील टुरी स्वाती  घरकी शान।।
नौंकरी लगी शिक्षक की डी. एड्‌ होयपरा।। २।।

नौंकरी परा रयशानी बी.ए. बी. एड्‌ करीन।
हिन्दी,मराठी,पोवारीको छंद मनमा धरीन।।
बहुत सारी कविता को लगाईन सेन थारा।। ३।।

निश्चल,व्यासंगी,छंदी  लिखाण की धाया। 
केंद्र प्रमुख मनून सतराला से. नि. भया।।
सूर्याटोला गोंदियामा,घरदार लेईन थारा।। ४।।

कविता,ना लेखलेखन,सुंदर करसेती  ।
उत्थान पोवारीको हातभार लगावसेती।।
माय कालीकाको हात सदा रव्ह डोईपरा।। ५।।

पोवारीच मायबोली पोवारीकोच ध्यास
सुखी समृध्द जीवन रव्ह याच से आस
पोवारीको आधार स्तंभ माथा चरणपरा।। ६।।
                  
डी पी राहांगडाले 
     गोंदिया

कवी:-श्री चिरंजीव बिसेन

कवी श्रेष्ठ चिरंजीव बिसेन
मुळ गाव टेमनी
मराठी हिंदी पोवारी की
साहित्य सृजन करसे लेखनी

धन्य वय माय बाप
शांताबाई पुनाजी
सार्थक भयी तपस्या
पुत्र भेट्या चिरंजीवजी

जीवनभर साथ ओको
वा भार्या लक्ष्मी
टुरा टुरी किरणकुमार,स्वाती
नहाय परिवार मा कमी

गुरु को चरित्र
हातमा शैक्षणिक कार्य
मा सरस्वती का पूजक
स्वाभिमानी शौर्य

साधी सिधी राहनी
चमके कपाली ज्ञान 
श्रवण लेखन छंद
मायबोली मा प्राण

प्रशासन गौरव पुरस्कार
अना जिल्हास्तरीय पुरस्कार
पूरो जीवन महर्षी सम
ज्ञान संवर्धन अना आविष्कार

जीवनभर शिक्षकी पेशा
जन सेवा को ध्यास
गुरु रहकन सदा विद्यार्थी
निरंतर चलतो अभ्यास

धन्य भयी मातृभूमी
वहान उपज्या चिरंजीव
त्याग,समर्पण,सेवा
खराखुरा तपस्वी शिव 

निरंतर साहित्य सेवा
महर्षी समाज शिक्षक
असोच सदा भेटे साथ
कला संस्कृती को बनो नायक

धन्य सेजन आमी
भेटी एक गुणी संगत
साहित्य को माध्यम लका
बस्या एक पंगत

सुखी रहे तुमरो जीवन
घडे साहित्य सेवा
न दिसे दुख की परछाई
मनलका मागनो से देवा

शेषराव येळेकर
सिंदीपार
दि.१३/०५/२१


ऋण साहित्यिक गण को
(चिरंजीव पुनाजी बिसेन)

अडीअडचन। मदत कर्तव्य।
नोहोतो व्यत्यय।कभीच गा

भाऊ धुरंधर।छंद से लेखन।
गीतको श्रवन।करसेती।।

बाप गा पुनाजी।माय शांताबाई।
पत्नी लक्ष्मी बाई।शोभसेगा।।

टुरा से किरण।टुरी स्वाती बाई।
बडी नवलाई।कुटुंबमा।।

प्रशासन देसे।गौरव पुरस्कार।
भाऊ को सत्कार।जीवनमा।।

कविता लेखन।हातखंडा बडो।
शिक्षा मुल्य जोडो।आयुष्यमा।।

शिक्षकी से पेशा।अति स्रूजनता।
होती गा समता।विद्यार्थिमा।।

सौ.वर्षा रहांगडाले बिरसी
बिरसी (आमगांव)
गोंदिया


मा.चिरंजीव बिसेन सर

मुरत तुमरी देकस्यानी
जगसे भाव सेवाको
पोवार समाजका भुषण तुमी
बजाओ डंका प्रेमको।।

शिक्षण क्षेत्रमा् नाव कमायात
सालेकसामा भेट्या तुमी
सुगंध साहित्यकि आवत होती
आब् धुरकरी बन्या तुमी।।

तुमर् साहित्यमा से समाज 
से निसर्ग अना् मूल्य
संस्कृती प्रेमबि झलकसे
तळमळ तुमरी अतुल्य।।

निवृत्त नयि भयात तुमी
समाजशिक्षक रवनो से
हर व्यक्ती कि अलग से खुसबू
पोवारी बगिचा सजावनको से।।

मंगल करसेजन कामना आमी
करो नवसाहित्य सृजन
मनला करबि शांत एकाग्र
ईश्वरको नित करबि भजन।।

पालिकचंद बिसने

ऋण साहित्य गण को
चिरंजीव पुनाजी बिसेन


पुनाजीको टुरा लाडको
शांतामाईको राज दुलारा
लक्ष्मीबाई संग बिया भयोव
चिरंजीव भाऊ बनेव सहारा

शिक्षा प्रेमला मनमा बसायात
हातमा धऱ्यात किताबी झोरा
बालगोपालइनला सांगत बस्या
पढाई लिखाई जीवन सहारा

ज्ञानदानको काम करनला 
अध्यापनको लेयात सहारा
विद्यार्थी प्रिय गुरुजी मनुन
पुरस्कारको मिलेव बोजारा

ज्ञानदानक् पुण्य काममा
साहित्य संग जोडयात नाता
युवा पिढी ला प्रेरीत करनला
तुमी लिखसेव कथा कविता

मार्मिकता की प्रतिक रवसे
पोवारी की तुमरी कविता
पोवारी को प्रचार प्रसारमा
मायबोली संग जोड्यात नाता

उच्चपद पर रयकनबी
नही कऱ्यात गलबला
मायबोली क् सेवासाती
नमन तुमर् प्रतीभाला

डॉ शेखराम परसराम येळेकर नागपूर
१३/५/२०२१

कवी श्री चिरंजीव बिसेन गुरुजी
    (अष्टाक्षरी काव्य)

गाव  टेमनीमा होतो
बिसेनको    परिवार |
संग पुनाजीको  रव्ह
पत्नी  शांताबाई नार ||१||

सन  एकोणसाठ मा
घर आयो  एक जीव |
बढ़ो    प्रेमल्   ठेईन
नाव  वको  चिरंजीव ||२||

वर्ग   सहावी   पर्यंत
भयो  गावच शिक्षण |
मंग   बारावी   पर्यंत
गयो  गोंदिया सिकन ||३||

सन  एकोणऐंशी  मा
भयो  डिएड  शिक्षण |
कार्य करीन निस्वार्थ
गावमाच    अध्यापन ||४||

वको जीवनमा आयी
गुणवान  लक्ष्मी  नार |
भया  दुय   टुरा  टुरी
स्वाती, किरण कुमार ||५||

भयी शिक्षक नियुक्ती
ध्यास  गुरुको  धरीन |
सेवा    करता  करता
बीए   बीएड   करीन ||६||

केंद्र   प्रमुख    बढ़ती
भयी च्यारको सालमा |
तीन  पुरस्कार  भेट्या
येन   पदको  कालमा ||७||

सेवा  निवृत्तीको बाद
सुरु   करीन  कविता |
लिख  पोवारी मराठी
हिंदी  ज्ञानकी सरिता ||८||

येन भाऊकी कविता
सब   कसे   गोवर्धन |
करे पोवारी बोलीको
समाजमा     संवर्धन ||९||

   इंजि. गोवर्धन बिसेन, गोंदिया
          मो. ९४२२८३२९४१
            दि. १३ मई २०२१
               
       
       ऋण साहित्य गण को
चिरंजीवजी बिसेन
लेखक - गुलाब बिसेन

पोवारी साहित्य जगत साहित्यपटलपर आवनक् येन् संक्रमन कालमा जसा नवोदित साहित्यिक आपलो लेखनला निखार रह्या सेत, तसोच ज्येष्ठ साहित्यिकबी आपल् अनुभवको साहित्य क्षेत्रमा कस लगायस्यान पोवारी साहित्य निर्मीती कर रह्या सेत. असाच एक खासकरस्यान पोवारी साहित्य जगतका ऋषीतुल्य साहित्यिक मंजे कवी चिरंजीवजी बिसेन ये आत.

चिरंजीवजी बिसेन येव शिक्षण क्षेत्रमा नवाजेव नाव. अध्यापक पासून सुरू भयेव येव प्रवास केंद्र प्रमुखपर आयस्यान रूकेव. शिक्षण क्षेत्र नवनवा प्रयोग करस्यान गोंदिया जिल्हाक् शिक्षण क्षेत्रमा आपलो अलग पहचान बनावनेवाला चिरंजीव बिसेनजी अनेक पुरस्कारयीनका मानकरी ठर्‍या. माणूस आपल् उमरलक निवृत्त होसे पर वोन् मनलक निवृत्त नही होये पायजे. येवच सूत्र पालन कर बिसेनजी अज साहित्य क्षेत्रमा कार्यरत सेत.

एक क्षेत्र सूटेपर दुसरो क्षेत्रमा आपली अलग पहचान उनन् बनाईसेन. पोवारीक् संगसंग मराठी अना हिंदी साहित्य क्षेत्रमा बिसेनजीकी उठबस से. मराठी, हिंदी साहित्य सृजन करस्यान उनन् क्रमांक प्राप्त करीसेन अना कर रह्या सेती. अलग अलग भाषामा साहित्य सर्जन करनो तसो तारपर कसरत करनोलाईकच से. पर मन मा उमंग रहेव अना मूलत: सर्जनसिल व्यक्तिमत्वको धनी आदमी आपली छाप सोळच देसे. असा चिरंजीवजी बिसेन साहित्य क्षेत्रमा कार्यरत सेती.

चिरंजीवजी जसा पोवारी, मराठी अना हिंदी कविता लिखसेत तसोच उनको अनुवादबी दर्जेदार रव्हसे. अनुवाद कलाको परीचय वय समय समयपरा देता रवसेत. अॅड. लखनसिंह कटरेजीकं मराठी कविताको "असोत् बिलकुल नहाय" येव पोवारी अनुवाद जबरदस्तच कहे पायजे. असा ये साहित्यिक पोवारी साहित्य क्षेत्रमा कार्यरत सेती या आमरंसाती गर्वकी बात से.

- गुलाब बिसेन (दि.१३/०५/२०२१)

ऋण साहित्यिकको श्री चिरंजीव बिसेन
दिनांक: १३.०५.२०२१
शीर्षक: चिरंजीव (अभंग काव्य प्रकार)

पोवारी बोलीका, विचारक नित्य
बनंसे साहित्य, चिरंजीव ||१||

शांताबाई माय, पूनाजी गा तात
लक्ष्मीबाई कांत, चिरंजीव ||२||

देहातको जन्म, गुरू पुरस्कृत
सुस्वभावी श्रुत, चिरंजीव ||३||

मराठी पोवारी, हिंदीमा लेखन
विनम्र सज्जन, चिरंजीव ||४||

आभासी समुह, व्यवस्थापनमा
मार्गदर्शनमा, चिरंजीव ||५||

छुपी से प्रतिभा, बिचार अनंत
असा गुणवंत, चिरंजीव ||६||

वाग्देवी कालिका, शंकर आराध्य
तुमरो सानिध्य, चिरंजीव ||७||

संगत तुमरी, तुमरो आशिस
आमरी कोशिस, चिरंजीव ||८||

आमरी सदिच्छा, ओरांडो शतक
नावकी चमक, चिरंजीव ||९||

डॉ. प्रल्हाद हरिणखेडे "प्रहरी"
डोंगरगांव/ उलवे, नवी मुंबई
मो. ९८६९९९३९०७

ऋण साहित्यिक गण को
श्री.चिरंजीव  बिसेन 

लला ट पर साहित्य को प्रभाव
सधो भोलो काकाजी को स्वभाव
टेमनी आय काकाजी को गाव

शांताबाई अन् पूनाजी का लाल
चिरंजीव काकाजी साहित्य काल
उनकोकाव्य लेखन बडो कमाल

जोडीदार लक्ष्मी आय बाई
किरणकुमार,स्वाती की आई
से वाका ल मा करीन भलाई

नोकरी बरोबर ग्यान बढाई न
प्रशासन गौरव पुरस्कार पाई न
अडचण मा फस्याईन ला बचाईन

सतरामा से. नि.केंद्रप्रमुख भयात
कविता लेखन को छंद जपायात
त्रिभाशा मा कविता बनायात

जीवन तुमरो सुखी होवो
स्वस्थ निरोगी तुम्ही रवो
असोच पोवरी को मान बढा वाे

उषाताई रहांगडाले (बीसेन)

 श्री. चिरंजीव बिसेन सर
शीर्षक:- आमरा गुरु
(चाल....बहोत प्यार करते है तुमको सनम)

आव आमरा गुरु, तुम्ही बिसेन सर
बहुत बढिया से, तुमरो साहित्य सफर||धृ||

गोंदियाका भुमीपुत्र, जन्मभूमी टेमनी गाव
शिक्षकी पेशामा, कऱ्यात उज्ज्वल नाव
अच्छो अध्यापनलक जगायात, कईका जिगर
बहुत बढिया से, तुमरो साहित्य सफर||१||

पुनाजीना शांताबाईका, तुम्ही लाडका लाल 
सेवा निवृत्तीपर, धऱ्यात साहित्यको ताल 
कर्तुत्वत्वान सेत टुराटुरी, नोको करो फिकर
बहुत बढिया से, तुमरो साहित्य सफर||२||

हिंदी, मराठी, पोवारीमा, तुमरो वरदहस्त 
साहित्य जगतमा लगावो, अशिच नित्य गस्त
मायबोलीकी सेवा, एकदिन देखाये असर
बहुत बढिया से, तुमरो साहित्य सफर||३||

महेंद्रकुमार ईश्वरलाल पटले(ऋतुराज)
ता. १३/०५/२०२१

ऋण साहित्यिक गण को -
सब साहित्यिक ला समर्पित
साहित्यिक नही रव्हता त,साहीत्य न रव्हतो ,
बोली भाषा न रव्हती,रस ना रव्हतो,
साहीत्य न रव्हतो, त संस्कृती न रव्हती,
संस्कृती न रव्हती ,आदर्श व्यवहार न रव्हतो,
आदर्श व्यवहार न रव्हता ,त मानुसकी ना रव्हती,
पूर्ण धरोहर से साहित्यिक लक,
शब्द नही भेटत वर्णन करनला,
पूर्ण समजलेव मोरो नमनलक।
कौशिक चौधरी
ऋण साहित्यिक गणको
  
ऋण उतारता उतारता। 
मोला क-यात ऋणी। 
कलम का धनी। 
तुम्ही सब।। १।।

असोच रव्हन देव। 
प्रेम को संबंध। 
साहित्य को बंध। 
सदा साती।। २।।

तुम्ही मोरा प्रेरक। 
बंधु अना भगिनी। 
मी तुमरो ऋणी। 
सदा साती।। ३।।

हात जोडकर विनंती। 
साहित्य संग प्रिती। 
पोवारी की उन्नती। 
करत् रहो।। ४।।

सब कवी गण को। 
विशेष आभार। 
शब्द रूपी प्यार। 
देयात बहुत।। ५।।

                     - चिरंजीव बिसेन
                                 गोंदिया 
                      दि. १३.५.२०२१

Saturday, May 8, 2021

साहित्यिक सौ वर्षा पटले/रहांगडाले


साहित्यिक 
सौ.वर्षा विजय रहांगडाले
पतीःविजय मनिराम रहांगडाले
दुय टुराःमिहान,पार्थ
मु.पोस्ट बिरसी,ता.आमगांव, जिल्हाःगोंदिया

बाबुजी को नावःश्री.योगराज गोदिराम पटले (कास्तकार,जोडधंदाःइटाभट्टी)
आईको नावःदुर्गा पटले(ग्रूहीणी)
भाई -सतिष योगराज पटले(अभियंता)

जन्मगांवःसालेकसा
जन्म तिथीः१६/०७/१९८९
शिक्षणःडी.एड. बी.ए.एम.ए.अपीयर
व्यवसायःशिक्षिका/ग्रूहीणी

मोरा छंदःवाचन (कादंबरी बाचन को छंद) ,काव्यलेखन,नवीन पदार्थ बनावनो.
विशेष छंदःपोवारी,मराठी, हिंदी काव्य लेखन,लेकरून संगमा लेकरु होयके खेलनो,उनला आपलो बचपन की बात अना उपादी किस्सा रंगायके सांगनो,पोवारी की हास्यकविता,चारोळी जुगलबंदी.
किताबःचारोळी संग्रह(काव्यवर्षा)
अनेक व्हाट्स अप समुह मा काव्यलेखन,चारोळी लेखन,स्पर्धा का आनलाईन सहभाग प्रमाणपत्र,पोवारी को उत्कर्ष अना उत्थान साठी तत्पर.

खुदको जीवनपटः मी पहिली टुरी.मंग भाई भयेव.पर मी आईला बहुत तरास देत होती मुन मोला दुय साल को उमर माच मामा गाव म्हणजे बडद.पी.डी.रहांगडाले इनको गाव लिजाईन.बडद यव पोवारबहुल अना बडो शिक्षीत गाव. गाव मा मोरो बचपन अना दसवी वरी शिक्षण भयेव.बचपन मा मी बडी उटपटांग काम करनो मा माहिर.चौथी वरीत मास्तर अना लेकरुबी पोवार काच म्हणून इश्कुल मा बी पोवारी कोच बखान.
   कविता लिखन को छंद मोरा वर्गशिक्षक शहारे सर इनको कारण मोला इयत्ता आठवी पासुनच कविता लेखनसाठी प्रेरणा मिली.मंग डायरी मा आपली कविता उतरावत  होती.डी.एड करतांनी टीचर अना विद्यार्थी पराच कविता लिखनको.२०१० मा बिया भयेव. मंग जरा घर संसार मा उलझ गयी.भरेव घर काम जादा वोकोमाच.मंग खुद का छंद,आवड निवड येको कर जरा दुर्लक्ष भयेव.पर चार साल पासून आनलाईन जमानो को कारण व्हाट्स अप समुह मा मी रनदिप भाऊ बिसने इनको कारण जुडी अना मोरो कविता लेखन ला उडान भेटी.
पोवारी बोली भाषा को आपलो कविता को माध्यमलका कार्य करनको मौका मिलेव.
अखीन पुढ बी असीच साहित्य सेवा घडत रहे याच माय गढकालिका को चरण मा प्रार्थना से .

सौ.वर्षा पटले रहांगडाले
बिरसी

स्वागत स्वागत
झाडी बोली की बहीणाबाई
आमगाव बिरसी मुक्काम
सबकी चहती साहित्यिका वर्षाबाई

शिघ्र कवियत्री 
तडफदार लेखनी
घर संसार, स्त्री जीवन की
मांडसे दुखनी

लेखन,बाचन
स्वभाव से हसरो
मराठी, हिंदी संगमा
टाकसे पोवारी बिसरो

चलो सब जन
उठावो लेखनी
ऋण साहित्यिक गण को
बनावो देखनी

शेषराव येळेकर

 ऋण साहित्य गणको   ------   सौ. वर्षा राहांगडाले
                (चाल-- देहाची तिजोरी)
                        
कहां कहां देखु मी- देव नही भेट।
ऋण साहित्यिक को फेटे, लका नही फीट।। धृ।।

वर्षा बाई सारखी टूरी, सबला देजो देवा।
सुरेख,गुयवान,  ज़सी, सब करैती हेवा।।
झटपट चल लेखणी,ज़सी मोबाईल की कीट।।१।।

बाप योगराजजी पटले,माय दुर्गा बाई  ।
गाव सालेकसा जन्म भएव ,सतीस भाई ।।
बीह्या भएव,बीरसी आयी,चढ सांसारिक घाट।।२।।

पती विजय राहांगडालै,जीवनको आधार।
वर्षाबाई शिक्षीका ना घर कामला हातभार।।
मिहान ना पार्थ दुय टुरा,गुणवान  सेती पोट।। ३।।

सुसंस्कृत, सुखी परिवार,मायबोली की आस।
कथा,कादंबरी, साहित्य ,बाचन को से  द्यास ।।
लेख,काव्य,चारोळी लिखन,लेखणी चले झटपट।। ४।।

पोवारी को उत्थान करनकी तळमळ लगी।
गडकालीका माय की भक्ती मनमा जागी ।।
आधारस्तंभ से पोवारीको, ना पोवारीच थाट।। ५।।
                    
डी पी राहांगडाले 
      गोंदिया

राम लखन सारखो टुराइनकि आई
नाव से इनको वर्षा बाई 

जसी से साजरी इनकि लेखनी
तसी दिसनला सेती हे देखनी

सब जन कि चहेति कसेत इनला वर्षा
साहित्यिक मनुन से इनकी चर्चा 

संसार को गाडो चलावत लेखन करसेती
पोवार समाज को मान बढ़ावसेती..

स्वप्नाली दुर्गेश ठाकरे

       साहित्यक का ऋणी
वर्षा बाई पटले/ रहांगडाले

आयी - आयी आता वर्षा बाई 
की बारी,शब्द ला शब्द जोड 
कर कविता कर से त भारी 
अशी आम्ह्र री आज की 
साहित्य की सुशील,सुंदर 
वर्षा बाई|
          आयी - आयी बचपन की चूल - बूली वर्षा बाई||

 ऊच शिक्षण, साधो भोळ रहन
शिक्षण को प्रती उच विचार
पहणकर मराठी परिधान,ठेव
 शेती आप्लो संस्कुर्ती को मान
झलक दिस से ईनको लेखणी
मा बहिना बाई  को आज|
    आयी - आयी बचपन की चूल -   बुलि वर्षा बाई||

 घर संसार चला व शेती आपली
सब जबाबदारी पूर्ण कर
साह्यार,लॉक डाऊन मा  बना व
शेती नव नवीन पकवान. 
 ,लेखन,वाचन को छंद लक
बनी शेत पोवार समाज की
 बहीना बाई आज|
 आयी - आयी बचपन की चूल बुली वर्षा बाई||

  अशो च कविता की बारिश
 होन देव बाई,करोआपलो कविता
 काव्य लेखन लक पोवारी को 
 गुणगान, अशी सहित्की वर्षा
 बाई ला शत- शत प्रणाम|
  आयी - आयी बचपन की चूल - बुली वर्षा बाई||

 Chandrakumar sharnagat 
Hero Moto corp Gurgaon
     ( हिरो होंडा)


सौ वर्षा पटले रहांगडाले

रिमझिम आई वर्षा साहित्य की
कविता, कथा, कहानी फूटी।
गढ़कालिका को हाथ सिरपर
सरिता काव्य की धावत सुटी।।

योगराज पिता दुर्गा प्रेमळ माय
सालेकसा जन्मभूमी कहलाय।
वर्षा अना विजयकी जोड़ी अनुरूप
आमगाव बिरसी कर्मभूमी आय।।

शिक्षण, साहित्य, घरदार की धुरा
चारोळी जुगलबंदी आवळतो छंद।
मराठी की कविता लिखसे बेधुंद
मन रमसे पोवारी लेखणमा स्वच्छंद।।

कविता फुट्सेट जसा लाई चना
हास्य कविता की बातच बिचारोना।
जीवन को अनुभव हासत सांगसे
सजावसे साहित्य को कोना कोना।।

असिच घड़ो पोवार साहित्य की सेवा
आवने वालो पिढ़िला मिले येव मेवा।
माता गढ़कालिका को सदा रहे हाथ
शतआयुषी हाेजो वरदान दे महादेवा।।
सौ छाया सुरेंद्र पारधी
सिहोरा

आमरी वर्षा बाई बडी गुणी,छंद वाचन को.२सालको उमर मा मामा घर बळद मा रही.वहाच बचपन अना् १० वी शिक्षण भयेव  .वषाॅबाई बडी बचपन मा उटपटांग काम करत, तसीच बहुत हूशार १० वी पयॅत वगॅ मा पहीलो नंबर को बाई ठेकाच होतो. 
गाव की भाषी आयत सब माफ करत,कोणी चिल्लात नव्हता. शारदा नाव की जीवलग सहेली तसीच रिस्तामा मावशी लग,संगमाच रवत नाटक मा भी टूरा-टूरी को रोल करत .एक बार त लंबा केश  काट देईश  पन   एक फायद की टूरनामेंट  जिल्हा मा पहीलो नंबर आयव.फक्त वषाॅबाई भिवत मोठ्ोवाडा को बडी़मीयला. अना् शारदाबाई संग बगीजामा का आंबा-जांब तोडके आनत.फक्त इतवार को दिन  जास्त खेलत  तसोच बोर बेचन जात. आपलो लहान मामू ला म्हणजे देव भाऊला   भिवत तसीच बम्हामामूला भिवत . असो करता -करता बचपन बित गयव .मग  नागपूर मा मामूनच डी.टी.एड शिक्षण भयव . मग विजय भाऊ संग बिह्या भयव आपलो घर संसारमा लगी.

 ऋण साहित्य गण को 

शोधुसु मी शब्द सहित्यिका को सन्मान मा,
ऋणी से समाज उनको विश्वास से मायबोलि मा।

ज्येष्ठ पुत्री श्री योगराज पटले कि,दुर्गा माता ,
सतीश पटले आय् भ्राता काम् से अभियंता।

पोवारी,हिंदी,मराठी काव्य लेखन को मिलन ,
साहित्य संस्कृति ना शिक्षण को अनुपम संगम।

माहेर सालेकसा, बिर्सि सासुरवाडी,
शिक्षण भयेव वडद लका कशी या घटना घड़ी।

विजय भाऊ कि नैनुलाई,पार्थ-मीहान कि माई,
अशी उपाधि प्राप्त से राहांगडाले गुणी बहुबाई।

सुशील, गुणी, उत्तम् शिक्षिका को मान,
उच्च शिक्षण से तरी सभ्यता को भान,

गृहिणी भी साजरी,लेकरू को संग 
खेलसे माय माऊली गोजरी।

नवनवीन पाहुनचार रांदनको सवाद,
बचपण का उपादि धंदा आवसेत् याद।

शाहरे मास्तर कि प्रेरणा कविता को छंद,
संसार रूपी जीवन जगता गुण विशेष भयेव् मंद।

गढकालिका माय को आशिर्वाद् पोवार् समाजसिन भेटी, दुबारा छंद जोपसनकी संधी लाभी, 

पोवारी उत्कर्ष साठी सेती तत्पर बड़ी,
साहित्य सुंदर लेखनी मेहनत बहुत कडी।

स्वप्नाली दुर्गेश ठाकरे

वर्षा बाई पटले- रहांगडाले

जसो धरतरी मायको साज चढावसे
मीरुगअरदळा नक्षत्र की वर्षा
तसो साहित्यलका पोवारी सजावसे
कवयित्री आमरी बडीबाई वर्षा

चलावसे लेखणी बेधुंद होयकन
लिखसे कथा कविता चारोली
बहुगुणी कवी कल्पना की धनीसे
आमरी वर्षा बाई बिरसीवाली

नवो बिचार नवी कल्पना को साज
सदा रवसे वक् पोवारी साहित्यमा
पोवारी उत्कर्ष को सपन देखत रवसे
सदा पोवारी  साहित्यकारोंक दिलमा

घरसंसार संभालकन लिखत रवसे
जसी लगसे तार परकी कसरत
सहनशीलता वक् मनमा बसी से
सदा लिखत रवसे करत रवसे मेहनत

आमरी वर्षा बाई से 
कला गुणकी खाण
पोवारीमा लिखो कसे
करो कसे पोवारी धनवान

डॉ शेखराम परसराम येळेकर नागपूर
 ६/५/२०२१


  वर्षाबाई

सालेकसा मायभूमी जेकी
बिरसी आमगाव ससुराल
बडद मां गयेव् बचपन
नागपूरमा डिएड दुई साल...

योगराज दुर्गाबाई पोटी
जलम लेईस गुणी लेक
हुस्यार से बाई आमरी
रिस्ता निभावन मा नेक...

उटपटांग चुलबुली
वरक् वोकी न्यारी
डिएड मां बी चमकी
बाई की हुस्यारी...

शब्द परा प्रभूत्व भारी से
मराठी हिंदी ना पोवारी
ईव चारोली बनयदेसे
कल्पना की बी सवारी....

रोम रोम मां बह रही से 
पोवारी को वु रूधिर
कब् करूसु कविता 
येकोसाटी बाई से अधिर...

लव कुश सरिखा सेती
बाई का दुई सुकुमार
राम सीता सी जोडी से
गृहकर्म मां बी सुमार....

भाऊ भरातार सेती तंत्रज्ञ
बाईला रूचि से शिक्षण 
टुरूपोटु संग रम जासे 
शाळा मां देसे प्रशिक्षण ....

गुणी कला प्रेमी सुगरण
वर्षाबाई सेती अष्टपैलु
नवानवा व्यंजन करसे
लसन प्याज देवो का आलू....

माय सरस्वती को वर से
गडकालिका माय को हात
शुरवीर बी से वर्षाबाई
धीटाईलक् करसे जी बात....

पोवारी प्रतिभा की स्यान से
वर्षाबाई से बुहु गुणवान
नवानवा आयाम जोडन्
बाई सेती जी प्रतिभावान...

घर संसार संभालकन
गुण संस्कार को दर्शन
तालमेल राखसे बाई
बढाई को नही प्रदर्शन.....

माय गडकालिका खूस रखे
वर्षाबाई रहो स्वास्थवान
मन की मुराद पुरी होये
प्रार्थना करसेज् भगवान...


रणदीप बिसने

ऋण साहित्यिक को सौ. वर्षा पटले/ रहांगडाले
दि. ०६.०५.२०२१
 चारोळीकार

मायबापकी सोनपरी तू
जीवन साथीकी छाया
टुरूपोटूको व्यासंग संगमा
पढन लिखनकी माया ||१||

नदी समान से जीवन तोरो
खळखळ बहती धारा
नाना अडचण दर्द छिपावत
ढुंढे सुखको किनारा ||२||

मराठी हिंदी पोवारीमा
साहित्य संवर्धन
तोरो छंद खमंग बनावनो
गाव चुल्हो को व्यंजन ||३||

चारोळीमा मातब्बर तू
पसंद की जुगलबंदी
गद्य पद्यमा हास्य व्यंगकी
रचना तोरी स्वच्छंदी ||४||

बचपन बितेव मामा गावमा
उटपटांग 'ना उपादी
पोवारीमा तोला शोभं
"चारोळीकार" की उपाधी ||५||

बोलीकी सेवामा तोरो 
कलाकी होये ' वर्षा '
अनुकरण करके आमी बी
होबिन तोरो सरसा ||६||

डॉ. प्रल्हाद हरिणखेडे "प्रहरी"
डोंगरगांव /उलवे, नवी मुंबई
मो. ९८६९९९३९०७


कवयित्री सौ. वर्षाबाई पटले राहांगडाले

काव्य प्रकार : गीत
वर्ण संख्या : १२

वर्षाबाईजीकी आयको कहानी |
सांगुसु तुमला मी मोरो जुबानी ||धृ||

सालेकसा  मा  संपन्न  परिवार |
योगराज  पटले  की  दुर्गा नार ||
इनको  पोट जनमी  वर्षा रानी |
सांगुसु तुमला मी मोरो जुबानी ||१|| वर्षाबाई...

भाई को जनम नही आयो रास |  
आई ला  देन  लगी वर्षा तरास ||
रोव  वर्षा  वळद  जानको घनी |
सांगुसु तुमला मी मोरो जुबानी ||२|| वर्षाबाई…

वळद  मामा को  गाव बचपण |
वहां  भयो  दसवी वरी शिक्षण ||
लिखनो पड़नो मा होती शहानी |
सांगुसु  तुमला मी मोरो जुबानी ||३|| वर्षाबाई…

आठवी पासुन कविता को छंद |
बिह्याको बादमा  भय गयो बंद ||
शहारे  सर  लका   प्रेरणा  बनी |
सांगुसु  तुमला मी मोरो जुबानी ||४|| वर्षाबाई…

लव  कुश  सम   दुय  सुकुमार |
शिक्षिका संग गृहिणी बी सुमार ||
अभियंता  विजय  पती से गुनी |
सांगुसु  तुमला मी मोरो जुबानी ||५|| वर्षाबाई…

पुन्हा लिखन बसी बाई कविता |
कसोतंत्र मा जुळसे वा न भिता ||
रणदीप  भाऊ  की   मेहरबानी |
सांगुसु  तुमला मी मोरो जुबानी ||५|| वर्षाबाई…

पोवारी, मराठी, हिंदीकी कविता |
लिखसे या बाई ज्ञान की सरिता ||
लेखनी ओकी  बहिणाबाई वानी |
सांगुसु  तुमला  मी मोरो जुबानी ||६|| वर्षाबाई…

बाई की  कविता  कसे  गोवर्धन |
पोवारी  बोली को  करे  संवर्धन ||
खतम  करुसु  बाई की  कहानी |
सांगुसु  तुमला  मी मोरो जुबानी ||७|| वर्षाबाई…

    इंजि. गोवर्धन बिसेन, गोंदिया
           मो. ९४२२८३२९४१
            दि. ६ मई २०२१

पोवार इतिहास साहित्य अना उत्कर्ष को आभार

 झाडीबोली की बहिणाबाई कयके
मान बढाईन शेषुभाऊन समुहमा
शिघ्र कवयित्री उपमा देयके
मान देईन मोला साहित्यमा

राम लखन की माय  
रूप की मोरो प्रशंशा
स्वप्नाली दीदीको आभार
बाई मी रहांगडाले वर्षा

रहांगडाले काकाजी को आशिष
सदा रव्हसे मोरो कपाल पर
गुणगान गायके उद्धार करीन अज
आधारस्तंभ मोला कय कर

छाया दिदी मोरी मोठी बहिण
करसे मोरोपर बहुत माया
रिमझिम वर्षा साहित्य की आयकके
मन धन्य भयेव अना पावन भयी काया

चुल बुली मी बचपन की
याद देवाईन चंद्रकुमार मामाजीनं
मराठी पेहेराव मा संस्कृती
साहित्यक्षेत्र मा सजाईन

ज्योती मावशी मोरी हासरी
बचपन बितेव उनको गावमा
बचपन की याद ताजा करीन
लहान भयी अज यहा समुहमा

रनदिप भाऊ मोरा गुरवर्य
कसेत शब्द परा से प्रभुत्व भारी
हमेशा मोला पाठींबा देयीन
मी सेव उनकी बहुत आभारी

बेधुंद लेखनी को साज
अज भेटेव मोला समुहमा
शेषुभाऊ तुमरो आभार
मानु कसी मी शब्दमा

चारोळीकार,सोनपरी मायबापकी
कसे मोरो मोठो भाई प्रल्हाद भाऊ
वारसा असोच चले पोवारीको
भाऊ तु मोला आसमंत नोको चढाउ

गाण कोकीला नं अज मोरो
ह्रदय गदगद कर देईस
मोरो जीवनपरकी काकाजी की कविता
आयकके डोरा पाणी भर देईस

गोळ कढी की लालची कसे
लहान भाऊ मोरो फनेंद्र
रूप देखके शरमाय जाये 
स्वर्गमाको देव इंद्र

संवर्धन करन पोवारीको उतरेव
भाऊ मोरो बिसेन गोवर्धन
आपलो जुबानी मोरी कहाणी सांगीन
करूसु उनला मी त्रिवार वंदन

सौ.वर्षा पटले रहांगडाले
गोंदिया


सौ.वर्षाताई रहांगडाले

पोवारीको वर्षाव 
शब्दशब्दमा होसे
वर्षाताई सुंदर                         
पोवारी बोलसे।।

नटखटपण बालपणमा्
बुद्धिमत्ताच रवसे
ज्ञानसाठी धडाडीच
कामी आवसे।।

घरकामसंग अध्यापन
मोठो सुंदर काम से
पोवारीबोलीकी सेवाबि
समाधानकारक से।।

वाचो कादंबरी, मोठा ग्रंथ
भरो मन अनुभवलका
साहित्य नवो सृजन करो
नइ दृष्टिलका ।।

विजयजीको साथ से
से आसिस बाबुजीको
प्रतिभा बहरे जीवनमा्
नाव चमके मायको।।

शुभेच्छा सेती आमरा 
हार नोको मानो
संस्कृती से महान आमरी
गुणगान राजा भोजको।।

   पालिकचंद बिसने
       सिंदीपार (लाखनी)

वर्षा ताई राहांगडाले


 सांगु मी तुमला वर्षा बाई की काहानी 
जे सेती शिकक्षीका, लेखिका, ग्रुहीणी। 

योगराजजी ना दुर्गा बाई की टुरी 
कविता लिखसेती खुप भारी।

अशी वर्षा बाई होती हुशार 
डी एड. बी ए.एम ऐ. करीन पार 
 
बिया होयके उलझी घर संसार मा वय 
 दुर्लक्ष भयव तरी नही सोडीन कवीता की लय। 

लहानपण पासुन होतो  कविता को छंद 
पोवार समाज मा फैलाइन सुंदर साहित्य को गंध 


करसेती पोवार साहित्य को उत्थान 
मार्गदर्शन इनको बनाये आमला महान। 

कु.रानु राहांगडाले


आज की कवियित्री - वर्षा रहांगडाले

सालेकसा की राजकुमारी 
वळद मा भयी शाहणी, 
बिह्या भयेव क् बादमा 
आमगाव बिर्सी मा बनी रानी. 

अजी योगराजजी रहांगडाले कास्तकार, 
जोडीला मुहून ईटभट्टा को धंदा, 
वर्षाबा़ईला शिकायकर करीन शाहणी 
जोडीदार भेटेव विजय रहांगडाले सरीखो बंदा. 

काव्य की वर्षा होसे उनक् लेखनील् 
पोवारी, हिन्दी, मराठी कविता, गीत, चारोळी, 
जंगल एरिया मा बचपन मा उनन् खाईसेन 
चार, बोर, ढिक, येरोनी ना बेहळा की आठोळी. 

मिहान ना पार्थ दुय टुरा सेती 
राम लक्ष्मण वानी सुंदर, 
काव्य मा उनक् समाय जासे 
'घागर मा सागर' वानी समुंदर. 

             
                      - चिरंजीव बिसेन
                                  गोंदिया


आज की कवियित्री - वर्षा रहांगडाले

मोरी बहिन लाडकी
गुणवान वर्षाबाई 
लाडलक सबजन 
कव्हसेत येला ताई 

मायबाप मेहनती
स्वप्न करीन साकार
शिक्षा पेरके घरमा
वोला देयीन आकार

मामा घरका संस्कार
वर्षाताई पर भया 
देखो कलमकी धार
सब करसेत मया 

रोज साहित्य सृजन
अना रोजकोच काम 
सदा मुखमा बसीसे
राजाभोज, प्रभू राम 

मिले तोला बहू किर्ती
आशिर्वाद यव देसू 
अशी बहिन देनला
देवा धन्यवाद कसू

महेंद्रकुमार ईश्वरलाल पटले(ऋतुराज)
ता. ०६/०५/२०२१
वर्षा

वर्षा, वर्षा बरसावसे 
जसो गंगा को पाणी 
साहित्य सिवारमा गुंज 
तोरो लेखनीकी वाणी ||
हास्य कविता खिलावसे 
बगिचाकी हर कली 
जुगलबंदीमा हमेसा 
कल्पक रवसे चारोली ||
बहु किर्ती की तू धनी
माय ,मामा घरकी परी 
दुय बेटा की अक्षय प्रित 
गरोकी सोनोकी सरी ||

वंदना कटरे

अज की साहित्यिका :- सौ.वर्षा पटले राहांगडाले

झाडीबोली की बहीणाबाई
पोवारी की शान
वर्षा बाई ला मिली से
मा वाग्देवी को वरदान

मामा घरं पली फूली
उपाधी इनका काम
हर चीज को लगावत होती
उल्टा पुल्टा दाम

आठवी पासून छंद
लिखत होती कविता
पोवारी, मराठी, हिंदी
बहत गई सरिता

स्त्री जीवन को अभ्यास
व्यथा की से जान
गरीब,अमीर, किसान
सबकी से पहचान

सब विषय की हाताळणी
सेती शिघ्र कवियत्री
दुःख,दर्द, संस्कार धरकन
उभी करसे एक स्त्री

अष्पपैलू व्यक्तिमत्व
राबसे कंबर कसकन
परिवार पासून समाज
सबको जपसे मन

काव्य वर्षा चारोळी संग्रह
हजारो रचना की धनी
श्री योगराज पटले की टुरी
विजय भाऊ घरकी गृहिणी

मिहान,पार्थ की माय
राहांगडाले परिवार पर छाव
सालेकसा,बळद,बिरसी
असा तीन ओका गाव

हास्यकवीता लका हसाय
जुगलबंदी मा हातखंडा
उपादी किस्सा रंगाये
शब्द शक्ती को दंडा

गृहिणी संग शिक्षीका
जीव्हा पर सरस्वती
शब्द शब्द की माला गुंफे
चंपा चमेली सेवंती

घर मा से सुगरण
समाज शिक्षीका
ऋषी तुल्य जीवन
तोडे सब बाधिका

अनेक वाट्स अप गृपमा
वर्षा बाई को झेंडा
वर विषय ला पकडे
बहूआयामी हातखंडा

भारत की बेटी या
योको से सबला गर्व
खुदको बलपर उभी
खुशी बने रहे हर पर्व

प्रवास से निरंतर
असीच हसत रव
तोरो सृजनकार हातलका
वातावरण मा चेतना आये नव


शेषराव येळेकर
दि. ०६/०५/२१

      

Sunday, May 2, 2021

श्री डी पी रहांगडालेजी

 
साहित्यिक को परिचय
मी डी. पी. राहांगडाले  से. नि. नायब तहसीलदार गोंदिया. 
मुल गाव बरबसपुरा ता. तीरोडा जिल्हा गोंदिया.
जन्म तारीख 16/12/1952. अठरा साल पाच महीनामा 11/5/71 ला  मोरो बीह्या भएव तब मी अकरावी मा शिकत होतो. ओक बादमा  बी. ए.
 डीप-एड. को शिक्षण पुरो करेव. 1977 मा ग्राम पंचायत बरबसपुरा मा निर्वीरोध  *सदस्य* बनेव. 1979 
मा *अर्जीनमीस* की लायसन्स भेटी. 1980 मा लिपिक 
पदपरा तहसील तुमसर मा नोकरी परा लगेव. शासन की सेवा करता करता *पदोन्नती होताहोता नायब तहसीलदार    क पदपर लका डिसेंबर 2010 ला सेवा निवृत्त भएव. ओक बादमा 2012- 2017 यंन कालावधी मा ग्रा. पंचायत बरबसपुरा मा नीर्वीरोध  *उपसरपंच* मनून  सेवा देयेव. 
             मी पुरो जीवन निर्व्यसनी ना शाकाहारी जग रहि सेव.* मोला पहेले पासूनच  डंडार, ड्रामा *कथासार गोंदळ*  ना *भजन*  *कीर्तन* को छंद से. जबपासुन पोवारी इतिहास साहित्य अना उत्कर्ष मा जुळी से तब पासून पोवारी समाजको उत्थान साठी कार्यरत रहुसू.* एन ग्रूप करलक बहुत मानसन्मान ना खुप सारा प्रमाणपत्र भेट्‌यासेती.
        पएले मराठी,हिन्दी माच कीर्तन का कार्यक्रम करत होतो पर यंदा *पोवारी मा भी कीर्तन भया.*
अलगलग विषय परा लेख लेखन,कविता,पोवारी प्रस्नोतरी,अलगलग चाल परा पोवारी गाना मा विशेष रुची से. आपलो समाज ना मायबोली को प्रचार, प्रसार करनकी खुप इच्छा से. ना ओक साती सतत प्रयत्नशील सेव.
   
डी. पी. राहांगडाले 
   गोंदिया

साहित्यिक
आदरणीय डी. पी रहांगडाले

तुमी संत साहित्य का प्रेमी,
तुमी पोवारी को हिरा
तुमरी प्रगती देखस्यान, 
धन्य भयेव बरबसपुरा

कऱ्यात नौकरी तहसीलमा,
देयात शिकत रवो यव नारा
संस्कारको पेरा पेऱ्यात
धन्य भयोव बरबसपुरा

बिया भयेपरा बी शिक्यात
संबाल्यात कुटुंब की धुरा
कुटुंब को उद्धार कऱ्यात
धन्य भयोव बरबसपुरा

कलागुण की खान तुमी
खेल्यात दंड्यारको टहारा
किर्तनसंग नाता जोड्यात
धन्य भयोव बरबसपुरा

पोवारी साती झट रह्यात
तुमी पोवारीका दुलारा
तुमरा कार्य देखकन कवुसु
धन्य भयोव बरबसपुरा

आदरणीय बाबूजी(डी.पी रहांगडाले) तुमर समाजजागृती, पोवारी जागर, पोवारी उत्कर्ष क् कार्य साती मोरो बारबार नमन) 

डॉ. शेखराम परसराम येळेकर* नागपूर २९/४/२०२१


आदरणीय श्री. डी.पी. रहांगडाले

बरबसपूराको आखरपर रहांगडालेको घर
जन्म्या धनलाल, जसो भक्तिधन को सार
दिवो को उजारोमा रोज करती अभ्यास
खेती को काममा देती, बापला आधार

सुंदर भार्य भेटी उणला, गोमाटोला गाव
दुय टुरा अना टुरी, मनी आनंद नही मावं
भाई भाई रवसेत जसा राम ना लक्षुमन
बहिनाई लाड कवतिक की, खेलन नाव

लहानपणपासून से भजन कीर्तनको छंद
हार्मोनियम बजावसेत संग टाळ ना मृदंग
जस, श्लोक, आल्हाखंड गावसेती मस्त
कथा कहाणी सांगसेती हासी मजाक संग

निर्व्यसनी, शाकाहारी साधो सरल जीवन
दुय ड्रामाको, ढगभर भजनईंको  लेखन
हिंदी, पोवारी मराठी मा करसेत कीर्तन
माय बोली को प्रचारमा रमसे उनको मन

असो मोरो सदगुरुला बार बार से नमन
मोरा गुरु, मोरा पिता, जसा माय पांडुरंग
शब्दलक सजाऊसू उनको प्रेम की मार
शतआयुशी होवो, मन भजनकिर्तनमा दंग

सौ छाया सुरेंद्र पारधी

सन्मानिय साहित्यिक
    श्री डी.पी.राहांगडाले

महा योगी जीवन का
ताल कला,संसार मा
निर्व्यसनी से जीवन
लेखनी से हातमा

श्री डी.पी. राहांगडाले
पाय नाचसेत दंडार मा
संत साहित्यीक तुमी
जगसेव पोवारी सृंगार मा

प्रशासन मा सेवा
गाव मा भी जनसेवा
कर्मरथी पथपर
सुगंधी पसरावसे सेवा

अर्जीनमीस ते नायब तहसीलदार
सेवा को लंबो प्रवास
गाव को अनुपम प्रेम
बरबसपूरा मा निवास

किर्तन भजन हात मा टाळ
मुख जीवा पर सरस्वती
कथा सार गोंधळ,माय बोली प्रसार
वारकरी को जत्था से भोवती

ज्ञान का सागर
व्यंग रचना उजागर
समाज उत्कर्ष को कार्य
लेखनीको मशागती नांगर

आदरणीय बाबुजी
तुमला करुसू नमन
सुरज चांद सारखो चमके
योव सुगंधी जीवन

शेषराव येळेकर
दि. २९/०४/२१

श्री डी पी रहांगडाले
आदर्श जिवण, सुसंस्कृत आचरन
आध्यात्मिक, सादगीपुर्ण जिवन
होता पुर्व नायाब तहसिलदार
आता पोवारी बचावन साती लेयीन प्रन

- सोनू


मा. डी. पी. रहांगडालेजी
  

धनलालजी रहांगडाले 
होता नायब तहसीलदार, 
कविता, भजन, गीतकार
संगीतप्रेमी ना कीर्तनकार. 

बरबसपुरा तालुका तिरोडा 
को आय उनको मूळ घराना, 
वर्तमान मा गजानन कॉलोनी 
मा से उनको आशियाना. 

पोवारी, हिंदी, मराठी मा 
लिखसेत गीत, कविता, 
मधुर स्वभाव से उनको 
ज्ञान को बव्हसे सरीता. 

सरकारी नौकरी करके 
बनाय ठेईन काव्य प्रेम, 
टुरी उनकी छाया बाई 
निभावसे बाबूजी को नेम. 

                      - चिरंजीव बिसेन
                                  गोंदिया

              
  श्री डी पी रहांगडाले

पोवारीका धुरकरी
गाव बरबसपुरा
दंडारमा खेलनेवालो
गयोव लिपिक पदपरा।।

गावकि माती तुमरी
कसि चुप रवन देय्
नाइब तहसिलदार बन्या तुमी
नाव गावको भयोव।।

निर्व्यसनी रवनो 
ऋषिकोच से जीवन
मुहुन प्रतिभा फुल रही से
करत होता कीर्तन।।

अनुभव तुमरो काम आये
घडे सेवा पोवारी कि
नित्य करो नवो सृजन
कृपा  गडकालिकी।।

पालिकचंद बिसने सिंदिपार(लाखनी)

  श्री डी पी रहांगडाले
शुद्ध सात्विक जीवन 
भजन, किर्तन व्यासंगी
सरोसती वरदहस्ती 
महाज्ञानी सत्संगी |||
सुकर्मीत पथपरा 
सप्तसूर का साधक 
साहित्य उद्धारक चरणी 
मी शतदा नतमस्तक ||


वंदना कटरे
 

ऋण साहित्य गणको
साहित्यिक श्री डी. पी रहांगडाले


धनलालजीका । पोतनजी पिता ।
माय भागरता । पुण्यवान   ।।1।।

बरबसपुरा । गाव से इनको ।
धार्मिक मनको । धनलाल ।।2।।

अठरावो साल । जीवनमा आई ।
धनवंता बाई । भार्या ओकी ।।3।।

दुय टुरा अना । छाया एक टुरी ।
भयी इच्छा पुरी । संतानकी ।।4।।

बिह्याको बादमा । भया पदवीधर ।
बापला आधार । किसानीमा ।।5।।

पोट पाणी साती । अर्जनविस काम ।
किसानीमा घाम । काहाळती ।।6।।

कनिष्ठ लिपिक । अस्सीको सालमा । 
लग्या तहसीलमा । नौकरीपर ।।7।।

प्रमोशन लका । मोठो पद पर ।
नायब तहसीलदार। भय गया ।।8।।

निवृती को बाद । भया निर्विरोध ।
उपसरपंच पद । करीन सेवा ।।9।।

भजन-कीर्तन । टाळ ना मृदंग । 
हार्मोनियम संग । करसेती ।।10।।

छंद से उनको । ड्रामा ना डंडार ।
गोंधळ कथासार । करनको ।।11।।

पोवारी, मराठी । हिंदी की कविता ।
ज्ञान की सरिता । लिखसेती ।।12।।

इनकी से इच्छा । पोवारी प्रसार ।
भाषाको प्रचार । सबसाती ।।13।।

इनकी कविता । कसे गोवर्धन । 
करे संवर्धन । पोवारीको ।।14।।

    इंजि. गोवर्धन बिसेन, गोंदिया
          मो. 9422832941
            दि. 29 एप्रील 2021

   श्री.डी.पी.रहांगडाले

मूल गाव आय । बरबसपूरा
जन्मेव गा टुरा । धनलाल

रहांगडाले को । सपुत सें गुणी
साहित्य की धुनी । पेटाईस

ईच्छा बडी भारी । शिक्षणको साठी
नोकरी मा भेटी । पदोन्नती

कलागुणी प्रेमी । सतकार्य भाव
निर्व्यसनी सेव । सदोदित

भजन कीर्तन । गायन वादन
कहानी कथन ।  छंद सेती

धनवंता वर । ज्ञान को सागर
पोवारी प्रचार । कार्य वोका

काकाजी तुमरो । आदर्श जीवन
शुद्ध आचरण । समाजमा

                       शारदा चौधरी
                            भंडारा


              ऋण साहित्यिक को
आदरणीय श्री डी.पी. रहांगडालेजी पर गीत

        संगीत संकीर्तनका छंदी

जिनको जीवन स्वच्छंदी
जिनकी संगत आनंदी
काकाजी श्री धनलाल
संगीत संकीर्तनका छंदी ||ध्रु||

खेडामा शिक्षण करके 
तूमी कास्तकारमा पक्का |
अर्जनविस, मंग लिपिक पासना
मामलेदार तहसीलका ||
निभायात जिम्मेदारीका
कहीं नहीं पाबंदी ||१||

बालबच्चा विद्याविभूषित
विवेकी संस्कारी |
मधुर बोलका तूमी धनी जी
सत्संगी सुविचारी ||
हर भाषामा कीर्तन करनो
काम से ब्रम्हानंदी ||२||

डंढार ड्रामा साहित्यमा
तुमरो से हातखंडा |
पेटी ताळ को सुरमा गायन
भरी से ज्ञान को हंडा ||
गीत लिखनोमा अग्रेसर
हर रचना तुमरी खंदी ||३||

धन लेयके हरेक कला को
जन्मेव जी एक लाल |
धन्य भया वय मायबाप अना
धन्य धन्य धनलाल ||
साहित्यिक गर असा रह्या
वोनं समाजमा नहीं मंदी ||४||

डॉ. प्रल्हाद हरिणखेडे "प्रहरी"
उलवे, नवी मुंबई
मो. ९८६९९९३९०७

 डी पी रहांगडाले
 गुरुजी तुमरो कार्य से प्रेरणादायी
रहो सदा तुम्ही आनंददायी
पोवारीकी अशीच करत रहो सेवा
एकोमाच तुमरो जीवनकी उतरायी

तुलसी (तुरसी) तुळस 62

 

पोवारी इतिहास साहित्य अना उत्कर्ष द्वारा आयोजित 
पोवारी काव्य स्पर्धा क्र. ६२   तारीख :-२/५/२०२१
                    तुरसी
                
कालनेमी  दैत्य न संतान  साती ।
माय लक्ष्मी की आराधना करीस।।
राक्षस कुलमा ओन जन्म लेईस।
ना लक्ष्मीजी न वृंदा नाव धरीस।। १।।

शिवजीक फेके गयेव तेज लका।
समुद्र मा जालन्दर पैईदा भएव.।।
करीस बीह्या ओन  वृंदा संग ना,।
देव ईन संग युध्द करनला गएव.।। २।।

पतिव्रता होती जालंदर की वृंदा।
त विष्णुन सतीत्व करीस हरण ।।
वृंदा न श्राप देईस  विष्णुजी ला।
जब भए गयेव जालंदर को मरण।। ३।

वृंदा जालंदर संग भयगयी सती।
ओणच जागापर निकलेव पौंदा।।
अमर भयगयी तुलसी नाव लक।
पतिव्रता,सत्यवती, सती  वृंदा ।। ४।।

घरघर लगाओ तुलसी ब्रींदाबन।
ओन्ज्या भगवानको रवसे  वास।।
खासी,कोकला,दमा ना बुखार  ।
तुलसी रस,बीमारीको करसे नास।। ५।।

जीवनदायीनी गुणकारी तुलसी।
जेक गरौमा रहे तुलसीकी माळ।।
शुध्द होसे तनमन,सब बिचार  ।
कदापी जवर नही  आव काळ।। ६।।
              
डी पी राहांगडाले 
      गोंदिया .


तुरसी वृंदावन

विठू माउली देखू येन डोळा
तोरी पंढरी आनंदको सोहळा
चंद्रभागा तिर भक्त को मेळा
मायमाउली सिंगार कर सोळा

दिंडी अभंगमा वारकरी दंग
रिंगण लगीसे भक्तिको रंग
आत्मआनंदी सज्जनको संग
तुरसी डोस्का पर आनंद तरंग

तू निर्गुण निराकार पांडुरंग
ब्रह्मचैतन्य आदी अंत तू देवा
तुरसी की माला तोरो गरोमा 
तूच भक्तीको अनमोल ठेवा

भरेव सोहळा, भक्तिकों माप
देह नाम्याकी पायरी, मन वृंदावन
आत्मा तुरसी मंजुळा लगे मन
तोरो चरणोमा अर्पण मोरो तन

सौ छाया पारधी



    तुरसी
 (अष्टाक्षरी काव्यलेखन)

जालंधर    दैत्य    संग
देव    करसेती     युद्ध |
वृंदा पत्नी आय ओकी
पतिवर्ता   अना   शुद्ध ||१||

रुप    जालंधर    लेय
विष्णू जासे ओको घर |
पतिवर्ता    होसे   नष्ट
मर    जासे   जालंधर ||२||

देसे  श्राप विष्णूजीला
होय  जाय  तू पाषाण |
देख   विष्णूला  पत्थर
सृष्टि  भयी  या बेजान ||३||

देव   गया    वृंदापास
ओला  करीन  बिनती |
कर   विष्णू  श्रापमुक्त
वृंदा  चली  गयी  सती ||४||

ओको  राखमालं  वहां
झाड़    वापेव    बरसी |
शालीग्राम विष्णू ओको
नाव     ठेवसे    तुरसी ||५||

बिना    तुरसी   प्रसाद
नही    करुन     ग्रहण |
होये  तोरो  संग  बिह्या
विष्णू    देसे    वरदान ||६||

(बरसी = एक सालमा)

   इंजि. गोवर्धन बिसेन, गोंदिया
          मो. ९४२२८३२९४१
            दि. २ मई २०२१
तुरसी

अष्टाक्षरी काव्यलेखन

बिंद्राबन की तुरसी
अज नाराज भयीसे
माय बिना आंगनमा
बडी झुरमुराइसे

सकाळकी झाडलोट
अना सयपाक घाई
तरी आंग धोयेपरा
पाणी ढार मोरी माई

सडा चवुक सकाळी
खंड कभी पडेव ना
माय रहेपरा घर
कभी दिवो चुकेव ना

शुद्ध आक्सीजन दाती
बिंद्राबन मा विराज
सुख शांती सम्रूद्धी को
मोरो घर आये साज

सौ.वर्षा पटले रहांगडाले
गोंदिया


तुरसी
  

असुर जालंदर की पत्नी वृंदा 
होती बहुत पतिव्रता ना सुंदर, 
देवता संग लढाई मा जालंदर
भारी पडन लगेव देवता ईन पर. 

विष्णु न जालंधर को रूप धरकर 
छल करीस जालंदर पत्नी वृंदा संग, 
जालंदर ला लगी खबर वु भयेव विचलित 
विष्णु न् वोको वध करीस मिलकर शंकर संग. 

येन छल साती वृंदा न विष्णुला देईस शाप
पाषाण रूप भय गयेव विष्णु भगवान, 
विष्णु न वृंदाला देईस तुलसी को रूप 
अना आपल् सिरपर धारण करन् को वरदान. 

तब पासून वृंदा बन गयी पवित्र तुलसी, 
वोक् निवास को नाव भयेव वृंदावन, 
जग मा पूज्य होयकर हर आंगन मा विराजसे 
औषधी गुणयुक्त से जगमा पावसे सम्मान. 

                      - चिरंजीव बिसेन
                                  गोंदिया
 

तुरसी--


माय तुरसी तुरसी 
तोरो बिंजरामा बन 
हर घरको मायला 
करं पतित पावन ||१||
तोरी हिरवी मंजुरा 
सोभं विष्णू पदपरा 
भाग्यवान तू त्रिलोकी 
मंग कसी जरजरा ||२||
पंढरीमा वारकरी 
गरा तुरसीको हार 
कारो वायुला जारके 
पाजं शासवत धार ||३||
आयुर्बेदी गुण गंगा 
घर आंगनकी काशी 
तोरो ऋणमा बंधीसे 
सुख श्रमश्रीकी राशी ||४||
रूप जरी से नहान 
पर कार्यमा अमर 
आमरण देजो शक्ती 
जिकू सत्यको समर ||५||

वंदना कटरे   "राम-कमल "

काव्य प्रकार अभंग
पवित्र झाड

सबमा पवित्र,तुरसी को झाड़
कोनतोही काड़,आवनही।।

गुणकारी वृक्ष, आयुर्वेद शास्त्र
खाशीको अस्त्र,काढ़ापिवो।।

आॅक्सिजन देसे, दिनरात्री योव
जिव जगदेव,प्राणीजन।।

झाड़ना मानव,नाड़गा जुड़ीसे
तबच कड़ीसे,महिमा या।।

जालंदर पती,वृदा महासती
कृष्ण रूप भक्ती, शालीग्राम।

वेद ना पुराण,सांगसे बखान
तब योव ज्ञान,मिड़जासे।।

‌लगावो तुरसी,घर वृंदावन
भारतीय ज्ञान, संस्कृती या।।

संध्याकाळी घर ,दिवो की याजोती
प्राण वायु साती, तुरसीला।।

 तुरसी की हार, धार्मिकता शान
जनमा यो मान,संतजन।।

""जय राजा भोज जय माँ गड़काली""
वाय सी चौधरी
गोंदिया


तुलसी

आंगनमा तुलसी
रोके ईडापिडा की चाल
मन ला आत्मालक जोडे
गरामा तुलसी की माल

सब रोग की दवा
वा आय तुलसी
भरभरायकन आक्सिजन देसे
नही होन दे शरीर आलसी

प्राण म्हणजे जीवन
ओको साठा तुलसी जवर
पुरो पृथ्वीपर
माय तुलसी को कव्हर

दिवस रहे या रात
देसे आक्सिजन
उठ बाई दिवा लगाव
प्रसन्न होये तोरो मन

शेषराव येळेकर
दि.०२/०५/२१

Sunday, April 25, 2021

हनुमान 60



 हनुमान

माय अजनी को लाला, बजरंग बाला,
लाली लंगोटी वाला, नाव बजरंग बाला।

ओठ पर जेको राम सिया राम
श्रीराम को वु दुलारा,
रामजी का वोय सबल् प्यारा
रूद्र अंश पवनसुत,नाव बजरंग बाला।

लहानसो उमरमा बी काम मोठा भारी
साधु संत का आती रखवाला,
सुरज ला घिट्किस, दानव पर भारी
ऋषि मुनि का प्यारा, नाव बजरंग बाला।

मारके छलांग वोन् लंकाला पार करिस
पुरो लंका दहन करने वाला,
रावन को अहं् ला चुर-चुर करिस
सिताला् ढुंढन् वाला, नाव बजरंग बाला।

भक्त मा भक्त हनुमान जी मोरो
सियाराम छाती मा देखावन वाला,
हनुमानजी को बिना रामजी अर्धो
श्रीरामजी बिना अर्धो, बजरंग बाला।

          रोशन राहांगडाले
           रा.पिपरिया ता.सालेकसा
           जि.गोंदिया,


हनुमान

पवनपुत्र हनुमान की कथा
रामभक्त हनुमान की या गाथा
शास्र पंडित वू जगत मा
मात् अंजनी को चरना मा वोको माथा

जनम भयेव हनुमान को 
बचपन पासुन डुबेव भक्ती मा राम को 
किशोरावस्था मा विक्रम करिस वोन
लंका विध्वंस करिस जयघोस करत प्रभु राम को

महाबली हनुमान की कथा बहौत महान
जिवनभर राम नाम जपिस,पाईस अमरदान
ब्रम्हचर्य को पालन करिस, धर्म को करिस बचाव
कलयुग मा भी अमर रहे असो पाईस वोन वरदान

काल भी भयभीत होय जासे वू नाम हनुमान
शनी भी हट जाये, जब नाम स्मरन करो हनुमान
कलयुग मा साक्षात से ईश्वर असो हनुमान
घर घर, गांव गांव पुजेव जासेत हनुमान

विरेंद्र कटरे


 हनुमान

माता अंजनीको पुत्र बडो बलवान
नाव येको पवनसुत विर हनुमान
रामजी को सफल करे सब काम
माता सीता को हृदय मा से वास

फल समझकर सूर्य ला घिटकाय
बालपणमा बल विस्मुर्ती मा जाय
सीता धुंढनला समुद्रपार लंका जाय
अशोक वाटिकामा हांहाकार मचाय

आदेश रावणको, पुस्टीला आंग लगाय
सारी लंका ला एकघन मा आग लागय
लक्ष्मणला तिर मारीस इंद्रजितन नागपास
संजिवनी बुटी साती पर्वत आणीस उठाय

संकटमोचन , अंजनिसुत, केशरिनंदन
पवनसुत,असा नाम अनेका पावन
जो हनुमान चालीसा गावसे हरदिन
परम सुख पावसे जीवन होसे पावन
    
                       - सोनु भगत


 हनुमान जी की आरती

जय जय हनुमान गोसाई
कृपा करो महाबली योगी
जो करे तोरो अनुसरण
वू बन जाय सदा निरोगी

महाकाल को रुद्र अवतार
अष्टांग योग को रखवाला
भक्ति शक्ति को अनुपम योग
राम रसायन पाजने वाला

इडा, पिंगला, सरस्वती
प्राण की तोरी बहती गंगा
भक्ती योगी, हे हनुमाना
हर युग मा तू सेस जागा

कपालभाती तेज ललाट
छाती से पहाड समान
प्रत्याहारी इंद्रीय जेता
नाम जप को सदा ध्यान

राम नाम की समाधी
अष्टांग योग को भोगी
अष्ट सिद्धी नौ निधी
प्रेम,ममता को फिरतो जोगी

जय जय हे हनुमंता
योगी व्रत मा करु सेवा
जो भी करे शक्ति साधना
सदा प्रिय बनसे देवा

शेषराव येळेकर


हनुमान

त्याग सेवा अना् शक्ति को
प्रतीक से हनुमान
मर्यादा पुरुषोत्तम रामजीक्
सेनाकि वु शान।।

जितेंद्रिय वु ब्रम्हचारी वु
आज्ञाकारी सुत
अंजनी माँ को होतो लाडलो
श्रीराम को दुत।।

शक्ति भक्ती अना् ज्ञान को
संगम पवनकुमार
कालनेमीला धुल चटाइस
राक्षस केत्ताक ठार।।

तु शंकरको सेस अवतार
चिरंजीव तु कलियुगमा्
मनोभावलक् भक्ती करसेजन
दे बल आमर् तनमनमा्।।

मोठा राक्षस तोरो कालमा्
आमर् कालमा सेत सुक्ष्म
आयोव आब् यव कोरोना
नजर चुकावसे तिक्ष्ण।।

अहिरावन को समान यवबि
संख्या आपली बढावसे
एक मरसे दुसरो जगसे
तरास मोठो देसे।।

सांग आब तु इलाज वको
कोणतो चलावबि तीर 
व्हँक्सिनलक् आमी आब् लढसेजन
आवना सरसे धिर।।

पालिकचंद बिसने



हनुमान

पुंजिकस्थला स्वर्ग की अप्सरा
रूपवान सुंदरी, चालमा चंचला।
ऋषी को संग करिस अभद्रता 
वदेव ऋषि, श्राप देसु टुरी तोला।।

पुंजिकस्थला घबराई बड़ी मनमा
लेजो वानर जन्म जब पृथ्वीपरा।
तब तेजस्वी पुत्र हरे,  ताप तोरा
ऋषिन उष्शाप देईस मंग अप्सरा।।

वनमा केसरी अंजना को मिलाप
रूद्रको ग्यारावो रूप वीर हनुमान।
सूर्य, अग्नि,सोनो को समान तेज
वेद-वेदांगको मर्मज्ञ महाबुद्धिमान।।

राम सीता को सफल करे काज
विक्राल रूप धरके, जराईस लंका।
संजीवन बुटीलक लक्ष्मनकी रक्षा
चहू ओर हनुमंता को बजेव डंका।।

रुद्रावतार, पवनसुत केशरीनंदन
संकटमोचन, जब नाम सुमिरत।
भूत पिशाच्च निकट नहीं आवत
जो हनुमान चालीसा नित्य गावत।।
 
सौ छाया सुरेंद्र पारधी
सिहोरा,तुमसर

                   हनूमान

होतो।गा लंकापति । राजा एक रावन ।।
अहंकार का गुन । होता देवा,,,,,।।

स्वर्णजडीत लंका । होती गा बंदवडी ।।
मरेवपर ना गोंडी। देवराया ,,,,,,,,,।।

सीतामाई हरन । विनाशकारी मन । 
रावन को मरन । स्त्री द्रोह ,,,,,,,,,,।।

धर्म ना अधर्म की । भयी होती लड़ाई ।।
पराजय वा भयी । अधर्म की,,,,,।।

बल बुद्धि का दाता । ब्रम्हचारी गा होता ।।
अंजना जेकी माता । पांडुरंग ,,,,,,,,।।

रामचन्द्र को दास । लक्ष्मण को श्वास।।
सत्यपर विश्वास । हनूमान ,,,,,,,,,,।।

ठेयीस गा कदम । रावन को लंकामा ।।
जनता गा शंकामा । पडगयी ,,,,,,,,।।

जराईस गा लंका । बजाईस गा डंका।।
रावन लघुशंका । सुटगयी ,,,,,,,,,,,।।

             
कु,रक्षा हिरदीलालजी ठाकरे नागपुर
पोवार समाज एकता मंच परिवार

                      हनुमान
                  
पुत्र  प्राप्तीसाठी दशरथ न यज्ञ करीस  ।
ओन्ज्यालका निकलेव पिंड को गोला ।।
दशरथ की तीन रानी,उनला बाटनसाती।
तीन भाग करशांन  देईस रानी हीनला।।

कैकई क हातमाको ,झळपिस घार न ।
ऋशीमुख पर्वत परा अन्जनी तप कर।।
घार जवर को गोला,हवा क बल लका।
पळेव जायशान अंजनी क आंजुर पर।।

ग्रहण करीस पिंडको गोला अंजनीन।
पोट आयेव ऋद्रवतार विर हनुमान  ।।
भक्त असो अवतरेव  अकराओ ऋद्र।
हृदय मा समाय गयेवश्री राम भगवान।।

 सीता शोध करनसाती करीस उडाण।
 गएव लंका मा,कर सात समुदर पार ।।
आग   लगाईस सोनो क लंका  मा   ।
मारे गयेव रावण, उतरेव धरती को भार।।

कोणी कसेती हनुमान,पवनसुत,मारोती।
गाव गाव मा जेकी बसापत,मंदिर सेती।।
हर दुख मा सहाय,ना रवसे सबपर छाया।
मणुन गावो हनुमान चालीसा ना आरती।।
                   
डी पी राहांगडाले 
    गोंदिया
 हनुमान

शुभ घडी आयी चैत्र पुनवाला
केसरी नंदन अंजनी लाला
रुद्रावतार जगमा आयेव जनमला 
जो बाळा जो जो रे जो

जन्मेव बुद्धी सामर्थ्य को पुतला
खुशी भयी किष्किंधा नगरीला
गाऊसू पाळणा अष्टसिद्धीको दाताला
जो बाळा जो जो रे जो

मुखमा गिळीस भास्करला
बजरंगी की अगणित लीला
नवविधा भक्तीको झोका देव पाळणाला
जो बाळा जो जो रे जो


शक्ती लगी लक्ष्मण भयेव मूर्च्छित
शीघ्र आणीस पवनसुतनं द्रोण पर्वत
संकटमोचन तपस्वी वीर हनुमंत
जो बाळा जो जो रे जो

विक्राल रूप धरके हुंकार भरं
ब्रम्हांड पाताल धरा डगमग करं
भाग खडा होती भूत निशाचर
जो बाळा जो जो रे जो


स्वामिनिष्ठ राम को परमभक्त
जारीस लंका को सोनेरी तख्त
रावण कैदलक करीस सीताला मुक्त
जो बाळा जो जो रे जो

                              शारदा चौधरी 
                                   भंडारा

     हनुमान

अंजनी को पुत्र,
केसरी को लाल,
वानर जातीसे सेना ईनकी,
श्रीराम जी को भक्त आय।।

अमरता को से वरदान मिल्यो,
सब भक्त एवं धर्म की रक्षा करत,
अपार बलशाली अना विर सेत वय,
भगवान हनुमान वुनला कवत।।

दिवारी मनावसेत श्रीराम को नाव लक,
येनच काल मा शिवन हनुमान को अवतार लेईन,
रहस्यमई से जिवन इनको,
पानी मालक महाबली की उत्त्पति भई।।

त्रेतायुग मा केसरीनंदन रूप मा जनम लेईन,
बनकर रामभक्त छाया बनकर चलीन,
वाल्मीकि रामायण मा उल्लेख से इनको,
हनुमान जी को संपूर्ण चित्रण वाल्मीकि न करींन।।

द्वापर युग मा भीम की लेईन परीक्षा,
महाभारत को प्रसंग मा पूछ ला मार्ग मा ठेईन,
कवत हनुमान मार्ग लक उठावो येला,
भीम न आपरी पुरी ताकत लगाय देईन।।

कलयुग मा भी सेत हनुमान जी जीवित,
राम भक्त की रक्षा करसेत,
अनेक रहस्य लक भरी से इनकी गाथा,
मिलकर हनुमानजी ला भक्त भजन गाव सेत।।

      कु.कल्याणी पटले
       दिघोरी,नागपुर

 हनुमान
  

अंजनीपुत्र केसरी नंदन 
आय पवनपुत्र हनुमान, 
बल-बुद्धी विद्या को दाता 
सब लोकईनला से अनुमान. 

बचपन मा सुर्यला निगलिस 
तीनही लोकमा भयो हाहाकार, 
सब देवईनन् करीन विनंती 
तब दूर भयो जग को अंधकार. 

राम ना सुग्रीव की दोस्ती कराईस 
सिताजी क् खोजसाती गयेव लंका, 
सिताजी की खोज करके लंका जराईस 
वहॉ राम नाम को बजाईस डंका. 

राम रावण युद्ध मा कई राक्षस मारीस 
संजीवनी आनकर लक्ष्मणका बचाईस प्राण, 
राम क् सेवामा हमेशा होतो तत्पर 
रामला बहुत प्यारो होतो हनुमान. 

पाताल ल् राम-लक्ष्मणला आणीस
अहिरावण को करीस सर्वनाश, 
भक्तईनका सब दुख दुर करसे 
ठेवसेत वोक् पर जे पूरो बिश्वास.


                      - चिरंजीव बिसेन
                                  गोंदिया

संकट मोचन हनुमान
          (वर्ण संख्या -12)

जय  हनुमान  महाबली  प्रभू
संकट  मोचन  नाव  से  तोरो ।
आयीसे  संकट   येन  धरापर
कष्ट हरो प्रभू  सब दुख  टारो ।।1।।

शक्ती लगी  जब  लछमन पर
आन संजीवनी बचायेस जान ।
तसोच बचाव कोरोनाग्रस्तला
देयके उनला  जीवन को दान ।।2।।

अंजनी  पुत्र   पवन  सुत  प्रभू
राम  काजसाती  राक्षस मारेस ।
तसोच अदृश्य  कोरोनाला मार
आपलो भक्तकी जिंदगी तारेस ।।3।।

जित देखो उत कोरोनाको डर
असो  बेरापर   तोरोच आधार ।
जय  महावीर   संकट  मोचन
तुच  भयमुक्त   करजो  संसार ।।4।।

कोरोना ग्रसित  मोरा टुरा टुरी
जल्दीच करजो  तू इनला बरो ।
येन संकटमा  आमला दे  धिर
तोरो चमत्कार देखावजो खरो ।।5।।

सुरक्षा  कवच  देय  महाप्रभू
वैरीलक रक्षा  आमरी करजो ।
बिनंती करसे  तोला गोवर्धन 
आया  संकट  लवकर हरजो ।।6।।
शब्दार्थ:
धरापर = पृथ्वीपर
टारो = दुर करो
डर = भय, भेव
बरो = चांगलो
धिर = हिंमत

    इंजि. गोवर्धन बिसेन, गोंदिया
          मो. 9422832941
            दि. 25 एप्रील 2021

Saturday, April 17, 2021

निसर्ग 58



माानव
सूर्य नारायण।उगलसे आग्।।
आता तरी जाग्।मानव तु,,,,।।

झाड़ तु काटेस्।बनेस् खुदगर्ज।।
मानवको फर्ज ।भुल् जासे,,,,,।।

मुका पशू पक्षी।काहा रे जायेती।।
कसा बचायेती। परिवार,,,,,,,।।।

आपलोला दुःख।आवसे सांगता।।
मुका ला बोलता।आव् नही,,,,,,।।

आपलो समान।समजो सबला।।
देखो समस्याला। सबकीच,,,,,।।

बच्चा साती देखो।मनमा झुरसे।।
सावली गा देसे। झाड़ पाना,,,,,।।

जंगल का झाड़।प्राणी को रक्षन।।
मानव तु जान्।प्राणी दुःख,,,,,,,।।

बचेती रे झाड़।बचे गा वनराज।।
लगावों गा रोज। एक झाड़,,,,,,।।

सांगसे गा रक्षा।करो काही दया।।
देहे माहामाया।सुख शांति,,,,,,।।

             !!!!कवी!!!
कु   रक्षा  हिरदीलालजी  ठाकरे
पोवार समाज एकता मंच परिवार

पृथ्वी

पृथ्वी आक्षाद्दित होती झाड लका
पृथ्वी को कोना कोना मा होती हरियाली
बाद मा जनमेव मनष्य नाव को प्राणी
वोको बाद मा श्रृष्टि की दशाच बदली

विकास को नाव पर तोडिस जंगल
मनुष्य न् नही करिस बिचार
तोडत् गयेव वु हिवरा हिवरा झाड
ग्लोबल वार्मिंग लका तापमान को भयो संचार

मानुस पायी प्रदुषन बढन लगेव धरती पर 
फाटन लगेव ओझोन को स्तर 
निलरहित किरन करन लगी तांडव
बिचार आयेव, आता कसो लगे अस्तर?

कागद, फर्निचर साती काटिन मोठा झाड
टकली असी भयी आमरी धरती
विकास यव् नव्होय, आय विनाश
मनुष्य को पाप लका बदली पृथ्वी की आकृती

हात करो आता पुढो मोरो बंधुओ 
कविता रचन् की नाहाती आमला
एक कदम बढावनो सृष्टि को समृद्धी कन
बचाओ या सृष्टि, देव स्वच्छ वातावरन  भविष्यला

 विरेंद्र कटरे

प्रदूषण

देखो कसा बहुगुणी सब तरुवर
कटकर बिछ गया सेती धरतीपर।
भास्कर ओकसे आगगोला भयंकर
झुरमुराय गया पशुपक्षी अना नर।।

नदी रोकिस अना काटीस जंगल
बनाइस ऊंची ऊंची मोठी इमारत।
जहरीलो धुंगा निंगेव कारखानाको
फाट गई सुरक्षा की ओझोन परत।।

अतिनील किरण पहुची धरतीपर
त्वचा कॅन्सरको धोको बहुत बढेव।
गरमी लक सब करसेत त्राहिमाम
धरती को तापमान को पारा चढेव।।

देखो कसी माय की ममता निर्मळ
पिल्लु को बचावन साती जीवन।
पाना धरीस चोंचमा,साऊली करन
आब तरी दया मनमा देजो आवन।।

जन्मदिवसको अवसर पर हरसाल
लगावबिन, जगावबिन एक  झाळ।
धरती होये समृद्ध हिरवी हिरवीगार
तबच रहे स्वस्थ नवो पिढीको काळ।।

सौ छाया सुरेंद्र पारधी
 


प्रकृति को विनाश
  

जंगल भय गई से साफ 
कही बी नाहाय सावली, 
बच्चाईन ला सावलीसाती
तोंड मा पान धरकर माऊली. 

आदमी काट रही से झाड 
वोला नाहाय भविष्य की चिंता, 
झाड् इनकी करके कत्तल 
रच रही से आपलीच चिता. 

कट गया सेत सब झाड 
उजाड भय गई से जंगल, 
जंगल उजाड करस्यारी 
नही होनको कभी मंगल. 

मुहून जंगल तोड ला रोकनो ना
नवा झाड लगावनो से जरूरी, 
नही त् भविष्य बहुत बिकट से 
समझो निसर्ग की चेतावनी भारी. 

सूरज की गर्मी होय जाहे असह्य 
पिवनला नही मिलन को पानी, 
यदि आदमी नही सुधरेव अना 
करत् रहेव आपलीच मनमानी. 

                      - चिरंजीव बिसेन
                                  गोंदिया

               पर्यावरण

घनदाट जंगल होतो, हीरवो हीरवो रान
जेला देखकर हरपत होती भुक तहान
सावलीमा आराम करत होता पशु पक्षी
आंबा की अमराई ना मोहुको मोह-यान  //१//

चार,ना चारोळी टेंभरुन भी भेटत होता 
शरीर ला पौष्टिक होता,चव न्यारी न्यारी
मोठ चवलक खानला भेट मस्त रानमेवा
आक्‌सीजन भेट ना बरसात पळ भारी //२//

पर माणुस क डोस्काला का भएवत
जंगल काटीस ना लगाईस कारखाना
उजाळ कर देईस जंगल, धरती सारी
आपलो बिंध से  भलतोच तानाबाना //३//

बरसात मा आता बारीस आव नही
उन्हारो की तपन भी  तपसे भरमार
 अलगलग रंग की आवसेत बीमारी
ना जीवन सबको होसे मोठो बेजार  //४//

मनून एक झाळ काटोत दस लगाओ 
पर्यावरण राखण मदतभी होय मोठी
सुखी रहे जिवन,जगाओ देश  प्रेम 
झाळ जगाओ,पर्यावरण रक्षण साठी //५//
                   
डी पी राहांगडाले 
  गोंदिया


टंगोलीको घाव 
    (अष्टाक्षरी काव्यलेखन)

   नष्ट    भयेव   जंगल 
   खाय टंगोलीको घाव ।
   मुर्ख   मानुसला  येन
   आता   देवच  बचाव ।।1।।

   भयी    धरती   गरम
   ओक   दिनकर आग ।
   मर   रह्या   पशुप्राणी 
   देखो  प्रकृतिको  राग ।।2।।

   पक्षी   पान  धर  चोच
   देसे  पिलाला  वु छाव ।
   देखो मायको वात्सल्य
   खुद   लगायके   दाव ।।3।।

   बुध्दिमान  मानुस की
   आय   विकृत  करनी ।
   मुका  पशुपक्षी ईन्ला
   आयी  नसीब  भरनी ।।4।।

   झाड लगाओ सप्पाई 
   करो   प्रकृति  श्रृंगार ।
   सांग   गोवर्धन   सब
   करो   जीवन  उध्दार ।।5।।

   इंजि. गोवर्धन बिसेन, गोंदिया
          मो. 9422832941
            दि. 11 एप्रील 2021
धरती

माय आमरी धरती
वका् पुत्र  जीव सारा
सप्पाइ झाड वस्त्रवका्
आब फाटसेत टराटरा।।

सुर्यकि आग झाडच झेलसेत
देसेत  प्राणवायू सावली
आधार पशुपक्षीइनला
झाडयलकाच 'हरयाली'।।

धरतीमायको पुत्र मानव
से सबदुन श्रेष्ठ
वुच वस्त्रहरन करसे
बनेव आब भ्रष्ट।।

कसे मी विकासपुरुष
काइकाइ झाड फालतुका
फायदाकाच झाड ठेऊ खेतमा्
बाकिका् बिनकामका।।

एकतर्फो विकास भयोव पुत्रको
रोवसे माय धरती।
कसा होयेत हाल सबका
मिट्टिमा् मिल जाय् कीर्ती।।

बच्याकुच्या पुत्र मोरा
आयको मोरी बात
बचाओ सारा पेडपौधायला
नइत् होये घात।।

पालिकचंद बिसने


            पक्षिनी 

देखो गहिवर दाटेव पक्षिनिला
दुही नेत्रमा गंगा जमुना की धारा।
मरेव पड़ीसे सामने दिलको टुकड़ा
सूर्य नारायण करसे आगको मारा।।

नहीं सावली दिस कही यहांन
मोरो मैना ला लिजाऊ कहान।
मृतदेह सामने पड़ीसे नाहान
लीजाऊ इनला, कोनसो जहान।।

पानी नहीं, नही झाड़की सावली
तहानलका जीव जानकी से पारी।
स्वार्थ साती आमरो घर लूटिन
असोच रयेव त प्रलय आये भारी।।

कसो दुश्मन भयेव येव मनुष्य
रोज करसे झाड़ इनकी कत्तल।
धरतिको हिरवो सिंगार साजरो
हिसककर हाससे खूब बेक्कल।।

जसी पशू पक्षी की भई बेदस्या
झाड काटके नोको करू अवदस्या।
लगावो झाड ,करो धरणीला हिरवी
रहेती पशू पक्षी सावलिमा येको बस्या।।

                  - सोनू भगत


ऱ्हास प्रक्रूतीको

डोरा मा आसु चोच मा पान
कसी भगाऊ बेटा तोरी तहान
प्रक्रूतीको ऱ्हास करन लगीसे
माणुस समजसे खुदला महान

मरणयातना निसर्ग की 
का? मरन जवळ आयेव मनु को
तप्त झळ सहन नही होय
येव प्रकोप आय दिनु को

अगणित खोळ बांडा
दिस रह्यासेत जीतन उतन
असोच चलत रहे त मंग
जीवन को कसो होये जतन?

निरबिना तळपके देह टाकेस भू पर बेटा
नश्वर आत्मा तोरी कहा गयी छोडकर
देख मोरो दुःख मानवबंधु आता तरी
कदम तोरा ठेव जरा संभलकर

सौ.वर्षा पटले रहांगडाले
बिरसी (आमगांव)
जि.गोंदिया

सड़ाक्षरी काव्य

जैवविविधता

संजीव या सृष्टी, 
प्राणी झाड़ झुड़
नवलाई छान
धरती को गुड़।।

झाड़ देसे वायु
प्राणी ला जीवन
जगनला सब
योव संजीवन।।

काहे काट सेव
जग्या मोठा झाड़
मिड़ेत का सांगो
पिक्या आंबा पाड़।।

जगावो झाड़ला
प्राणवायू मिडे़
झाड़ संग जगो
तब नाड़ जुड़े।।

जन्म क पासुन
उपयोगी अस्त्र
बनसेती सखा
घर अन्न वस्त्र।।

सृष्टी को नियम
निसर्ग यो देव
जैवविविधता
वृक्ष मानो देव।।

""जय राजा भोज जय माँ गड़काली""
वाय सी चौधरी
गोंदिया


नहीं फेड सीकज उपकार
   

धरती आमरी माय से,
वोकी संतान आम्ही,
प्रकृति को सौन्दर्यला,
मिलकर करिया सेजन कमी।।

नष्ट करिया जंगल,
से स्वार्थ वोकोमा,
प्राणी जात ला दुःख देया,
सोचो ज़रा मनमा।।

पंछी भया बेघर,
नहीं मील छाया,
विकास को अंधाधुंध मा,
इंसान न बदलीस धरती की काया।।

जंगल झाडी तोडीस,
ना देईस कोई जीव ला माया,
प्रदुषण बढ़ावनो मा रही,
इंसान की मोठी काया।।

उपकार नहीं फेडसीक,
मनुष्य धरती माय को,
प्रकृति को सौन्दर्य ला,
दुबारा निखरके आनन को।।

     कु.कल्याणी पटले
      दिघोरी,नागपुर

 तरुसंवर्धन

हे मानव प्राणी झाड काटके
दुखाऊस नोको मोरो मनला
तोरो हत्यार को वार लक
अगणित घाव पडसेत तनला

ओकंसे आग ग्रीष्ममा रविराज
अवनी को जल रहिसे चोला
उभो हर हाल मी ऋषीसम
देसू शीतल छाया फल तोला
  
प्राणवायू दाता सहचर मी
रोकू धरा धूप वृष्टीला
धरती करसे सिंगार मोरो
नवचैतन्य भेटसे सृष्टीला

वृक्षतोड लक बेघर वू पक्षी
धरणीपर लगेव लुढकनला
करंसे माता पिल्लुपर पर्णछाया
लग्या नयननिर बवनला

सोड कुबुद्धी कर तरूसंवर्धन
समतोल राखुसू पर्यावरणला
बहुगुणी दाता कल्पतरू मी
आधार संसारकर्म करनला


                    शारदा चौधरी
                        भंडारा

दिनांक: ११.०४.२०२१
 जीवन डाली डाली

हिवरा हिवरा झाड
सृष्टीको वरदान
जीवजंतू को आधार
निसर्गकी जान ||१||

झाड आय बादर
हर जीवनकी छत
रोटी कपडा घर होये
पुरी सप्पा जरुरत ||२||

झाडकी छाया माया
जासो मायको आंचल
खुद भुकी रयके देसे
हर बच्चाला अन जल ||३||

नोको काटो झाडला
हर जीव को मकान रे
आये अकाली मरण भी
धरती बने स्मशान रे ||४||

झाड लगावो जहां वहां
पसरावो हरयाली
महके सृष्टी भरे घर
जीवन डाली डाली ||५||

डॉ. प्रल्हाद हरिणखेडे "प्रहरी"
उलवे, नवी मुंबई
मो. ९८६९९९३९०७

घाव (शेलकाव्य)

नोको करु वज्राघात 
वज्राघात टंगोलीको
नोको करु इंतजाम 
इंतजाम सकोलीको

कलेजापर रे घाव
घाव तू केता करजो
जसी गा तोरी करणी
करणी सम भरजो  

बोळकी भयी धरती
धरती बने बंजर 
भोगो गलत कर्मको
कर्मको यव मंजर

तोरी करणीकी सजा
सजा आमलाच कशी
तू रोवजो एकदिन
एकदिन भिजे उशी

तोरो पापलका अज
अज पडी यहा गाज
सावली केती धरु मी
मी भयी बेबस आज

महेंद्रकुमार ईश्वरलाल पटले(ऋतुराज)
ता. ११/०४/२०२०

मानव की तीन गरज

अन्न,वस्त्र, निवारा
पण खरी गरज मानव की
प्राणवायू को बहतो वारा

झाड झुडूप वनराई
निसर्ग की संतान
वितभर को पोट को
लाकूड तोड्या सैतान

हवा, पाणी,शितलता 
झाडं को वरदान
पशू पक्षी जीव जंतू को
घर जंगल रान

कागद, निवारा ,जलावू
ना ना प्रकार का काम
देनो पेक्षा लेनो जमसे
नहीं मानव करणी मा राम

जंगल काटकन मानवन्
मारिस पायपर कुऱ्हाड
नैसर्गिक आपदा को संकट
गिरेव दुःख को पहाड

झाड सखा मित्र
झाड आय जीवन
जंगल बचावो,झाड लगावो
जपो निसर्ग धन

शेषराव येळेकर
दि ११/०४/२१

 मोरो डोरामा कंकर 

मोरो साज शृंगार को 
कसो भयेव रे अंत
काहे मानु मी मानवा 
तोला सच्चो साधुसंत ||

केता सजीव खेलती 
मोरो येन् मांडीपरा 
झाड झडुला तोडके 
काहे करेस जर्जरा ||

रान हिरवो बंजर 
गया बरसाती ढग 
तोरो कर्म को प्रताप 
रवी ओकसे ना आग ||

माया अना वात्सल्य की 
पक्षी देखाव् प्रचिती 
'माय 'मानसेव मोला 
मंग काहे उचापती ||

गयी साओली की रया 
चारी आंग से संगर 
तोरो स्वार्थ लक् भर्या 
मोरो डोरामा कंकर ||

वंदना कटरे  "राम-कमल "

कृष्ण अना गोपी

मी बी राधा बन जाऊ बंसी बजय्या, रास रचय्या गोकुलको कन्हैया लाडको नटखट नंदलाल देखो माखनचोर नाव से यको!!१!! मधुर तोरो बंसीकी तान भू...