Friday, April 9, 2021

श्री लखनसिंगजी कटरेे


अँड. लखनसिंह कटरे.

गोंदिया जिल्हो तालुको आमगाव
जन्मगाव  बोरकन्हार।
वर्ग एकमा जिल्हा प्रमुख
क्षेत्र होतो सहकार।।

साहित्य गणितपरा प्रेम होतो
हुशार होता इस्कुलमा्
चमकतच रह्या तारोघाई
आजबि सेती माउलमा्।।

थाट पोवारी बाज केसरी
गांधीवादी उनको मन
लेख, कविता ,अविरत लिकसेत
समिक्षक कसेती सारा जन।।

 कवितासंग्रह सय भया 
कथासंग्रह एक।                         
माय पोवारी झाडीसाठी
लेसेत सबकि भेट।।

पोवार समाजका आदर्श सेती
प्रेरणा लेबिन सप्पाइ
उनकोसारखोच वाचन लेखन
करबिन आब् घाइ।।

धन्य भयोव बोरकन्हार
धन्य भयोव परिवार
संस्कृती मंडलका सदस्यबि वय
धन्य धन्य पोवार।।


पालिकचंद बिसने 
सिंदीपार (लाखनी)

 ब्रम्हनिष्ठ वरिष्ठ साहित्यकार
आदरणीय श्री लखनसींगजी 

बोरक्हार गांव।पुन्यभूमी पवित्र।।
जन्मेव ब्रम्हपुत्र।लखनसींग,,,,,।।

नित्य ब्रम्हज्ञान।सदा प्रखरप्रज्ञा ।।
नित्य गुरूआज्ञा।ह्रुदयमा,,,,,,,,।।

झाडीपट्टी बोली। साहित्यकी धारा।
लगेव जयकारा । माहा राष्ट्र,,,,,,।।

सेती जानकार। राजभाषा हिन्दी।।
आकाश बुलंदी।लखनजी,,,,,,,,।।

पोवारी भाषा का।जेष्ठ साहित्यिक।
समाज कौतिक।लखनजी,,,,,,,,।।

आदर्श पुरुष ।स्वभाव सात्त्विक।।
सत्य ना विवेक। निष्ठावान,,,,,,,।।

डोंगरल् ऊच्चो।समाज मा मान् ।।
मोरो स्वाभिमान। लखनजी,,,,,,।।

शुद्ध आचरन् । सेती कर्मयोगी।।
बनगया जोगी । समाजका,,,,,,।।

जानसे का कोनी। कसा अपराधी।।
जाऊ आता आधी।चरनोमा ,,,,,,,।।

लखनलाल जी । उदारवादी  गुरु।।
नमन मी करु । गुरुराया,,,,,,,,,।।

              !!!कवी!!!
श्री हिरदीलाल नेतरामजी ठाकरे
पोवार समाज एकता मंच परिवार

कटरेजी

 देखेव नही कोनी महर्षी जीवनमां
या मोडपरा कटरेजी भेट्या पथमां

अभ्यास चिंतन मंथन रत चिरंतर
खंडन मंडन मां हरायात धुरंधर

संदर्भ सप्रमाण शाश्वत अधिष्ठान 
उभार्यात नवानवा जीवन प्रतिष्ठान

जो प्रकाशित साहित्य प्रसवार्चन
नेमकवानी मन जीवन को सृजन

पोवारी झाडी संस्कृती को पुनरूत्थान
जीवन उत्तरार्ध को नवा अनुसंधान

ज्ञानमय जीवन सत्य की खोज
नहीं कोनतो धारा प्रवाह को बोज

नवागत सृजनकारला मार्गदर्शन 
मार्मिक मंथन हेरसेव पथदर्शन..

सत्यवचन प्रत्यक्ष रचना को सर्जन
निराला साहित्यऋषी करू मी अर्चन

चीर प्रवास साहित्य जगत मां नीत
गाव जिला प्रांत देश संग नव प्रीत

शाश्वत प्रशासन को कर्यात संवर्धन 
पेल्यात सामान्यहित साठी वु गोवर्धन....

शाश्वत जीवन साकार कर रह्या निर्मळ
पथदर्शक सिद्ध सेव् जसो शुद्ध जल.....

रहो निरामय सतेज जीवनभर
देनं दिशा असंख्य नवपथकर....


रणदीप बिसने
सिंदीपार

       

श्री:-लखनसिंह कटरे

महाकाय वटवृक्ष
छाया से गरद
माहामाया गडकालीका
माँ वाग्देवी को वरद

सेवाव्रती वटवृक्ष
अपराधी से नाव
भू मा का अनंत उपकार
देत जासेत छाव

अॅड लखनसिंह कटरे
गाव बोरकन्हार
महाराष्ट्र को माती का
सेत साहित्य का कनार

झाडीबोली का ऋषी
जीवन से योगी
वाचन लेखन आवड मोठी
भागिरथी वैरागी

तपोवन को भूमि मा
मा पोवारी,मराठी को तप
चीर प्रवास साहित्य जगत को
सत्य भाव को निरंतर जप

कडू गोड अनुभव का
एक मोठी चट्टान
सुख दुःख का वारा सोसे
कर्मयोगी को वरदान

पोवारों का शान
मा पोवारी का सृजनहार
संस्थापक, संचालक
करसेत नवा नवा शृंगार

तलावोंको जिल्हामा
साहित्य का समुद्र
झाडीबोली का २७ आयोजन
मिटी बोलीभाषा की काळी रात्र

गुरु,प्रशासक, महर्षी
प्रवास चालू निरंतर
वटवृक्ष को छाव मा
अज्ञान होये छूमंतर

आठ मराठी, एक हिंदी
पोवारी मा एक किताब
अकरा पुस्तक,अनेक लेख
जय हो साहित्य का नवाब

प्रमेय,जाणिवेतले कर्कदंश
शब्दार्थाचे आधार निष्फळ, कवितासंग्रह
एकोणिसावा अध्याय
गाजेव कथासंग्रह

लेक नि विवेक ( संकीर्ण संग्रह)
आखिर बचता तो अंधेरा ही है
पोवारी साहित्य मंजूषा,इति.दृष्टीगत नहीं
दिर्घ कविता को हिंदी मा अनुवाद है

अक्षरयात्रा,थिंक महाराष्ट्र
महा.टाईम्स,प्रतिष्ठान,खेळ
माँ पोवारी का कविता लेख
जमाईन महाराष्ट्र भरमा मेळ

इतिहास आढळत नाही
ईनकी दिर्घ कविता
सरकते आहे वाळू
या आवनेवाली सरिता

आय रही से धारा
औरस चौरस लेख संग्रह
अवरुद्धलेल्या रुंद वाटा
सुंदर कविता संग्रह

दिर्घ निरंतर प्रवासी
साहित्य सृजन अभिलाषी
समाज शिक्षक ' *अपराधी*'
सेवा धर्मी अभ्यासी

जय जय माँ भारती
तोरो पुत्र महान
हर जन्म मा गुरु रुप मा भेटे
दे मा यन शेशू ला वरदान


शेषराव वासुदेव येळेकर
सिंदीपार
दि. ०८/०४/२१


आदरणीय कटरे सर
ग्रंथप्रिय व्यक्तीत्व
कर्तव्य कठोर स्वभाव उनको
शब्द शब्दमा् सत्व।।

घरमा् से पुस्तकालय
केत्ताक मासिकका वाचक!
उनक् पुस्तकक् शीर्षकमा से
गहन तत्वचिंतक।।

इतिहास आढळत नाही कि
भइ बउ चर्चा।
एकोणिसावो अध्याय, प्रमेय
मौनला फुटसे वाचा।।

'आखिर बचता तो अंधेरा ही है'
'आदिम प्रकाशचित्रे' न्यारो
'जाणिवेतले कर्कदंश ' वय
उद्बोधक साहित्य सारो।।

कीर्ती अमर साहित्यलक्
कदर बेहन् होये
वाचन लेखन चिंतन संगसंग
उनकि प्रेरणा भाय्।।

पालिकचंद बिसने


ऋण साहित्यिक गण को

ज्येष्ठ साहित्यिक . लखनसिंह कटरे मंजे मराठी, पोवारी, झाडीबोली, हिंदी साहित्य क्षेत्रका अजातशत्रू व्यक्तिमत्व. येनं व्यक्तिमत्वनं आपलं प्रतिभाकं जोरपर साहित्य क्षेत्रमा आपलो खुदकी असी एक अलग पहचान बनायीसेन. आपलं निजी जीवनमा एकपर एक संकट झेलस्यानबी अज पहाळ सरीको अडिग रवनेवालो साहित्यीक आपलं पोवार समाजसाती भूषण सेती.

अॅड. लखनसिंह कटरेजी इनकी कविता लिखनकं शैलीका साहित्य क्षेत्रमा अनगीनत दिवाना सेती. उनकी कविता हर बाचकला खुदको अर्थ देनको स्वातंत्र्य देसेती. बाचक आपलं क्षमता अनुसार कविताको अर्थ हेळसे. येनं कारणलका उनकी एकच कविता हर बाचककं अंगलका अलग अलग अर्थानुवर्ती होसे.

आ. कटरेजी मराठी साहित्य जगतमा एक आदरणीय साहित्यिक सेती. वय जसा मराठीमा रमसेत. तसाच वय हिंदीमाबी मूक्त विहार करंसेती. झाडीबोलीकं संगच मायबोली पोवारीको उनला अधिकच लळा लगीसे. उनकं मार्गदर्शनमा अज साहित्यिक प्रेरणा लेयस्यान पोवारी साहित्यकं सृजनमा लग्या सेती. झाडीबोली साहित्य संमेलनका अध्यक्षपद, झाडीबोली साहित्य संमेलनको यशस्वी आयोजन, पोवारी साहित्य संमेलनको आयोजन असो संघटनात्मकं उनकं कार्यकी अलग छाप पळी से. उनकं हातलका साहित्यको सर्जन असोच होत रहो या मनोकामना......गुलाब बिसेन


 ऋण साहित्यिक गण को

समाज का सेव ,प्रेरणास्त्रोत तुम्ही,
महामाया गढकालिका को, वरदान,
लखनसिंह कटरे से,नाव उनको,
मन मा बसी से,पुस्तक को ग्यान।।

भूत भविष्य की, होसे पहचान,
सत्य की रेखा,चमकसे,
हिंदी,मराठी, पोवारी मायबोली,
अनेक भाषा मा, ग्यान देसे।।

कविता ,कथा संग्रह,सेत प्रसिद्ध,
चित्र, काव्य को ग्यान होसे,
लेखनी से,तुमरी अद्धभुत,
मन को भावला,मान देसे।।

साहित्य की सेव ,पहचान तुम्हीं,
अनेक काव्यसंग्रह,सेत प्रसिद्ध,
बनो सब, प्रतिभाशाली,
असी तुमरी लेखनी,करसे व्यक्त।।

 कु.कल्याणी पटले
 दिघोरी,नागपुर

              ऋण साहित्यिक को
आदरणीय ॲड. लखनसिहजी कटरे पर अष्टाक्षरी काव्य
       लख लख भरी खणी

सदोदित लेखणी ज्या
लेखनकी धार धरे
साहित्यका जाणकार
लखनसिंह कटरे ||१||

तज्ञ तूमरी लेखणी
लख लख भरी 'खणी'
खन खन अगाजंसे
शेष मुकुटको मणी ||२||

खुद सरसोती माय
जिभपर बिराजंसे
शब्द शब्दमा अमृत
गंगा ज्ञानकी बव्हंसे ||३||

धर्म अध्यात्म विज्ञान
रूढी रीती परंपरा
मूर्त रूप विश्लेषण 
ज्ञान विवेकको झरा ||४||

अविरत बाचनको
छंद तुमला भलता
कलमकी शाई भरं 
बोली भाषाका खलता ||५||

भूत वर्तमान भावी
विचारको समीक्षण
गद्य पद्य विडंबन
सत्य को रेखा चित्रण ||६||

विदर्भको साहित्यकी
होये पायजे पैचान
वोको साती सबकूछ
तीव्र मनमा तहान ||७||

झाडीबोली परंपरा
हिंदी मराठी पोवारी
डझनभरकी पुंजी
तरी लेखन से जारी ||८||

लिपी बिना पोवारी ज्या
बोली मिठी अना शुद्ध
मंशा तुमरी पवित्र
करो बोली लीपिबद्ध ||९||

तुम्ही आलराऊंडर
उच्च विद्याविभूषित
जसो बोली जतनला
अवतरी से प्रेषित ||१०||

कई क्षेत्र पारंगत
कई पद विभूषित
गझेटेड ऑफिसर
कई माती परिचित ||११||

ज्येष्ठ तज्ञ साहित्यिक 
कई सत्कार सन्मान
तरी पाय जमीनमा
नहीं तिरको गुमान ||१२||

घर रोजीको कर्तव्य
संग मित्र रिस्तेदार
समन्वय साधक्यारी
तेज कलमकी धार ||१३||

झेलकन एकहाती
कट क्रूर प्रकृतीको
बन ध्यानयोगी साध्य
संवर्धन संस्कृतिको ||१४||

कट टरेव हारेव
तूमी तं कुशलक्षेम
धन्य तुमरी तपस्या
धन्य वू निर्व्याज प्रेम ||१५||

एक लक्ष्यमा अडिग
दीर्घ कर्मकी परिधी
नम्र ऐटदार सिंह 
कहलावं "अपराधी" ||१६||

नहीं मती मोरी सिद्ध
केत्तो करू गुणगान
पामर मी नासमझ
करो मोला क्षमा दान ||१७||

डॉ. प्रल्हाद हरिणखेडे "प्रहरी"
उलवे, नवी मुंबई
मो. ९८६९९९३९०७
श्रणी साहित्य गण का आम्रो

तुम्ही सेव अम्हरो
 समाज को साहित्य ला वरदान,
कहु कसी करु कसो तुम्हरो उपकार को बखान,
आदर सहीत चरण वंदन करु स्वीकारो अम्हरो प्रणाम,
वोन गांव की माटी ला से वंदन जहा जन्म भयो आदरणीय जी
तुम्हरो ,
वोन माय ला नमन करु जेका सेव तुम्ही लाल 

कसी व्यक्त करु मन की दसा   कौन सो शब्द जोड कर बोलु 
बस दुही कर जोड करू सु शत शत चरण वंदन नमस्कार,

 मोरो राम राम आदरणीय लखन जी कटरे 
साहित्य का तुम्ही सिपे सालार
विद्या बिसेन 


आमरण आमी ऋणी 

स्वाभिमानी ज्ञानवंत 
सरोसती कृपावंत 
सद् विवेकी धारमा 
वैचारिक आसमंत//

लेखनीको धारपरा 
साहित्यकी सृजनता 
शब्द पल्लवी सुगंध 
चैतन्यकी फलश्रृता//

हिंदी,मराठी,पोवारी 
झाडीबोली शब्द लता 
साहित्यिक प्रांगनमा 
कलाकृती सांग गीता//

कर्म, कर्तव्य का धनी 
साहित्यका महामुनी 
दंडवत चरणमा 
आमरण आमी ऋणी//

वंदना कटरे "राम-कमल "
[

           ऋण साहित्यिक गण को

श्री.लखनसिंह कटरे (अपराधी)

साहित्य का भगिरथ
मोरो झाडी का कवी
कला सृजन तपस्वी
सकारात्मक उर्जा का रवी

सेवाव्रती अपराधी
अहंकार को तोडन बंध
साहित्य सृजन, समाजसेवा
निर्मल,निरामय बहतो गंध

शेषराव येळेकर
दि. ०८/०४/२१
साहित्यिक श्री लखनसिंहजी कटरे इनको हिंदी लेख मै, मेरा गुस्सा और बदलाव को पोवारी अनुवाद 

               मी, मोरो गुस्सा अना बदलाव ...!

     मोरो बिह्या को पयले मी, लखनसिंह बहुतच गुस्सेबाज, terror, अना शीघ्रकोपी होतो. मोरा अजी (बाबूजी), माय, भाऊ-बहिन, रिश्तेदार, नौकर-चाकर, दोस्त-संगी, गाव का लोक, सपाईजन मोरो येन स्वभाव को कारण मोरोपासुन हमेशा कतरात होता.

       जब मोरो बिह्या जुळेव तब मोरो पक्को संगी कमलसिंह पटले को गाव-पुतण्या मोरो होनेवालो स्यागील खापा को तिलकसिंह पारधी इनको घरच रव्हत होतो, ओन कमलसिंह को तोंडलक मोरो यव "परीचय" आयककन होतो. ओन खापा मा तिलकभाऊ अना लक्ष्मीदिदी ला मोरो यव "परीचय" देईस अना लक्ष्मीदिदी न् मोरो यव "परीचय" मोरी होनेवाली पत्नी उषा ला देईस अना संभालकर बर्ताव करनसाती सल्ला देईस. येन प्रकारलक मोरी पयचान होत रही अना येकोमा कायी अतिशयोक्ति भी नोहोती.

         जून 1982 मा मोरो बिह्या भयेव. मी बिलकुल बेरापर मांडो मा पोहच गयेव. संगमाच इंद्रादिदी को बिह्या भी होनेवालो होतो, उनको नवरदेव रविन्द्रभाऊ, जेव थोडो टाईम लगावत होता, उनलाबी लवकरच बिह्या को मांडो मा आवनो पडेव. आखिर बेरापरच बिह्या लग्या. दुसरो दिवस सकारीच मी कारलक सौ.उषा को संग (करोली भी संग होती) वापस जात होता. उषा ला उंदोको कारणलक झोप लग गयी अना ओको मस्तक झोपमाच मोरो खांदापर टिक गयेव. मोरोसाती यव एक अद्भुत, अद्वितीय अना एकदम नविन/अनबुझ अनुभव होतो.  अचानक मोला मोरो स्वभाव मा बदलाव महसूस होन लगेव. येन वाक्यमा अंशमात्र भी अतिशयोक्ती या झुठोपन नाहाय. 

     धीरु धीरु मोरो स्वभाव मा बदलाव आवन लगेव. एक टुरी ज्या आपलो माय-बाप, परिवार की लाडकी रव्हसे, अचानक एक दिवस "आपलो सबकुछ" त्यागकर/सोड़कर एक बिलकुल नवो माहौल अना परिसर मा आय जासे. तब ओको "थोडोसो साथी" सिर्फ ओको पतीच रव्हसे. सासु-सुसरा, देवर-नणंद, दुसरा परिवार का सदस्य ओकोसाती एकदम "पराया" रव्हसेत, येन व्यावहारिक सत्य ला कई-बार वर-पक्ष समझ नही सक. गंभीरतालक सोचनो पर या सब परिस्थिती अना नवरी की मानसिक स्थिती समझनो मा आमी सफल होय सकसेजन. जेव व्यक्ती अना परिवार येन स्वाभाविक, natural वस्तुस्थिती ला समझ अना झेल नहीं सक, उनला "बिह्या" करन को अधिकारच नहीं रव्ह, या मोरी postulate (मान्यता) से. असो व्यक्ति अना परिवार न् बिना बिह्याकोच आपलो मनमर्जी लक आपलो जीवन बितायेव पाहिजे, उनला कोनी टुरी अना ओको परिवार ला संकट मा टाकनको अना उनको जीवन बर्बाद करनको काही अधिकार नाहाय. यव #BitterReality (कटु-सत्य) से; येकोसाती टोचे जरूर!!

       बिह्या को बाद टुरा या टुरी को आपलो माय-बाप को प्रति प्रेम अना आपलोपन कमी नही होय, पण उनको प्राथम्य-क्रम मात्र अवश्य बदल जासे अना बदले भी पाहिजे. बिह्या को बाद टुरा ला आपलो पत्नी को प्रति अना टुरी ला आपलो पती को प्रति प्राथमिकता देयेवच पाहिजे, नहीं त् ओन टुरा/टुरी न् बिह्या नहीं करेव पाहिजे, येन बिह्या सारखो पवित्र दस्तुर ला बदनाम करनको उनला अधिकार नही रव्ह/नही रहेव पाहिजे. जिनन भी मानसशास्त्र, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, राजनितीशास्त्र (उदा.Every thing personal is political), मानुस को जीवशास्त्र आदि को जरासो भी अभ्यास नहीं करीसेन, वय अज्ञानवश येन निसर्ग-सत्य ला समझनो मा स्वयं मा असमर्थच रव्हसेत, यव दुर्भाग्यवश अना मुर्खतावश #BitterReality (कटु-सत्य) च आय. 

      त् मी मुख्य विषय लक भटक गयेव का? जी नही! मी मुख्य विषय परच सेव. जसो मीन् येको पयले लिखीसेव, जून 1982 को बाद मी धीरुधीरु मोरो अत्यधिक गुस्सेबाज स्वभाव मा बदलाव आनन को प्रयास मा जुट गयेव. What is constant in the world is only "CHANGE". येन निसर्ग सत्य ला अपनायशान मी आपलो स्वभाव ला बदलनको प्रयास करत रहेव. डिसेंबर 1983 मा मोरो पयली टुरी को आगमन भयेव, मी अनखी तेजी लक बदलन लगेव. सप्टेंबर 1985 मा मोरो दुसरो टुरा को आगमन भयेव, मी अनखी भी तेजी लक बदलने लगेव. आता मोरा सब प्राथम्य-क्रम पत्नी-टुरा-टुरी भय गया, जेव पुरो तरिकालक Natural होतो/से! पण मोरा माय-बाप, भाऊ-बहिन, आदि परिवारको सदस्यको प्रति मोरो कर्तव्य अना आपलोपन/प्रेम कम नही भयेव, यदि असो भयेव रव्हतो त् मी मानुस कव्हनलाईक नहीं रव्हतो! परंतु उनको प्राथम्य-क्रम आता बिलकुल Natural तरीका लक बदल गयेव, जेव मोरो द्विदल-बहुदल-कर्तव्य ला अनखी अधिक दृढ करत गयेव. 

      येन संदर्भ मा एक बात अवश्य कहुन/दोहरावून की, "बागवान" या "नटसम्राट" मा संतान परच जेव पुरो "दोष" थोपनो की जबरदस्ती(!) करी गयी से, वा सत्य नाहाय, परंतु सत्य को एक पहलू मात्र से. आपलो जीवन जगन को बाद भी यदि मी आपलो संतान ला आपली Property (धन-संपती) मानकर उनको जीवन मा अनावश्यक दखलअंदाजी अना मनमानी(!) करन लगून, तरी भी संतानलाच दोषी मानन को वर्तमान प्रचलन भविष्य मा भयानक/भयावह रूप लेय सकसे, यला भूलेव नहीं पाहिजे!

           समय अना परिस्थिती तथा वास्तविक वस्तुस्थिती को साथ जेव व्यक्ती, माय-बाप, भाऊ-बहिन, पती-पत्नी, देवर-नणंद, या कोनी भी परिवारको सदस्य आपलो अंदर बदलाव स्वीकार नही कर सक, आपलो स्वभाव तथा बिचारमा बदलाव नहीं आन सक, वु निसर्ग को व्याख्या को हिसाबलक "मानुस" नही होयकर "जानवर" मात्र रयजासे! वु जानवर की व्याख्या ला चरितार्थ करन लगसे!
     I know it is very very Bitter, but it is very very True also. And hence I called it as #BitterReality. (मोला मालूम से की यव बहुत कटु से, पण यव सत्य भी से. अना येकोसाती येला कटु-सत्य कसेत.)
@लखनसिंह कटरे, बोरकन्हार(झाडीपट्टी)-441902.
 पोवारी अनुवाद:- इंजि. गोवर्धन बिसेन, गोंदिया 
 मो. 9422832941

 ऋण साहित्यिक गण को

गोंदिया जिल्हा तालुकाआमगाव
वहा सें बोरकन्हार गाव
मोहन कमलाको संसारमा फुलेव
कुसुम वोको लखनसिंह नाव
हो जी जी रं जी जी जी

रूप राजबिंडा बुद्धिमा चतुर
भर होतो साहित्य गणितपर
प्रथम श्रेणी जिल्हाप्रमुख पदपर
आरूढ भया क्षेत्र पणन सहकार
मोठो आदर्शवादी उषाबाईको भ्रतार
हो जी जी रं जी जी जी

काव्य कथासंग्रह का रचनाकार
चलसे बडी तेज लेखणी की धार 
झाडीबोली साहित्य संमेलनकार
वाचन ग्रहण वृत्ती सें भयंकर
उनला सें सरस्वती को वरद वर
हो जी जी रं जी जी जी

विद्याविभूषित सृजनकार
अभ्यासक ना समीक्षक धुरंधर
अपराधी नाव धारण कर करं 
करंसेती  उपदेश मार्गदर्शनपर
पोवार समाजका आभूषण थोर
 सें धन्य धन्य कटरे परिवार 
हो जी जी रं जी जी जी
                       शारदा चौधरी
                            भंडारा

Thursday, April 8, 2021

साहित्यिक सौ छाया सुरेंद्र पारधी


        

सौ छाया सुरेंद्र पारधी
संभालके घरकी जबाबदारी
दुय टुरीनला हुशार बनाईस
निस्वार्थ मनलका मोरो सखीन
पुरा कार्य लीलया पेलीस

वाचन की आवड जपके
साहित्य की धुरा संभालीस
आईपण उत्तम तरीकालका पेलके
लेखणीकी चुनुक देखाईस

सोज्वळ, निर्मल मन वोको
हासरो चेहरा सदैव रव्हसे
भुरळ टाकसे चतुराईलका
लोभसवानो रूप दिससे

सखी लाभीसे साहित्य क्षेत्रमा
आपुलकीको रीस्तो से
ऋणानुबंध असोच रव्हनदे
यवच गढकालीका चरणमा मांगनो से

मैत्री फुली पोवारी साहित्य उत्कर्ष मा
बहर आयेव नातो मा आमरो
असाच मीलन दे रीस्ता नाता
साहित्यक वारी मा मोरो

सौ.वर्षा पटले रहांगडाले
बिरसी आमगांव
जि. गोंदिया

ऋण साहित्यिक गण को
सौ.छाया सुरेंद्र पारधी

साहित्यिक - श्री मती छाया सुरेंद्र जी पारधी
इनको नाव माच से छाया
आपलो लेखणी लक पोवारी
 बोली ला देसेत काव्य रुपी छाया
 शिक्षिका का इन को व्यवसाय
ज्ञान रुपी तेल देयकर असंख्य ज्योती 
घर घर प्रकाशमान कर
कर सबला ज्ञानी बनाव सेती
ऋणी से इनको पोवार समाज
असंख्य कविता पोवारी मा लिखिन
 ऋणी से पोवार इतिहास साहित्य अना उत्कर्ष  समूह
 Chandrakumar sharnagat
 साहित्य अना उत्कर्ष द्वारा आयोजित
बस्तरवारीय उपक्रम
सौ. छाया सुरेंद्र पारधी पर चारोळी

                   ऋण साहित्य गणको 
 पोवार इतिहास साहित्य अना उत्कर्ष द्वारा आयोजित बस्तरवारीय उपक्रम
दिनांक: ०१.०४.२०२१
सौ. छाया सुरेंद्र पारधी पर अष्टाक्षरी काव्य

सबकीच बडीबाई

सबकीच बडीबाई
पुण्यवान छायाबाई
माया देनेवाली आई
जसी वैनगंगा माई ||१||

सदा लगं जेको मन
परंपरा संवर्धन
करं साहित्य सृजन
अना संस्कृती जतन ||२||

पोवारी शब्द भंडार
तीन भाषाको आगार
प्रपंचको तू आधार
माय बापका संस्कार ||३||

तोरो जीवन संघर्ष
सब झेलीस सहर्ष
तरी मनमा प्रकर्ष
भयो घरको उत्कर्ष ||४||

मृदू भाषाकी भूषणा
सुस्वभावी तू सुगुणा
भरी मनमा करुणा
यव पोवारीको बाणा ||५||

नीज समाजको मणी
रूप गुणमा देखणी
तोरो हातकी लेखणी
बने आमला पर्वणी ||६||

डॉ. प्रल्हाद हरिणखेडे "प्रहरी"
उलवे, नवी मुंबई
मो. ९८६९९९३९०७

सौ. छायाबाई पारधी
  

मी का करू बखान 
सब गुणईनकी खान, 
छायाबाई पारधी ला 
हात जोडकर प्रणाम. 

बरबसपुरा को माहेर 
ससुराल सिहोरा की, 
सुसंस्कारी, गुणी शिक्षिका 
कवियित्री तीन भाषा की. 

रहांगडाले की टुरी 
बहू पारधी परिवार की, 
सुरेन्द्र भाऊ की नवरी 
माय सृष्टी, समृद्धी की. 

पोवारी, मराठी, हिंदी 
मा लिखसे कविता, 
जसी पोवारी बोली की 
निर्मल, चंचल सरिता. 

                      - चिरंजीव बिसेन
                                  गोंदिया


मुक्तायन काव्यप्रकार मा

कवयित्री सौ. छाया सुरेंद्र पारधी

मोहक प्रसन्न, आनंदी
सुगंध दरवळत होतो नभी
मी कहेव फूल ला का योव तोरो?
नही बापा ,देख साहित्य निशिगंधा
वा छाया बाई तुमरं सामने से उभी

खेलता बागळता स्वछंदी पशू पक्षी
सांगत होता पुरुषार्थ इतिहास कहानी
जायकन बिचारेव कसो बडेव येतरो ज्ञान?
राहांगडाले परिवार की कन्यारत्न
वा काव्य सरिता समाज शिक्षक कल्यानी

काव्य जतरा की भागीरथी
राहांगडाले परिवार की शान
मी कहेव,फैलेव प्रकाश कसो?
दुय घरं प्रकाश देने वाली
१९९९पासून बनी पारधी घर को मान


काव्य लेखन, ललित ,स्फूट लेख
प्रभुत्व से मराठी,हिंदी,पोवारी
प्रतिभा का वलय उमट्या कसा?
तब भूमिका दिसी भाषा उत्थान को परिस
तेजःपुंज छायाबाई प्रतिभा धन की वारिस


शेषराव येळेकर
दि.०१/०४/२१

कवयित्री--छायाताई पारधी
 टपोरा डोरा गौर वर्ण 
पुनवा को चांद सम मुखचंद्र
रहांगडाले परिवार की कन्या
भ्रतार शोभंसें सुरेंद्र
 
छाया मोठी सद्गुणी 
साहित्य सृजनकार
पोवारी साहित्य जत्रा की
निर्माती रचनाकार

मिलनसार स्वभाव ना
 वानी मा सें मधुर
परिवार ग्रुप मा छलकावं सें
माया ममता को पूर

आय एक अनमोल हिरा
आमरो त्रिवेणी मा को
चमकाये नाव एक दिन
पोवार उत्कर्ष ग्रुप को

         शारदा चौधरी 
              भंडारा
 ऋण साहित्यिक गणको

 कवयित्री--छायाताई पारधी


पोवार समाज से, सबदून न्यारो
संस्कृती वत्सल माई।
असिच आमरी से कवियत्री
गुणीच छायाताई।।

से शिक्षिका ,छंद वू लेखन
वाचन मनन चिंतन
यको परिणाम आमी करसेजन
पोवारी जत्राको मंथन।
अल्पकालमा् उडान भरीस ,पोवारी गगन भरारी।।१।।असिच---

पहचान होसे, हर व्यक्तीकि
वक् साहित्य परलका्
अंतरमनबि साफ दिखसे
प्रेमबि बोलिपरका्
धडधड वा पोवारी बोली,हिंदी मराठी गाई।।२।।असिच --

उज्वल भविष्यकि,से कामना
भेटे ससुरको छत्र
होय सेवा दिव्य संस्कृतीकि
निखरे शिक्षणक्षेत्र।
साथमा् सेजन आमी साराजण,
करो सृजन नवो कायी!।।३।।
असिच आमरी से कवयित्री
गुणीच छायाताई
गुणीच छायाताई

पालिकचंद बिसने सिंदिपार(लाखनी)

छाया
रात आवनेवाली से ,सूर्य रंग बदलावत होतो
भावना को मंच ,कातरवेळ मा सतावत होतो

सुरज सात रंग बिखारके, धरती सोनेरी भयी
भीष्म प्रतीज्ञा तोडकन मिलन ला बुलावत होतो

पालतो घागर मा पाणी भरकन् थकेव मणूष्य
अहंभाव को अंधकार ला रोज सजावत होतो

नाव को झेंडा गाडन झेंडा रंग ढुढकन भयोव
अहंभावी लतपत नाव की पुंगी बजावत होतो

मी रहू या ना रहू सात पिढी पुरे येतरी कमावू 
मुर्दा को टाळू परकी लोणी खानो वू शिकावत होतो

शेषराव येळेकर
दि ०२/०४/२१
 चारोळी 
माय-अजी की पुण्याई 
घरं जनमी बाई 'छाया '
हातकं लेखनी मा प्रगटी 
भाषिक साहित्य की माया  //

वंदना कटरे "राम-कमल "

एक एक शब्द अनमोल ढुंढके
बाई रोज सजावसे या पोवारी
प्रेमभावलक गणगोत जोडके
बडीबाई मनावसे दसरा दिवारी

ऋतुराज

पोवारी को अलख जगाव
लेख साहित्य की शृजनकार
अशी सुसंस्कृत छायाताई 
लेखणी चले जसी सरीताकी धार
             
डी पी राहांगडाले 
     गोंदिया

छायाबाई का उपकार

गयेव मी छायाबाई घर चाय पिवन
पोवारी जत्रा फेसबुक पर देखशान ।
मोरो अंदर को सुप्त कवी जगाईस 
पोवार इतिहास समुह मा जोडशान ।।
इंजि. गोवर्धन बिसेन, गोंदिया
       मो. 9422832941
         
पोवारी अलक जागृत
 छायाबाई सृजनकार
 सुसंस्कृत बाणा उनको
 भाषा संस्कृती जाणकार

     रणदीप बिसने

 लाजवाब तोरी हसरत
प्रपंच अना रोजीरोटी
तार परकी कसरत
दूही संग साहित्य सृजन
लाजवाब तोरी हसरत

डॉ. प्रल्हाद हरिणखेडे "प्रहरी"
उलवे, नवी मुंबई
पोवरी साहित्य सरिता
असी आमरी छाया बाई
मराठी,पोवारी, हिंदी मा लिखसे
या समाज शिक्षक साहित्यिक माई

शेषराव येळेकर

 पेशा उनको शिक्षा को 
ममत्व हृदय मा उनको 
शब्द कम पड जासेती
जिवन दर्शन साती उनको

                  - सोनू भगत

श्रावण बाळ 57






श्रावण बाळ

अंध माता पिताकि
करिस सेवा भक्ती
श्रावणबाळ नाव वको
वु आदर्शकि मुर्ती।।

काशीतिर्थला नेत होतो
कावळमा उनला
जंगल होतो भयान
तरी बिवत नोहोतो रातला।।

बाळ होतो श्रद्धावान
मातृपितृ भक्त
कर्तव्यलाच धर्म कव्
त्याग सेवाच फक्त।।

तहान लगी मायबापला               
गयोव पाणीसाठी।
दशरथ राजाबि आयोव होतो
शिकारकरणसाठी।।

बुडबुड आवाज गयोव दशरथला
सोडिस बाण लगेव श्रावणला
पछतायोव दशरथ पिठे मस्तकला
श्रावण कसे देवो पाणी मातापिताला।।

आजबि से आदर्श श्रावण 
लेबि गुण वका
ईश्वरबि मंग प्रसन्न होय
बिना पुजापाठलका।।

पालिकचंद बिसने
सिंदिपार (लाखनी)

पोवारी इतिहास साहित्य अना उत्कर्ष द्वारा आयोजित
 काव्य स्पर्धा  क्र. ५७
 तारीख :- ४/४/२०२१                 
रोज :- इतवार
   श्रावण बाळ (चाल-मेरे मन डोले)
                        
शशांतनु पिता, ज्ञानेश्वरी माता। बेटा श्रावण कुमार रे,
माय बाप क चरण मा  //धृ //

रात दिन उनकी सेवा कर, मानकर भगवान
आज्ञाकारी बेटा श्रावण,का करु ओको बखान
तिरथ करावन मायबापला, भयगयेव तयार रे //१//

दुय सेनोळी की कावळ बनाईस,बांधीस गाठण गाठी
ओन्ज्या बसाईस मायबाप ला,तीरथ करावंन साठी 
खांदपर कावळ,चले तिरथला तपन भरमार रे//२//

फिरतफिरत तिरथ करावत, चलेव श्रावण बाळ
मायबापला तहान लगी, जसो आयगयेव काळ
कावळ ठेईस झाळ खाल्या,चले तराक पार रे //३//

झारी बुळाईस पाणी मा, वा आवाज बुळबुळ कर
टपेव होतो राजा दशरथ, तब  ओन चलाईस तीर
हायबाप करशान तळफळ बाळ श्रावण कुमार रे //४//

सांगीस हकीगत दशरथ राजाला सोळ देईस प्राण 
मालुम भएव मायबापला त्यागीन उननभी ज्यान
मातृ पितृ की सेवा करशांन भयेव वु अमर रे  //५//

 माता पिता की सेवा करो भेट जाए गा  मेवा
नहीत बादमा पस्तानो पळे मंग करो देवा देवा
नोको दुराओ मायबाप ला सुखी होय संसार रे //६//
                       
डी पी राहांगडाले 
      गोंदिया


 श्रावन बाळ

ले बांधकन कावळ चलेव श्रावन बाळ
माँ बाप की सेवा करे,ना जपे कोनती माळ

अंधा होता माय बाप श्रावन बाळ बनेव दृष्टी
तिर्थ यात्रा मा सांगसे माय बाप ला सृष्टी

तहान लगी गरा सुखेव बेटा पाणी पाज
बाळ श्रावन निकलेव पाणी ला न करता आवाज

बुळ बुळ करे घागर धारन करत होती पाणी
काळ को तिर निकलेव संपी जीवन कहाणी

पाप भयोव दशरथ हात, पाणी पाजन बनेव बाळ
अंध माय बाप समज गया नोहे आपलो श्रावन बाळ

दशरथ वानी सांगता सत्य,माय बापन् सोडीन प्राण
श्रावन बाळ सारखो पुत्र भेटे असो दशरथ मांगे दान

हिंदू संस्कृती से संस्कारी शिक्षक
जो यन संस्कृतीला अपनाये वू बने रक्षक

शेषराव येळेकर
दि ०४/०४/२१
श्रावन बाळ

याद आवसे अज भी वा रात
गणपती उत्सव को आयोजन
राती लगी होती वहां फिलम
आतुर होतो श्रावण बाळ साती मन

राती लगी श्रावण बाळ की फिलम
मोहल्ला भर का देखन आया सब जन
लगी वा चित्रपट होती बहूत सुंदर 
देखता देखता आंसु टपकावत होता नयन

देखेव मी वु पुर्ण चित्रपट 
श्रवाण बाळ हृदय बसेव
झझकोर कर ठेयिस मोरो मण
मात पिता सेवा का होसे मी जानेव

यव कलयुग आय, यहान कोनी श्रावन नहाय
देखेव मी वृद्धाश्रम, भऱ्या पड्या होता
जिनको साती जिवण को रान करिन
वयच् आता वृद्धाश्रम मा रोवत होता।

 विरेंद्र कटरे

श्रवण बाळ

 संतान होय त अशी होय
श्रवण कुमार जशी होय||

जेकी चमक चंद्र - सूर्य जशी होय
अंध माता - पिता की सेवा देखकर
भगवान परशुराम भी नतमस्तक होय
संतान होय त अशी होय
श्रावण कुमार जशी होय||१

प्रवाशी होय त असो होय
माता - पिता की भक्ती देखकर
नाव को चालक मलाह भी
आपलो ला धन्य समझ
संतान होय त अशी होय
श्रावण कुमार जशी होय||२

मन मा संतान को चित्र होय
त अशो होय
आप लो कंधा पर माय बाप ला
कावळ मा काशी को यात्रा को चित्र होय
संतान होय त अशी होय
श्रवण कुमार जशी होय||३

मुर्तिव हो त अशो होय
श्रावण कुमार जसो होय
प्रजा को राजा ला भी
पच्छ तावा होय
संतान होय त अशी होय
श्रावण कुमार जशी होय||४

 चंद्रकुमार शरणागत

      
श्रावण बाल

तीर घुसेव सातामा 
तळफळं वू श्रावण 
मोठो पाप भूपती को 
जरी नवतो रावण//

जबं डोरा देखं सत्य 
नृप दशरथ दुखी 
विधी लिखित घटना 
कसो कोण होय सुखी//

मातृ-पितृ भक्त पुत्र 
सांगं अंतिम कहानी 
कंठ सोक्या माय बाप 
सेती झाडखाल्या रानी//

देखं तालाब जवर 
झारी भरेव सुजली 
जात होतो त् वापीस 
आयी भेटनं या 'कली '//

यात्रा, तिरथ कासीला 
लिजानकी रही ईच्छा 
पाणी पिलावं उनला 
करो पूरी या सदिच्छा//

याद करके मायला 
प्राण सोडसे श्रावण 
धन्य करतव्य भक्ती 
माय भारती पावन//

वंदना कटरे "राम-कमल "
 

 श्रावन बाळ
 काव्य प्रकार  --अभंग

         सेवा
श्रावन बाळकी,मातृपितृ सेवा
नोहोय देखावा संसार मा॥

आपला देव,माय बाप आती 
सेवा दिन राती, करोसब।

बुळगा व्यक्तीला,नाहि रव्ह शक्ती
देवकीच भक्ती, करसेती।।

श्रावनकी सेवा,संसार मा मान्य
धरतीपर अन्य, एक भयो।।

बनो असो बाळ,लेयत सकळ
बदलेव काळ,व‌द्धाश्रम।।

डोराका हे आसू ,हेच सांगसेती
सुख दुःख सेंती , जीवन मा।।

दशरध राजा, चार पुत्र को बाप
ख़रो भयो श्राप,वधकोच।।

काशीकी यात्रा,. अधुरीच रही
श्रावन की भयी,मृत्यु वहा।।

करो सेवा आता,  जगमा अमर
पुंडलिक  कर ,पितृसेवा।।


वाय सी चौधरी
गोंदिया
श्रावण बाळ

आदर्श वान वु बेटा
नाव होतो श्रावण बाळ
वोको करू मी गुणगान
तिन्ही लोकं मा होतो आदर्शवाण !१!

सेवा कर माता पिता की
देख श्यान ईर्षा करत भगवान
पुरी कर हर इच्छा माता पिता की
सुख लेत  होतो स्वर्ग समान !२!

अंध माता पिता की इच्छा
करण की होती पुरी
बनाई के टोपला की कावळ
निकल पळेव काशी दर्शन साठी !३!

धन्य रे वु  बेटा जाय पाणी आननला
लग से छाती  मा महाराजा को तीर
अंत समय मा बी दिसत माता पिता
होता वोयच वोका परमेश्वर !४!

नही देईस श्राप राजाला 
कइस पाणी पीवाय दे माता पिता ला
राजा कोबी डोरा मा आवत आसु
नमन कर राजा पितृभक्तिला!५!

भयव श्रावण बाळ अजरामर
करके सेवाभक्ती मायबाप की
आजही से योजना श्रावण बाळ
मिलसे अनाथ वृद्ध इनला आधार!६!

समाज बंधु बी मोरा आदर्श
श्रावण बाळ को जप सेती
सेवा माय बाप की मनोभाव
अंत समय वरी कर सेती !७!

 अजयकुमार लीलाधर बिसेन




श्रावण बाळ
  

श्रावण बाळ माता पिता ला, 
बसायकर कावडमा, चलेव तीर्थयात्राला. 

लगी तहान पानी नोहोतो जवर, 
कावड मडायकर झाडखाल्या, चलेव पानी आननला. 

झारी डुबाईस पानीमा, बुड बुड
भयेव आवाज, रात को समय 
राजा दशरथ समझेव प्राणी आय. 

सोडीस शब्दभेदी बाण, लगेव छातीवर, 
जोरल् किंचाळके पडेव श्रावणबाळ. 

राजाला ला धक्का बसेव, समझेव धोको भयेव, 
धावत गयेव जवर, अंतिम अवस्था श्रावणकी. 

सांगीस आपली कहानी, माय बाप की अवस्था 
ना सोडीस श्रावणन् आपलो प्राण. 
राजा दशरथ गयेव पानी धरस्यार, 
माय बाप दुही अंधरा, आवाजल् पहिचानीन् श्रावण नोहोय. 

देईन राजाला श्राप, आमर् वानी तुबी 
पुत्र वियोग मा तडपकर मरजो, सोडीन आपला प्राण. 

श्राप फलीभूत भयेव, दशरथ राजा, 
पुत्रवियोग मा स्वर्गवासी भयेव, कर्म की गति महान से 
कर्मफल अज नही त् कल जरूर मिलसे. 


                      - चिरंजीव बिसेन
                                   गोंदिया 


श्रावण बाळ मृत्यू प्रसंग
       (अष्टाक्षरी काव्यलेखन)

बाण   आयेव  आयेव
ओको  बनशान काळ ।
टाह  फोळ 'माय माय'
रोव  श्रावण  वु  बाळ ।।1।।

आयी  राजाला आयकू
ओकी करुण वा वाणी ।
जाय   जवळ,   भयेव 
ओको हृदय को पाणी ।।2।।

देख श्रावण बाळ ला 
शोकाकुल     दशरथ ।
बोल, तोला मारनला 
पापी  सेत मोरा हाथ ।।3।।

मंग    मरता     मरता
कसे राजाला  वु बाळ ।
माय बाप   बुड्ढा सेती
बस्या   बनमा  जवळ ।।4।।

होतो  लिजात  उनला
काशी  धरके  कावळ ।
तीर्थ यात्रा जात होता
वारी   करन   निर्मळ ।।5।।

पाणी आणन आयेतो
झारी   धर     तरापर ।
ओतरोमा  तोरो बाण
छेद  गयो    छातीपर ।।6।।

बाट     देखत   रहेती 
प्यासा वय प॔छीवाणी ।
सेत   अंधरा,   उनला
तुमी पिवावोना पाणी ।।7।।

सांगो नोको  दुर्घटना
जावो वांहा बन बाळ ।
मोरो  बादमा  उनको
करो  तुमीच सांभाळ ।।8।।

धरो झारी, आता जासु
ओको आखरीको बोल ।
पंछी   पिंजरा  सोडीस 
प्राणज्योत  गयी खोल ।।9।।

बाळ    भयेव   अमर
कर  माय  बाप  सेवा ।
करो ओको सम भक्ती
भेटे  आशिर्वाद   मेवा ।।10।।

 इंजि. गोवर्धन बिसेन, गोंदिया
       मो. 9422832941
         दि. 04 एप्रील 2021

   श्रावण बाळ
                        
शांतनु को पोट 
बाळ श्रावण जन्मेव
माता ज्ञानेश्वरी को 
संस्कार मा पलेव

बाळ होतो आज्ञाकारी, 
सेवा मा सदा तत्पर
रातदिन कर सेवा
देख मायबाप मा ईश्वर

मातापिता दुहि अंध
करावजो काशी की वारी
कसो लिजाऊ काशीला
बिचार पडेव वोला भारी

करीस दुय ओळगाकी कावड
देख मायबाप की आवळ
बसाईस माय अना बापला
चलेव तीरथला श्रावण बाळ

तहान लगी ऊनला वाहान
झारी धरके श्रावण गयेव
बुड बुड झारी को आवाज
छातिमा अनामिक बाण धसेव

माय माय की आर्त देइस् हाक
तब दशरथ आयेव्, फेकिस बाण
मोरो बान न लेईस निष्पाप जान
संभाळजो कयकर, सोडिस पऱ्यान

हकीकत जानकर सब
विलाप मा डूब्या वृद्ध
मस्तक पिट पिट रोवती
भया राजा पर वय क्रुद्ध

देईन राजाला उनन श्राप
नाहाय श्रावण आमरो
अग्नी देनला आमला
तसो नाश होये तुमरो

तोरो चीता ला अग्नी देनला
प्रिय पुत्र नहीं रवणको जवर
दुहिन त्यागिन आपलो पंच प्राण
चल्या दूहि स्वर्ग को मार्ग पर

सौ छाया सुरेंद्र पारधी
             श्रावण बाळ
(चाल- मनी धीर धरी शोक आवरी जननी। भेटेन नऊ महिन्यांनी)

तीर आयेव रे आयेव देखो बनके काळ
लगेव छातीमा मूर्च्छित भयेव श्रावणबाळ।।

ज्ञानेश्वरी शांतनु पुत्र।जन्मदाता का अंधनेत्र
ईच्छा उनकी तीर्थक्षेत्र।सेवाभावी वृत्ती पवित्र
          श्रावण बाळ आज्ञाकारी
          मायबापला बसायस्यारी
           निकालीस पैदल वारी
खांदपर धरिस कावळ।मूर्च्छित भयेव श्रावणबाळ

जनकला लगी तहान।खाल्या कावड ठेयस्यान
गयेव पाणी आणन।शरयू नदी काठकन
         पाणीमा डुबाईस झारी
       बुळबुळ स्वरआयकस्यारी
       शर मारीस दशरथनं भारी
लगेव श्रावनला भई तळफळ।मूर्च्छित भयेव
श्रावणबाळ

समजेव मी कोणी हरीण। मुन मारेव बाण
राजा बसेव कवन।माफ कर मोला श्रवण
         तहान्या सेती बापमाय
         जल्दी तू पाणी लिजाय
          तहान दे उनकी बुझाय
कयके देसे प्राण सोळ।मूर्च्छित भयेव श्रावणबाळ

सब हकीकत आयकस्यान।राजाला श्राप देयकन पुत्रवियोगमा सोडजो प्राण।सोडीन मायबापनं जान

              मातापिताच आत भगवान
               करो उनकी सेवासम्मान
               चरणमा उनको स्वर्गस्थान
धन्यधन्य तू लडिवाळ।मूर्च्छित भयेव श्रावणबाळ


                               शारदा चौधरी 
                                     भंडारा

Wednesday, March 24, 2021

जातो पर की ओवी

             जातो परकी ओवी
                       
 असो एक माळी गा निर्गुण निराकार
बाग लगाईस सुंदर,जो बाळा जो जो रे.//१//

रोप लगाव सुंदर,खाल्या शेंडा वर बुळ 
कलश पर sदेवुळ,जो बाळा जो जो रे.//२//

साळेतीन हातको खेत,वरत्या धर नांगर 
बैल जुपीस च्यार, जो बाळा जो जो रे.//३//

एकवीस स्वर्ग पर बीहीर,सर्वांग पाझर
माळीन सत्रावी सुंदर,जो बाळा जो जो रे.//४//

चौदावी को मुळ,वाफा सेत बाहातर 
एकविस आळा सुंदर,जो बाळा जो जो रे //५//

त्रीगुण  त्रीकुटी, चवथी जाण गा तुर्या
सबदुन वरत्या माया,जो बाळा जो जो रे //६//

ओन्ज्या उलटी गंगा,पाणी आळोपरा 
सेती त्रि देव मोरा,जो बाळा जो जो रे  //७//

सात गा चकर सप्त सागर को फेरा
माला फिर मनी तेरा, जो बाळा जो जो रे //८//

एक नारी बतीस पुऱुष,एकमाच संसार
पाच तत्व को शरीर,जो बाळा जो जो रे //९//

सबमा से भगवान,माया को पसारो
कर्म चांगला करो, जो बाळा जो जो रे  //१०//
            
डी पी राहांगडाले 
      गोंदिया


जातो पर की ओवी

     सासुरवास

जातो फिर से गरगर,पिठ पळसे भरभरा
बाई दससे तांदुर, रोटी खाय भाऊराया।।

काजक सांगु  तुमला बाई ,माय घरकी बढाई
माय घरंक माळीपरा,चंद्र सुर्य की लळाई।।

सासु करसे सासुरवास, घरधनी  नही आयक
सकार पासुन काम,करुसु पुरो   संयपाक।।

पहाट पासुन दरन दरो,झाडु मारो शेन फेको
भाडाकुंडा साफ करो, सासुका पलासा आयको।।

पहाटला कोंबडा़ बाग देसे,सासुबाई ला बाग लिजासे,
आनो राया सोळायकन,ओकी शाक बनावबिन।।
(असो राग व्यक्त करसेती)
""जय राजा भोज,जय माँ गड़काली""
वाय सी चौधरी
गोंदिया



ओवी
गाउसु बाई मी ओवी गा गाउसु
मुठ मुठ चाउर मी वाहूसु गा वाहूसु

अन को दाना येव कन कन पिसुसु 
जातो मोरो येव गा मी यव देखुसु

पिसेव पिठ फिजाउसु गा बाई फिजाउसु
हात लका रोटी मी बनाउसु गा बाई बनाउसु

सकार को नास्ता मा खासे गा बाई वु खासे
नाथ मोरो खासे रोटी गा ना खेत जासे

दिन रात मेहनत लका अन पिकावसे गा पिकावसे
तब जायस्यानी जातो मा पिठ दरसे गा बाई दरसे

~ विरेंद्र कटरे
जातापरकि ओवी

जातो परकि ओवी
मनला देसे सुकून
जातोबि देसे संगीत
जातोलकाच पिठ ना चून।।

ज्ञानेश्वरकि ओवी
तसिच ओवी आत्याकि
कस्ट कमि ओवी करसे
याद आवसे जाताकि।।

भुरुकाल् दरत होती 
कनिक वहानी सांडत होती
माय ओवी गात होती
घरमा् आनंद भरत ती।।

जातो गयोव ओवी गयि
चक्की आयि कविता भयि
फिरून आयोव जातो ओवी
इतिहास कि यादच आयि।।

जातोबि एक यंत्रच होतो
ओवी काव्यप्रकार
विकास भयोव दोनो तंत्रको
जुनो यंत्रकि जयजयकार।।

प्रेमलकाच फिरवू जातो
लिकू ओवी एकतरी
प्रेम  करु इतिहासपरा
मानवकि से महिमा न्यारी।।

पालिकचंद बिसने


 जातो पर की ओवी

पयली मोरी ओवी ग,  मोरो माता पिताला
विठ्ठलरुकमाई जोडा जसो, सोभसे पंढरीला

दूसरी मोरी ओवी ग मोरो भाई भोवजाईला
लक्ष्मीनारायण जोड़ा जसो, शोभसे वैकुंठला

तिसरी मोरी ओवी ग मोरो कुकू को धनीला
सावित्री को सत जसो, सत्यवान को जीवला

चवथी मोरी ओवी ग, मोरो सासू सुसरोला
पुण्यवान को घर आयी नमन उनको चरनला

पाचवी मोरी ओवी ग , पंढरिको पांडुरंगला
अखाडी ला वारी करू, भेटन जाऊ श्रीरंगला

सहावी मोरी ओवी ग, तुलसी वृन्दावनला
पुण्य कमाओ कन्यादान को, बिह्या लगायश्यान

                        - सोनू भगत
   
जातो परकी ओवी

पहिली मोरी ओवी सें गढकालिकाला सुमरन
आमरी कुलदैवत तू देजो लवकर दर्शन

दुसरी मोरी ओवी सें चक्रवर्ती राजभोजला
पूजसे हर पोवारजन तोला नित्य रोजला

तिसरी मोरी ओवी सें  धार नगरीला
पोवारी उगमस्थान वू  पुण्यस्वर्ग धरतीला

चौथी मोरी ओवी से आपलो जन्म दाताला
शतशत नमन करुसू आपलो मातापिताला

पाचवी मोरी ओवी सें आपलो गुरुजनला
वसा धरके उनको विद्यार्जन करून जगला

सहावी मोरी ओवी सें माय तू हर कणकण मा
माता गडकालीका की मूर्ती बसीसें मोरो मनमा

सातवी मोरी ओवी सें बाई मी दळण दळूसू
माता गढ़कालिका की ओटी नारळलक भरुसू

आठवी मोरी ओवी सें येनं जगत जननीला
आयकर सहाय्य कर मोला दळण दळणला

                                       शारदा चौधरी
                                           भंडारा
 जातो पर की ओवी 

भूमीसार प्रहरला 
जातो पर दरूसू 
केसर किरण वालो 
सूरज मी देखूसू//
मुठ मुठ दाना धीरुलक 
जातो मा टाकूसू 
गोठामाकी गाय हेडतो 
मुरली मी देखूसू //
खाली पोट जातो को 
दंडा मी फीरावूसू 
मदतीला धावणारो 
विठ्ठल मी देखूसू//
जलदी च् पीठला 
आबं मी फीजावूसू 
पसिना ला पोछतो 
बालकृष्ण मी देखूसू//
संसार पार करनला 
मेहनत रोज करूसू 
आनंदीत बेटा बेटी 
घरदार मी देखूसू//

वंदना कटरे 'राम-कमल '

ओवी
पहिली मोरी से                            
माँ गडकालि देवीला
विक्रम राजाभोज भयोव
चलबि उनक् मार्गला।।१।।

दुसरी मोरी ओवी से              
सरोसती माताला
गजानन परसन् होये
जतन भोजक् शाळाला।।२।।

तिसरी मोरी ओवी से।       
प्रणाम वीर पुरसयला
विरांगना पतिव्रता                     
उनक् त्याग सेवाला।।३।।

चौथो मोरो नमन से
राजाभोजको शौर्यला
मुघल गंगैय हैराण भया
भारतमाँक् शक्तीला।।४।।

पाचवो मोरो नमन से 
पोवार संघ शक्तीला
परिवार समजो समाजला ना्
जोळो बिकऱ्या पोवारला।।५।।

सहावो मोरो नमन से
संस्कृती रक्षक पोवारला
नेंगदस्तूर जतन करो
संघ शक्तीसे वक् मुळमा्।।६।

सातवोमोरो नमन से
सोनूभाऊक् तळमळला
मोठा साहित्यिक भेट्या यहानि
नमन ज्ञान कि गंगाला।।७।।

पालिकचंद बिसने सिंदीपार (लाखनी)


  जातो पर की ओवी

दरण बाई मी दरण दरुसू
पोट भर अन्न साठी रक्त अटावसू

जाता बाई जाता मोरो गोटा को जाता
पोट कोनशीब संग दुजा भाव को नाता

एक एक दाना बाई जाता करसे बारीक
खानको पोट एक पण बोट नहात सरीक

फिरसे बाई फिरसे मोरो जाता फिरसे
एक एक दाना पिकावन धनी मोरो राबसे

तुटी बाई तुटी मोरी कमर तुटी
पंढरी को राणा,कब पावन करजो कुठी

दाना बाई दाना नवो धान को दाना
सुटेव प्राण आता धाव गा पंढरी को राणा


शेषराव येळेकर
दि. २१/०३/२१


जातो परकी ओवी

पयली मोरी ओवी गा।
गढकालीका को चरणमा।।
विद्यादान देईन मोला।
रहु ऋणी सदा उपकारमा।।

दुसरी मोरी ओवी गा।
राजा भोज ला वंदन।।
पोवार समाज ला करीन।
उनच नंदनवन।।

तीसरी मोरी ओवी गा।
आई को गर्भमा।।
नव दिवस,नव महिना।
सोहम मंत्र जपनोमा।।

चौथी मोरी ओवी गा।
होती मी अज्ञान।।
मोला दुनीया देखाईन।
मोरो आई बाबुजीनं।।

पाचवी ओरी ओवी गा।
होती मी सज्ञान ।।
वर देखके मांगणी करीन।
मोरो पतीदेवनं।।

सातवी मोरी ओवी गा।
विश्व को देवताला।।
पतिशिवाय देव नही।
सांगुसु मी सबला।।

सौ.वर्षा पटले रहांगडाले
गोंदिया


 जातो पर की ओवी

पयली  मोरी  ओवी ग, वाग्देवी  माता ला  ।
कृपा ओकी राजाभोज ला, नमन उनको चरण ला ।।1।।

दुसरी मोरी ओवी ग, गडकाली माता ला ।
देईस शक्ती पोवारवंश ला, नमन उनको चरण ला ।।2।।

तिसरी मोरी ओवी ग, गायत्री माता ला ।
देसे सद्बुध्दी सबला, नमन उनको चरण ला ।।3।।

चौथी मोरी ओवी ग, राजा भोजदेव ला  ।
श्रद्धास्थान पोवार ला, नमन उनको चरण ला ।।4।।

पाचवी मोरी ओवी ग, मोरो गुरुदेव ला ।
सन्मार्ग देखावन ला, नमन उनको चरण ला ।।5।।

सहावी मोरी ओवी ग, मोरो अजी माय ला ।
शिस्त ना प्रेम देनला, नमन उनको चरण ला ।।6।।

सातवी मोरी ओवी ग, मोरो गुरुजन ला ।
शिक्षा देसेत सबला, नमन उनको चरण ला ।।7।।

आठवी मोरी ओवी ग, मोरो संगी साथी ला ।
जिंदगी मा विश्वास देनला, नमन उनको गुण ला ।।8।।

नववी मोरी ओवी ग, पोवार लेखक, कवी ला ।
पोवारी साहित्य लिखनला, नमन उनको लेखनी ला ।।9।।

 इंजि. गोवर्धन बिसेन, गोंदिया (बडेगांव)
       मो. 9422832941
         दि. 21 मार्च 2021

                                                                          पहिली मोरी ओवी बाई मातापिता को चरणला
सेवा करो तुमि उनकी बाई धावरे बा विठ्ठला।

दूसरी मोरी ओवी बाई, पूजनीय गुरूजनला
दूर करिन अज्ञान ला ,धावरे बा विठ्ठाला।।

तिसरी मोरी ओवी बाई, पंढरी को पांडुरंगला
जनी संग दरण दरीस ,धावरे बा विठ्ठला।।

चवथी मोरी ओवी बाई, राम लक्षुमनला
आज्ञाकारी भाई बनो धावरे बा विठ्ठला।।

पाचवी मोरी ओवी बाई अंजनी को सुतला
लंकादहन करिस वोन धावरे बा विठ्ठला।।

सहावि मोरी ओवी बाई तुलसी वृन्दावनला
दिओ लगाओ रोज बाई धावरे बा विठ्ठला।।

सातवी मोरी ओवी बाई गढ़कालिका माताला
कुलदेवी आय आमरी धावरे बा विठ्ठला।।

आठवी मोरी ओवी बाई राजा विक्रमादित्यला
न्यायप्रिय राजा बाई धावरे बा विठ्ठला।।

नववी मोरी ओवी बाई आमरो राजा भोजला
ग्रंथ लिखिन चौऱ्यांसी  धावरे बा विठ्ठला।।

दहावी मोरी ओवी बाई निसर्ग माताला
झाड़ लगाओ आता बाई धावरे बा विठ्ठला।।
      सौ.छाया सुरेंद्र पारधी

Monday, March 15, 2021

पातर रोटी काव्यस्पर्धा ५४

 पातर रोटी

मरी माय,झेंडु बाम
असो नवरा को प्यार
सबको तोंडमा एकच नाव
जसा हात सेती चार

नशीब मोरा
चूल मा लगी आग
पातर रोटी बनावसू
नहीत नवरा ओके आग

कंबर को कचूंबर
सबको बडेव खून
खलबता मा कुटनेवाली
मी भरेव घरकी बहु/सुन

कारा मणी संग डोरला
मी बिनपगारी बहु
झड्या बाल का बनसेत पैसा
निचोळणे वाला रुप बहू

सरपर पदर 
मान मर्यादा
शिकावत नहीं तरी
पहलो गुरू, माँ शारदा

विडंबना विडंबना
जीवन जगसू जपत हरी नाम
दबेव वाणी संग चलू
बस यही से काम

शेषराव येळेकर
दि. १४/०३/२१


 पातर रोटी
  

पोवारी को खास पक्वान 
इतिहास जमा होय रहीसे, 
नाव वोको पातर रोटी 
तोंडला पानी आय रहीसे. 

गहूको नेहेन कणीक ला 
बहुत मेहनत लका गुथकर, 
चिकी आयेव क् बाद मा 
लोया हात लका फैलायकर. 

कागज वानी पतली बन रोटी 
वोला माती क् फूटेव भदाळपर, 
पकायकर बनायेव जाय रोटी 
मंद मंद आचपर सेककर. 

दूध-साखर मा घीव की धार
भरपूर मात्रा मा डाककर, 
खाये जात होती शौकल् 
स्वाद बखान बखान कर. 

आता पातर रोटी भय गयी 
पोवार समाज माल् लुप्त, 
फास्ट फूड क् जमानो मा 
मोठ् होटल मा बनसेत फक्त. 

                      - चिरंजीव बिसेन
                                   गोंदिया

पातर रोटी (मांड रोटी)(चाल-चांदणं चांदणं)
                          
रोटी त sssरोटी पातर रोटी
बसी रांधनला रांधनला मायबेटी।। धृ।।

पातर रोटी को मोठो से मान
पोवारी जातीकी आय वा शान
रोटी खानकी साद लगी मोठी।। १।।

गहुकी कणिक पिसाओना
पाणीलक ओला फिजाओना
तेलको मोहोन,नरम बनावनसाठी।। २।।

घळा भोळशांन कड्‌डु बनाओ 
चुलो  पर ठेवो ईस्तो लगाओ
चुलो फुकतानी गरमी भई मोठी।। ३।।

फिजी कणिक का लोया बनाओ
दुही   हातपरा ओला  फैलाओ
कडुडु परा ठेवो शिजनसाठी।। ४।।

रोटी बनावनो ज्या बाई जानसे
ओकी  रोटी  हातपरा  तानसे
नेणत बाई क हातपरा फाटी।। ५।।

आंबाको रस नहीत साखरको पाणी
ओक संग लगसेती अमृत वाणी
जरासो नोन गा टाको चव साठी ।। ६।। 

आता पातर रोटी नामशेष होय
नवतीला रोटी कब बनावता आय
शिकाओ टुरीला रोटी बनावन साठी।। ७।।
                  
डी पी राहांगडाले 
     गोंदिया

मांडोरोटी
(अष्टाक्षरी काव्यलेखन)

मांडो  रोटी   पयलेकी
होती  पोवारी की शान !
पाहुणचार साती ओको
होतो  समाज  मा मान !!1!!

मामाजी  आवत जब
भेटन  आमरो   गाव !
माय  आमरी   परस् 
मांडोरोटी को वु ठाव !!2!!

माय चुर कणिक ला
आपट आपट स्यानी !
कर  एकजीव  घोल
पतलो   रबर  वानी !!3!!

मंडाव हांडी  पालथी
आच वालो  चुलोपर !
घोलका लहान लोया
फिराव  वा   हातपर !!4!!

कागद  वानी  पतली
मंग  हांडी  पर  टाक्!
जल्दी काहळ् काहेकी
जरे  मुन   रव्ह  धाक्!!5!!

आंबारस,   दुध  घीव 
अना साखर को पानी !
मांडो रोटी संग  खात
लग  वा   अमृतवानी !!6!!

 इंजि. गोवर्धन बिसेन, गोंदिया (वडेगांव)
       मो. 9422832941
         दि. 14 मार्च 2021

 पातर रोटी 

कोणी कसेत पातर 
कोणी कसेत या मांडा 
गहु कणिक महिन 
भिजावन साती भांडा//

तेल मोहन करसे 
मुलायम न् नरम 
फिजी कणिक लोयाकी 
रोटी कागदी गरम//

चुलोपरा ठेव कड्डू 
अंगारकी धग वोला 
दुही हातपरा फैलं 
रोटी बनावनी कला//

आई-माई तपसेत 
माया पिरमकी धार 
रोटी पातर सिजसे 
कला होसे या साकार//

आंबा रस, दुध घीव 
स्वाद आणसे रोटीला 
आयो पुरानो पक्वान
नवो पणको भेटीला//


वंदना कटरे "राम-कमल "
गोंदिया

पातर रोटी
 सबमा तालेवर पाहुणचार

पोवारी को संस्कृती मा 
आवभगत की सचोटी
सबमा तालेवर पाहुणचार
रस अना पातर रोटी ||१||

मांडा रोटी पच्या रोटी
असा भी एका नाव
जेला भेटं येको पाहुणचार
वोको मोठा भाव ||२||

आमरो पेढी को पयले होती
पातर रोटी की शान
आता वोतरी मेहनत को
नही बनं पकवान ||३||

गावमाको चुल्हो पर लक
आयी शहरमा रोड पर
रुमाली अना चादर रोटी
मिलंसे हर मोड पर ||४||

कनिकला छान करके नेहेन
दबाय दबाय चुरत
चिकी आयेव पर रबरवानी
दिसं लोयाकी सुरत ||५||

लोया फिरावत पसरावतो
दाबत हातलका
मांडा रोटी दिसं पतली
पच्या वानी बाका ||६||

चुल्हो परा उलटो भदाड
बनं सेकन को तावा
इस्तो को आचपरा देती
दुय तीन परतावा ||७||

स्वादमा चार चांद लगत जब
पडं घिव की बोटी
सबमा तालेवर पाहुणचार
रस अना पातर रोटी ||८||

डॉ. प्रल्हाद हरिणखेडे "प्रहरी"
उलवे, नवी मुंबई
मो. ९८६९९९३९०७

पातर रोटी 

कलाकारी

रोटी मा रोटी पातर रोटी
बिह्यामा  देती मोटी मोटी।।

गहूकी कणीक वस्त्रागार
कासोक भाणीमा  गोलाकार।।

मड़काको रव्ह तवा गोल
हायमा फिर रोटीको घोल।।

दुर हातकी या कलाकारी
सेकत मड़कापरा खरी।।

दुध ,गुरोनी , घिवकी धार
दोना मा खाज आम्ही

अशी होती आम्हरी संस्कृती
बदलेव जमानो नहीं बनावती।।

फास्ट फुड को यो  आयोव
माडारोटी लुप्त दोसा भयोवा।।

वाय सी चौधरी
गोंदिया


पातर रोटी

मी आव पातर रोटी
कागज सी पतली
रूप मोरो गोल गोल
जसी कुकू की टिकली

गहूं को कनिक ला
बार बार छानेव जासे
कणिक भिजायश्यान
फेटेलका चिकी आवसे

पूजा पाठ चुल्हो की
बुळगी माय करसे
कड्डो मा भुरकी काळी
धुक धुक कर जरसे

बनाया जासेत मंग लोया
हातको हातपर फिरावसेत
कागदसी पतली गोलगोल
कड्डो पर पसरावसेत

गुरो पानी आंबा को रस 
सब खासेत सपासप
आब बनावन की बदली तऱ्हा
तुम्ही भी खायश्यान देखो रपारप

सौ छाया सुरेंद्र पारधी


पातररोटी 

एक जमानो होतो वू भी यादगार
समय संग याद बित जासेती
डिजिटल नव्हतो, जमानो संसार
पल पल वय दिन याद आवसेती

मोरो समय मा नही देखेव पातररोटी
लेकिन आजी मोरी सांग असी रव्हत होती
हांडी पर बनावन की पद्धत होती
कागज सारखी पतरी होती, जाडी रव्हत नोहती

यन् जमानो की पातर रोटी देखेव मी
बिह्या, मंगलकार्य मा हवा मा देखेव मी
उडाय उडाय स्यानी बनावसेती 
शायद याद रहे पातररोटी, सोचेव मी

पातररोटी हांडी पर बनसे
शायद मोरो सोच मा फरक से
आजी को हात की पातररोटी 
अना मंगलकार्य की रोटी अलग से

उमर को अनुभव थोडो कम से
परिक्षक जी, रोटी को वर्णन कम से
लिख लेयेव थोडो बहूत वोको पर
पातररोटी भी भुली बिसरी याद से...

                    - सोनू भगत

Thursday, March 4, 2021

नारेन, नारियल ०१



श्रीकाव्य

टनक नारेन
पुजसेजन
भगवानला प्रथम सदा
आम्ही चढावसेजन

पुष्पमाला,उदबत्ती
भक्तीभाव
प्रसन्नता उमलसे लेसे
मनको ठाव

श्रावनमा रास
आपुलकीकी
सण साजरा करन
गरज नारेनकी

टनकता वरत्या
श्रीफळला
मुलायमता अंदर भरीसे
अंतरमनमा संगला

सुरुवात शुभकार्य
गणेशसंगमा
सदा मान भेटसे
नारेन डोलमा

वर्षा पटले रहांगडाले
बिरसी आमगांव
जि. गोंदिया

नारेन

गणपती मस्तिस्क
       महादेव
  न् करिस अलग
     झाड बनेव 

   होतो मस्तिस्क
        वोको
समुद्र किनारपर पडेव 
    बिज सारखो

        बिज भयोव 
             अना
     नारेन झाड बनेव
        श्रिफल सना

        देव फल
          भयो
     वू आता पुजा
      स्थानी आयो

       मंगल कार्य 
         सबमा
   वोको रव्हसे स्थान
     पवित्र स्थानमा

          - सोनू भगत 


             नारेन (नारीयल )
                 !! श्रीकाव्य!!
                           
नारेन,नहीत 
नारीयल 
सब लगाओ ओको 
ठंडोगार तेल 

पुजाक आरतीको
तानाबाना
सुनी सुनी दिससे
नारेनक बिना

त्रीनेत्र शंकरका
अनवाणी 
डोस्कापरा बूच,अन्दर
रव्हसे पाणी

माणुसक डोस्‌कापरा
केस
पाणीकी खाल्याव-या लगसे
जशी रेस

नारीयलक अन्दरको 
खोबरा
माणूसक खोपळीमा रव्हसेत
कसेत ढोबरा

नारीयलको महत्व
भारी
सबजन करो पुजाकी
आता तयारी 
        
डी पी राहांगडाले
     गोंदिया

काव्य प्रकार:- श्रीकाव्य 

नारेन

       बाहेरलक रव्हसे
            मजबूत 
    अंदरलक नरम गोड
        खानला साबूत 

         नारेनको डोल
           हवनसाठी 
     अख्खो नारेन रव्हसे
        देव पुजनसाठी 

            तिन डोरा
             नारेनका 
       जसा लगाया सेती 
        शिव भगवानका

        शालसंग श्रीफल 
              देसेती
  सौभाग्यको सुचक म्हणुन 
        सत्कार करसेती

       पिवनला नारेनको
                पानी
      अना खोबरा कच्चो 
         रव्हसे बहुगुनी

 इंजि. गोवर्धन बिसेन, गोंदिया (बडेगांव)


श्रीकाव्य
कल्पवृक्ष

गगनचुंबी झाड़
     नारेनको
उचोपर झोका फारसे
   श्रीफल बलीदेनको

मानवकी मुंडी
   ज्ञानेंद्रिये
दिससेती तसाच वय
   मुखना चक्षु हे

नारेन कल्पवृक्ष
    उपयोगी
अन्न वस्त्र निवारा
  योवसे बहुगुणी

खोबरा खोबरातेल
    डोस्काला
बुचकी बनावो दोरी
  बांधनं जोड़ाला

आजोबा लगावसेती
      नाती
दस सालमा फल
   खासेती

डोलकी चटणी
   दोसासंग
करंजीको सातु बनावो
    खावो सबकंसंग

जय राजा भोज,जय माँ गड़काली
वाय सी चौधरी
गोंदिया

विषय:- नारेन (नारियल)
           !! श्रीकाव्य!!

नारेन बहुपयोगी
'रियल'
वको पानी स्वास्थ्यप्रद
बाकी 'ना'रियल ||१||

अख्खो नारेनको
रूप
नार अना नारीको
डोई स्वरूप ||२||

पुजामा स्थान
पवित्र
समुद्र तलपर झाड
रमनिय चित्र ||३||

कवटीवानी कवच
कठीन
जटा, तीन डोरा
जसो त्रिलोचन ||४||

शुभकार्यमा श्रीफल
पक्वान
कलश, सत्कार, नजरबंदी
होम हवन ||५||

जरावन, झाडू
तेल
गद्दी, दोरी बनावो
तनाको ढोल ||६||

आंगनमा नारेन 
जेको
समुद्र तटकी रीत
रिस्ता पक्को ||७||

गगनचुंबी झाड
कल्पवृक्ष
सर्वव्यापी तीन लोकमा
सदैव प्रत्यक्ष ||८||

डॉ. प्रल्हाद हरिणखेडे "प्रहरी"
उलवे, नवी मुंबई
मो. ९८६९९९३९०७

श्रीकाव्य
  नारेन

प्रभुकी रचना
अनमोल
अंदर पाणी भरेव  
नारेन डोल

नारियल टणक
बुचदार
खानला खोबरा सें
मोठो चवदार

भगवान शिवजीका
त्रिनेत्र
नारेनमा तीन गोल
सेत सचित्र

 महादेवला अतिप्रिय
श्रीफळ
सौभाग्यको शुभ प्रतीक
आय नारळ

शुभ काममा
फोडंसेती
देवला अग्र भाग
पयले चढावंसेती

खोबरा चटणी
मस्त
इडली दोसा संग 
करसेज फस्त

नारीयल पाणी
गुणवर्धक
त्वचा केस साती
सौंदर्य साधक

         शारदा चौधरी
            भंडारा

Tuesday, March 2, 2021

अष्टाक्षरी काव्यप्रकार विषय "माय" ००१

अष्टाक्षरी काव्य स्पर्धा क्र. १ ता. २६/२/२०२१ विषय :- माय

किमान १६: कमाल २४


  1. डी पी राहांगडाले

उत्तेजनार्थ/ सहभाग

माय मोरी साधीभोळी 

 गुण गाऊ चार ओळी

भाव भक्ती की  मुरत

ओकी  छानसी  सुरत


गुरु  पहेलो  वा आय

मोरी  सुंदर सी  माय

ओक ओटामा आराम

सेवा करो सोळो काम


वाच बगीचा की माली

ओक बिना कोण वाली

ओका  उपकार  केता 

नही गिनती मा लेता


माय नदीकी से धार

नही भुलु उपकार 

वाच प्रेमको  सागर

माय दयाको आगर


नव महिना की नाळ

नही तुटनकी माळ

सेवा करो सब ओकी

कुंजी आय जिवनकी

         **

डी पी राहांगडाले

     गोंदिया








  1. सोनू भगत 

प्रथम 

गर्भ जब समायेव 

दर्द मायला भयेवं

झजकोरी वोकी आत्मा

जन्मला कान्हा आयेव


भगवान कहू, माय

तोरो बिन असहाय

नाथ आमी, उपकारी

कसो देऊ अभीप्राय


माय बिन विश्व नही

जग कसो जाने माया

तोरो जान पडे वोला

जब निंघे तोरो साया


जन्मदात्री से देवकी

जग देखाईस मोला

यशोदाला माय मोरी

अष्टाक्षरी वाहू तोला


          - सोनू भगत
















  1. सौ छाया सुरेंद्र पारधी

तृतीय 

माय सरिता सरिता

वरनु महिमा केत्ती

पाझरसे प्रेम पान्हा

माया आभार जेतरी


माय मोरी साधी भोळी

ओला प्रेम की झालर

ओकी जरतरी साड़ी

कंच हिवरो कलर


मोरी माय से आधार

माया ममता की खान

प्रेम को आय सागर

घरं की रुबाबी शान


माय मोरी रुकमाई

शब्दशब्द ओकी माया

धोऊ चरण कमल

मोक्ष प्राप्त येन काया


✍️✍️सौ छाया सुरेंद्र पारधी

 





















  1. इंजि. गोवर्धन बिसेन

तृतीय 

बोट धर बालपण् ,

मोला तुन चलाईस ।

जब पळु खाल्या तब,

प्रेमलका उठाईस ॥1॥

  

सांगशान कथा तुन, 

रस्ता मोला देखाईस ।

सज्जनता का चांगला, 

पाठ मोला सिखाईस ॥2॥


कभी गरो लगाव त,

मोला कभी वा डटाव ।

हातलका मायाको वा, 

मोरी थकान मिटाव ॥3॥


होऊ निराश मी तब, 

माय मोरी आशा रव्ह ।

मोरो उज्वल भाग्य की, 

मोठी अभिलाषा रव्ह ॥4॥


मोरो सफलतामा से, 

लक्ष्मीमाय को आशिष ।

याद आवसे तब मी, 

झुकाऊसु मोरो शिस॥5॥

 

छोटो तोंडलका कसो, 

करु तोरो गुणगान ।

माय तोरो ममता मा, 

फिको लग भगवान ॥6॥

  

✍ इंजि. गोवर्धन बिसेन, गोंदिया (बडेगांव)

दिनांक : 26 फेब्रुवारी 2021.






  1. शारदा चौधरी

द्वितीय 


जन्मदात्री माय मोरी

प्रेम की पुज्य मुरत

मन मंदिर मा मोरो

सजी सें वोकी सुरत   


माय से पयलो गुरु

माया संस्कार की खान

कोणी नहाय जगमा

माय को वानी महान


पिवाईस तुनं दूध

मोला अमृत समान

हर गुन्हा होसे माफ

बच्चा सें जीव का  प्राण


धुंडू सु मी पुण्यफल

जेनं वोनं तीरथ मा

खरो भगवान तं सें

माऊली को सीरत मा


मन रोवंसें यादमा

तोरो माय बारबार

फेड नही सकू तोरा

जन्मभर उपकार


मन करसे बिनती

हर अंत श्वास तक

पुन्हा लेऊन जनम 

तोरो चं मी कुश लक


        --- शारदा चौधरी,  भंडारा

 

 

 

 

 

 

6. डॉ. प्रल्हाद हरीणखेडे "प्रहरी"

🌷 मायलाच दंडवत 🌷

प्रथम/ द्वितीय/ तृतीय/ उत्तेजनार्थ/ सहभाग

वकी का वर्णू महिमा

जेनं जन्मिस ईश्वर

मायरूप समावन

कम पडंसे बादर ||१||

 

देसे जनम जीवन

करं पालन पोसन

सेवा मायकी करके

मिले मोक्ष को साधन ||२||

 

वरदान ईश्वरको

स्वर्ग धरतोरी परा

सदा दुआ देनेवाली

माय ममता को झरा ||३||

 

माय छप्पर को आडो

देसे आश्रय सबला

झुंझुरका पासनाकी

जुपी रवंसे रातला ||४||

 

माय समान दैवत

नही दुजो अवगत

हर जनममा मोरो

मायलाच दंडवत ||५||

मोरी माय अशिक्षित

मोरो विश्वविद्यालय

वको त्याग लका भयी

जिंदगानी सुखमय ||६||

डॉ. प्रल्हाद हरीणखेडे "प्रहरी"

उलवे, नवी मुंबई

मो. ९८६९९९३९०७

  1. कौशिक चाैधरी 

उत्तेजनार्थ/ सहभाग

गर्भ आपलो ठेयस्यान

जन्म देयेस माय।

तोरोशिवाय पहलो भगवान

दुनिया मा मोरो कोणी नहाय।


डोरा उघडता बरोबर

आस भयी तोरी

मी तोरो टुरा न

तु माय भयीस मोरी।


अतंरमनमा माय

बसीसे सुरत तोरी

याद यायव पर मी

 नयन मुंदूंसू मोरी।


आपलो संस्कार लक

तुन बांधेंस सिदोरी मोरी

काही भी संकट आया त

फक्त याद से तोरी पूरी।


मन लक प्रेमळ, धीर लक गंभीर 

शिकवणूक होती तोरी

तु नाहास माय आता

फक्त याद से मोरोेजवळ तोरी।


आता फक्त याद से मोरोजवळ तोरी माय , याद से मोरोजवळ तोरी.......

----- कौशिक चाैधरी


  1. सौ.वर्षा पटले रहांगडाले

द्वितीय 

बडी साजरी गोजीरी

जसी सुवर्ण की खान

मोरी माय से कष्टाळू

श्रम कर रातदिन


झाडलोट सकाळकी

सडा सारवन कर

ढार पाणी तुरसीला

चवूकचांदन पुर


राबराब सेती हात

घडीभर ना इसामा

सदा घाई से कामकी

रव्ह पाणी गा डोरामा


माया  कर घरपरा

सदा घरसाठी झुर

अपमान भेट सदा

मान पान होतो दुर


मोरी माय सुसंस्कृत

ज्ञान देईस आमला

सुखी संसार को मंत्र

 सदा शिकाईस मोला


✍सौ.वर्षा पटले रहांगडाले

बिरसी आमगांव

जि. गोंदिया

कृष्ण अना गोपी

मी बी राधा बन जाऊ बंसी बजय्या, रास रचय्या गोकुलको कन्हैया लाडको नटखट नंदलाल देखो माखनचोर नाव से यको!!१!! मधुर तोरो बंसीकी तान भू...